मोहनी वीणा से विश्व मोहने वाले विश्वमोहन भट्ट

ग्वालियर में उस रात लगभग दस बज रहे थे, विख्यात मोहनवीणा वादक पण्डित विश्वमोहन भट्ट को कुछ देर पहले ही हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के प्रतिष्ठित तानसेन सम्मान से विभूषित किया गया था। सम्मान से विभूषित होने के बाद उनको दो शब्द बोलने के लिए मंच पर अनुरोधपूर्वक निमंत्रित किया गया। वे मंच पर आये और बोलना शुरू किया तो सबसे पहले वे यही बोले कि मेरे लिए यह सम्मान ग्रैमी अवार्ड या पद्म पुरस्कार से भी ज्यादा मायने रखता है। मैं इसे सिरमाथे लेता हूँ। यह बात कहते हुए भट्ट भावुक हो गये। उन्होंने अपने सीधे हाथ तरफ थोड़ी ही दूर पर रोशनी से जगमगाती तानसेन की समाधि की ओर कृतज्ञतापूर्वक निहारा और फिर सामने बैठे दर्शक-श्रोताओं की तरफ देखकर कहा कि यह सम्मान एक महान विभूति के नाम पर है, मैं उसी महान विभूति के यश, ऊष्मा और सान्निध्य में इसे ग्रहण कर रहा हूँ जो मेरे लिए सौभाग्य की बात है। थोड़ा और भावुक होते हुए उन्होंने कहा कि यह सम्मान मैं अपनी माँ की स्मृति को समर्पित करता हूँ। उस माँ की स्मृति को जिन्होंने मुझे जन्म दिया और मेरे कान में संगीत फूँकने का सबसे पुनीत कर्म किया। मैं जो भी आज हूँ, उनकी कृपा और आशीर्वाद से हूँ इस नाते यह सम्मान मैं उनकी स्मृति को प्रणाम करते हुए स्वीकारता हूँ।

अपने साज और अपने नाम से भारतीय शास्त्रीय संगीत परम्परा में एक-दूसरे का पर्याय बन चुके पण्डित विश्वमोहन भट्ट और उनकी मोहनवीणा की सांगीतिक प्रतिष्ठा देश से दुनिया तक विन्यस्त है। वे निरन्तर इतने वर्षों में इसे बड़े अपनेपन, स्नेह और आत्मविश्वास से साधते आये हैं। संगीत सृजन की उनकी दृष्टि और साधना के विस्तार में उन्होंने कुछ प्रयोगों, परिष्कारों और परिमार्जनों के बाद मोहनवीणा को जिस भरोसे और आश्वस्ति के साथ गढऩे का काम किया, वह हमारे समय में बड़ा महत्वपूर्ण है। संगीत के विलक्षण साज का सृजन और उसका एक प्रकार से पर्याय बनकर विश्वख्याति अर्जित करने वाले सुविख्यात मोहनवीणा वादक पण्डित विश्व मोहन भट्ट का जन्म 27 जुलाई 1952 को जयपुर में हुआ। संगीत के प्रति उनका बचपन से ही रुझान था। मैहर घराने की संगीत परम्परा से जुड़े भट्ट जी सुप्रतिष्ठित सितार वादक स्वर्गीय पण्डित रविशंकर के शिष्य रहे हैं। भट्ट जी के बड़े भाई पण्डित शशिमोहन भट्ट, पण्डित रविशंकर के पहले शागिर्द थे। संगीत उनकी पीढिय़ों और पूर्वजों में तीन सौ वर्षों से स्थापित और प्रवहमान है। उनकी पीढिय़ाँ महान संगीत साधक संगीत सम्राट तानसेन एवं स्वामी हरिदास से जुड़ी रही हैं। यही कारण रहा कि वे छोटी उम्र से ही संगीत के प्रति समर्पित हो गये। 

पण्डित विश्वमोहन भट्ट ने आरम्भ में सितार बजाना सीखा। सौभाग्यवश उनको पण्डित रविशंकर जी का सान्निध्य और मार्गदर्शन प्राप्त हुआ था। संगीत के व्याकरण और ध्वनि के सौन्दर्यबोध तथा आभासों को समझने में भट्ट जी ने गहरी लगन और जिज्ञासा का परिचय दिया। आगे चलकर वे मोहनवीणा जैसे अनूठे वाद्य के परिकल्पनाकार और सर्जक बने। उन्होंने इस वाद्य में गिटार और सितार के गुणों का समावेश करते हुए वीणा और सरोद की विशिष्टताओं को भी समाहित करने का गहरा सर्जनात्मक उपक्रम किया। मोहनवीणा का मूल उद्गम विचित्र वीणा ही है और पण्डित विश्वमोहन जी के वादन में यह बात जुड़ती है कि वे इस वाद्य के माध्यम से ध्रुवपद, धमार, $खयाल, ठुमरी आदि का भी कुशलतापूर्वक वादन किया करते हैं। 1966 से पण्डित भट्ट ने अपनी इस वाद्य के साथ सृजन यात्रा अनवरत जारी रखी है।

पण्डित विश्वमोहन भट्ट अपने वादन में गायकी और तन्त्रकारी अंग का दक्षतापूर्वक समावेश करते हैं। इस वाद्य में मीड़ के यथोचित ठहराव से उनकी प्रस्तुति में एक अलग ही प्रभाव की अलंकारिकता व्यक्त होती है। पण्डित भट्ट ने स्वतंत्रता दिवस के पचास वर्ष पूर्ण होने पर राग गंगा की परिकल्पना कर उसका प्रशंसनीय प्रस्तुतिकरण किया था। आगे चलकर आपने मधुवंती और शिवरंजनी रागों के समन्वय से विश्वरंजनी राग की सर्जना भी की। आपने देश-विदेश के अनेक प्रतिष्ठित संगीत समारोहों, कला उत्सवों में अपनी विलक्षण प्रस्तुति से रसिक श्रोताओं, गुणीजनों और जिज्ञासुओं को प्रभावित किया है। लगभग नब्बे देशों की सांगीतिक यात्राएँ उन्होंने की हैं जिनमेंं अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, जर्मनी, स्पेन, फ्रान्स, इटली, नीदरलैण्ड, बेल्जियम, स्कॉटलैण्ड, स्विटजरलैण्ड, डेनमार्क एवं सऊदी अरब में दुबई, शारजाह, बहरीन, मस्कट, आबूधाबी आदि शामिल हैं। संगीत के शीर्ष पर स्थापित पण्डित विश्वमोहन भट्ट अपने आपमें एक समृद्ध कला-व्यक्तित्व एवं समृद्ध सर्जक हैं जिनको प्रस्तुति मंच पर देखना और सुनना सदैव प्रीतिकर लगता है। 

संगीत में शोध, सृजन, मौलिकता और नवोन्मेष की सुदीर्घ यात्रा में पण्डित विश्वमोहन भट्ट को अनेक महत्वपूर्ण पुरस्कार एवं सम्मान प्राप्त हुए हैं। इनमें पद्मश्री, संगीत नाटक अकादमी सम्मान, स्टार ऑफ इण्डिया अवार्ड, वाद्य रत्नाकर, राजस्थानश्री, तंत्री सम्राट, स्वरशिरोमणि, सुरमणि, तानश्री एवं विश्वप्रसिद्ध ग्रैमी अवार्ड आदि शामिल हैं। पण्डित विश्वमोहन भट्ट के वादन की अनेक श्रृंखलाएँ ऑडियो सीडी के रूप में अनेक प्रतिष्ठित संगीत कम्पनियों ने जारी की हैं। आपके दो अलबमों म्यूजि़क ऑफ रिलेक्सेशन और मेघदूतम को महान ख्याति मिली है। ऐसे अनेक अवसर आये हैं जब उन्होंने भारतीय शास्त्रीय संगीत परम्परा, स्वयं के सृजन एवं साधना के साथ-साथ संगीत में प्रयोगों एवं प्रयोगधर्मिता की सम्भावनाओं पर गहरे उद्बोधन दिए हैं। पण्डित विश्वमोहन भट्ट की एक कलाकार के रूप में सबसे बड़ी विशेषता उनका अत्यन्त सहज होना है। वे राजस्थान की जमीन से हैं और एक कलाकार के रूप में सृजनात्मकता की जो नमी उनमें दिखायी देती है वह अनूठी है। वे प्रतिष्ठित और स्थापित कलाकार के सारे गौरव से परे अपने आपको विनम्र, विनयशील और सहज रूप में हमारे सामने होते हैं। यहाँ तक कि उनके साथ भरपूर जिज्ञासु होकर बात करना भी बड़ा सुखद और अनुभवों से भरा लगता है।  

जिस रात उनको ग्वालियर में तानसेन सम्मान से विभूषित किया गया, उसी रात उनका वादन भी था। वे सम्मानित थे और शीर्षस्थ भी लिहाजा उनकी सभा सबसे बाद में रखी गयी थी। इस तरह वे लगभग बारह बजे मंच पर आये। कड़ाके की सर्दी थी और वे अपने परिधान में थे जो उनकी पहचान बन चुका है। उनका वादन सुनना सचमुच अनुभवसमृद्ध था। यह सचमुच सम्मान की उनको हो रही सुखद अनुभूति, पास ही ऊर्जा और निष्ठा के बोध से भर देने वाली बाबा तानसेन की समाधि, फिर तो भट्ट रात लगभग डेढ़ बजे तक वादन करते रहे। अन्त में उन्होंने कुछ रचनाएँ भी गाकर सुनायीं जो श्रोताओं के लिए एक दूसरा सुखद आयाम साबित हुईं। उनको सुनते हुए फिर यह टिप्पणी और इसका यही शीर्षक सूझा, मोहनी वीणा से विश्व मोहने वाले विश्वमोहन भट्ट।

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