कैनवास से कार्टून तक: आबिद सुरती

वो मशहूर कार्टूनिस्ट हैं, क्योंकि कार्टून बनाकर लोगों को गुदगुदाना और हंसाना उनकी फितरत में शुमार है। एक बार कैनवास पर कलम चल जाए तो क्या बच्चे, क्या बूढ़े उनके बनाए कार्टून पढ़ने के बाद लोटपोट होने को मजबूर हो जाते हैं। वो कोई और नहीं 80 साल का बच्चा है जिसे दुनिया आबिद सुरती के नाम से जानती है। जिसने अपनी पेंटिंग्स से खुद को सैंकड़ों रंगों में रंग लिया है। क्योंकि पेंटिंग हीं उसका पहला प्यार है।

दरअसल देश की आजादी के कई बरस बीत चुके थे बावजूद इसके भारतीय कॉमिक्स की दुनिया में अमेरिकी मिकी माउस, टार्जन, फैंटम और मैजिशियन लोगों के दिलो दिमाग पर छाए हुए थे। कार्टून पढ़ने के शौकीन अबतक इन्हीं किताबों को पढ़ने को मजबूर थे, क्योंकि उन्हें अबतक अपना इंडियन हीरो नहीं मिला था। लेकिन 60 के दशक में मशहूर कार्टूनिस्ट आबिद सुरती ने “ढब्बूजी” और 70 के दशक में आबिद सुरती की इंडियन हीरो बहादुर, इंस्पैक्टर आजाद, इंस्पैक्टर विक्रम और लेडी इंस्पैक्टर शुजा, ने कॉमिक्स की दुनिया में ऐसा धमाल मचाया की कार्टून पढ़ने के शौकीनों के बीच से अमेरिकी मिकी माउस, टार्जन, फैंटम और मैजिशियन पढ़ने का नशा पूरी तरह उतर गया। “ढब्बूजी” की दीवानगी तो ऐसी थी कि लोग पत्रिका खऱीदने के बाद पीछे के पन्नों को पलटकर सबसे पहले “ढब्बूजी” के कारनामें को पढ़ा करते थे। जबकि इंडियन हीरो बहादुर, इंस्पैक्टर आजाद, इंस्पैक्टर विक्रम और लेडी इंस्पैक्टर शुजा, इंद्रजाल कॉमिक्स के जरिए पाठकों के दिलो दिमाग पर छा गए।

भारतीय कॉमिक्स की दुनिया में “ढब्बूजी” को लॉन्च करने वाले जानेमाने कार्टूनिस्ट आबिद सुरती की मानें तो इसे क्रिएट करने का आइडिया उन्हें प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट ‘लक्ष्मण के कॉमन मैन’ से आया। दरअसल कार्टूनिस्ट लक्ष्मण का हीरो ‘कॉमन मैन’ कभी भी किसी बात पर रिएक्ट नहीं करता है। बस फिर क्या था आबिद सुरती ने इसके अपोजिट एक ऐसा किरदार क्रिएट करने की ठान ली जो हर बात में अपनी टांग अड़ाता हो, जिसका नाम उन्होंने अनकॉमन मैन रखा। छोटी कद-काठी, काला लिबास, लंबी मूछें और अपने व्यंग और कटाक्ष को लेकर मशहूर, यही ढब्बूजी की असली पहचान थी। यही वो अनकॉमैन मैंन है जो पाठकों के बीच “ढब्बूजी” बनकर छा गए।

दरअसल 60 के दशक में जानेमाने कार्टूनिस्ट आबिद सुरती को धर्मयुग पत्रिका के लिए कार्टून बनाने का ऑफर मिला। जिसे कुछ हफ्तों के लिए पत्रिका में फिलर की तरह इस्तेमाल होना था, लेकिन पाठकों के बीच ढब्बूजी की लोकप्रियता इतनी बढ़ी की वो धर्मयुग पत्रिका का नियमित फीचर बन गया और 30 सालों तक पाठकों के दिलोदिमाग पर राज करता रहा। इतना ही नहीं इस किरदार की लोकप्रियता का आलम ये था कि डायमंड कॉमिक्स के माध्यम से पाठकों के बीच पहुंचता रहा और लोगों का दिल बहलाता रहा। जिनमें “ढब्बूजी नेता बनने चले, ढब्बूजी और बुद्धुराम, ढब्बूजी पागल बने, ढब्बूजी और चंदूलाल, ढब्बूजी और उलटी गंगा, ढब्बूजी और चोर उचक्के, ढब्बूजी के धमाके, ढब्बूजी और दांतों के डॉक्टर आदी प्रमुख हैं।

लेकिन 70 के दशक में आखिरकार आबिद सुरती ने इंडियन कॉमिक्स की दुनिया में बतौर सूपर हीरो के रूप में “बहादुर” को लॉन्च किया। ये वही बहादुर है जो डेनिम जिंस और केसरिया कुर्ता पहनकर लोगों के बीच छा गया। इसके बाद आबिद सुरती की ‘इंस्पैक्टर आजाद, इंस्पैक्टर विक्रम और लेडी इंस्पैक्टर शुजा ने ऐसा धमाल मचाया कि मिकी माउस, फैंटम, टार्जन और मैजिशियन इंडियन कॉमिक्स के पाठकों के बीच से हमेशा के लिए गायब हो गए।

दरअसल कार्टून बनाने की प्रेरणा आबिद सुरती को भीख में मिली मिकी माउस की किताब से मिली। जिसके बाद मिकी माउस की किताब ने आबिद सुरती की किस्मत के पन्ने को पलटकर रख दिया। किस्मत के सितारे कुछ ऐसे चमके की उन्हें अच्छे लोगों का साथ मिलता गया और कामयाबी की राह पर उनके कदम बढ़ते चले गए। दरअसल गुजरात की झुग्गी से निकलकर दुनियाभर में शोहरत पाने वाले आबिद सुरती अपनी कामयाबी का श्रेय नियती को देते हैं। उनकी माने तो भाग्य ही है जो उन्हें फर्श से अर्श तक पहुंचाया।

मशहूर कार्टूनिस्ट, पेंटर, लेखक, पत्रकार, समाजसेवी और स्किप्ट राइटर आबिद सुरती का जन्म 5 मई 1935 को गुजरात के राजुला में एक सम्पन्न परिवार में हुआ। पिता पेशे से वकील थे तो मां घर संभालती थी। साथ में उनका पारिवारिक शिपिंग का कारोबार भी था, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। इनके जन्म के कुछ सालों बाद शिपिंग का कारोबार बंद हो गया। जिसके बाद आबिद सुरती अपने माता-पिता के साथ मुंबई आ गए और डोंगरी इलाके में रहने लगे। लेकिन इसी बीच बीमारी के कारण उनके पिता की मृत्यु हो गई और उनका बचपन घोर गरीबी में बीतने लगा। उन्होंने बताया की पिता की मौत के बाद मां घरों में साफ-सफाई कर उनका पालन-पोषण करने लगी और खुद आबिद सुरती सड़कों पर चिक्की और मीठी गोली बेचकर जीवन यापन करने लगे, इस दौरान उन्हें कई बार भीख भी मांगनी पड़ी। आबिद सुरती ने दूसरे विश्वयुद्ध को याद करते हुए कहा की जब अंग्रेज सैनिक ट्रेन से मुंबई आते थे और डॉक एरिया में उतरने के बाद छोटी गाड़ी में बैठकर वीटी स्टेशन के लिए जाया करते थे। इस दौरान सैनिक खाने-पीने की कोई चीज गाड़ियों से बाहर अक्सर फेंक दिया करते थे, जिसे उनके साथ रह रहे बच्चे उठा लेते थे। एक बार सैनिकों ने एक कॉमिक की किताब फेंक दी। सभी बच्चे उस किताब के लिए छीना-झपटी करने लगे, किसी के हाथ दो पन्ने लगे तो किसी के हाथ चार पन्ने। किस्मत से उनके हाथ भी एक पन्ना आया, वो पन्ना मिकी माउस का था। उसे देखकर उन्हें लगा कि ऐसा वो भी बना सकते हैं और फिर उन्होंने उसकी नकल करनी शुरू कर दी। एक के बाद एक करते हुए सौ से भी ज्यादा स्केच बना डाले और यहीं से कार्टून बनाने की शुरूआत हो गई। धीरे-धीरे घर के हालात ठीक हुए तो अम्मी ने उनका दाखिला सरकारी स्कूल में करा दिया, और फिर दोस्तों ने प्रोत्साहित किया तो 1954 में मुंबई के जे.जे.स्कूल से फाईन आर्ट की पढ़ाई पूरी की। जिसके बाद आबिद सुरती ने टाइम्स ऑफ इंडिया के लिए पहली बार कार्टून बनाया। उसके बाद धर्मयुग पत्रिका के लिए ढब्बूजी बनाया जो उस समय 15 रूपये में बिका, फिर धर्मयुग के साथ उनका वर्षों का साथ रहा।

मशहूर कार्रटूनिस्ट आबिद सुरती की कार्टून की दुनिया दीवानी है लेकिन बहुत कम लोगों को पता है कि आबिद एक अच्छे पेंटर भी है उन्होने देश और विदेश में करीब 16 से ज्यादा पेंटिंग एक्जिबिसन भी लगाए हैं। लेकिन 1971 में जापान में लगाए गए पेंटिंग एग्जिबिसन “मिरर कोलाज” सबसे ज्यादा कामयाब रही। आबिद की मानें तो इसकी इन्होने तीन एग्जिबिसन लगाए थे और तीनों हीं बिक गए। लेकिन आबिद सुरती ने इसके बाद मिरर कोलाज को बंद कर दिया। आबिद एक ही तरह की पेंटिंग बनाकर दुनियाभर में मशहूर नहीं होना चाहते थे। हमेशा उनकी कोशिश होती थी की हरबार दर्शकों को कुछ नया मिले। लेकिन पेंटिंग करना कुछ ज्यादा ही एक्सपेंसिव हॉबी होने के कारण आबिद ने इससे किनारा कर लिया। क्योंकि आबिद सुरती की हालात इतनी अच्छी नहीं थी की वो अपने इस पहले प्यार पेंटिंग की हॉबी को जारी रखें। जिसके बाद उन्होने कार्टूनिंग पर खुद को फोकस किया और यहां भी आबिद ने कामयाबी के झंडे गाड़  दिए।

पेंटिंग और कार्टूनिंग के साथ-साथ आबिद एक अच्छे लेखक भी हैं। उन्होने 80 से ज्यादा किताबें लिखी हैं। जिनमें नॉवेल, गजलें, नाटक और बच्चों की किताबें भी शामिल हैं। बिज्जू, आतंकित, कैनाल, कोरा कैनवास, कोटा रेड जैसी चर्चित कहानियां भी शामिल है। तीसरी आंख, द ब्लैक बुक, इन नेम ऑफ राम, इनकी मुख्य रचनाएं हैं। इतना ही नहीं आबिद सुरती ने कई फिल्मों के लिए स्क्रीप्ट भी लिखें हैं। जिनमें “अतिथि तुम कब जाओगे”  औऱ “नकाब” प्रमुख फिल्में हैं।

किसी किस्म की लाइमलाइट से दूर रहने वाले आबिद सुरती को भारत सरकार ने 1993 में उनकी किताब “तीसरी आंखे” के लिए नेशनल अवार्ड से नवाजा, तो साल 2007 में उत्तर प्रदेश की सरकार ने उन्हें हिंदी साहित्य संस्था अवार्ड और गुजरात सरकार ने उन्हें गुजरात गौरव के अवार्ड से नवाजा।

बहुत कम लोगों को पता है कि राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त यह अलबेला, अनूठा कलाकार, कार्टूनिस्ट और लेखक पिछले कई सालों से मुंबई में एक खास तरह की मुहिम में जुटा हुआ है। आबिद सुरती के इस गजब फितूर का नाम है “ड्रॉप डेड” (पानी बचाओ)।

80 बरस के हो चुके आबिद सुरती मुंबई में साल 2007 से पानी बचाने की मुहिम में जुटे हुए हैं। उनकी मानें तो उन्होंने अबतक कई लाख लीटर पीने का पानी नालियों में बहने से बचाया है। वो पानी की अहमियत अच्छे से समझते हैं, उन्होंने अपने जीवन में काफी समय फुटपाथ पर भी गुज़ारा है और लोगों को पानी के लिए तरसते देखा है। इस नेक काम में उनके दो साथी साथ में होते हैं और हर रविवार को मुंबई के किसी एक इलाके के मकान में जाकर टपकते हुए नल को मुफ्त में ठीक करते हैं।

दरअसल आबिद सुरती पानी बचाओ मुहिम के पीछे की रोचक घटना को याद कर बताते हैं कि कैसे साल 2007 में उन्हें एक दोस्त के यहां निमंत्रण पर जाना हुआ, जहां नल से टपकते हुए पानी के कारण वो रातभर सो नहीं पाए। आबिद ने अपने दोस्त से टपकते हुए नल के पानी को लेकर शिकायत की तो जवाब मिला मुंबई में आसानी से प्लंबर नहीं मिलते और ना ही कोई इतने छोटे काम के लिए आने को तैयार होता है। ये बात उन्हीं दिनों की जिस साल इंटरनेशनल वाटर ईयर मनाया जा रहा था। बस फिर क्या था आबिद ने उत्तर प्रदेश हिंदी साहित्य संस्था से मिले रूपये को इस नए मिशन में इस्तेमाल करने की ठान ली और “ड्रॉप डेड फाउंडेशन” संस्था स्थापना कर पानी बचाने की शुरुआत कर दी।

आबिद की मानें तो हर सोमवार को मुंबई के किसी एक इलाके में जाकर एक बिल्डिंग को चुनते हैं और सप्ताह के अंत में रविवार को नल ठीक करते हैं। इसपर होने वाले खर्च की भरपाई के लिए आबिद टीशर्ट की प्रिंटिंग कराते हैं जिसपर उनके एनजीओ ड्रॉप डेड का लोगों छपा होता है। उनकी मानें तो एक टीशर्ट की छपाई में 100 रूपये का खर्च आता है जबकी इस टीशर्ट के लिए कोई 110 रूपये देता है तो कोई 1000 रूपये में भी खरीदता है। इसी से पानी बचाओ मुहिम में होने वाले खर्च की भरपाई होती है। इस अभियान की शुरूआत आबिद ने अकेले की थी लेकिन आज उनके साथ काफी लोग जुड़ गए हैं। इस अलबेले, अद्वितिय कलाकार को सलाम।

चित्र साभार: The Better India

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