खाकी वर्दी में छुपी बांसुरी की मिठास

गोवा के डीजीपी और बांसुरी वादक, सुनकर आपको थोड़ा अजीब लगेगा, लेकिन ये सच है। एक ऐसे डीजीपी जो बेहतरीन बांसुरी वादक भी हैं। वो जितना मधुर बोलते हैं उससे कहीं ज्याद मधुर आवाज उनकी बांसुरी में हैं। जी हां हम बात कर रहे हैं दिल्ली पुलिस के 1988 यूटी कैडर के सीनियर आईपीएस ऑफिसर और गोवा के नए डीजीपी डॉ. मुक्तेश चंद्रजी का।

बांसुरी के प्रति अपने लगाव को लेकर मुक्तेशजी बताते हैं कि कैसे बचपन के दिनों में जब ‘गली-मुहल्लों में घूम- घूमकर बांसुरी बेचने वाला कोई शख्स उनके घर के पास से बांसुरी बजाता हुआ गुजरता था तो वो उसके पीछे- पीछे दौड़ पड़ते थे और उसे बड़े ध्यान से देखते थे कि वह किस तरह से बांसुरी से मधुर धुन बजा रहा है उसकी धुन सुनकर वो मंत्रमुग्ध हो जाते थे। वो उन दिनों को यादकर बताते हैं कि बांसुरी की धुन उन्हें अपनी ओर खिंचती थी। बस उन्हीं दिनों से उन्हें बांसुरी से लगाव हो गया।’

मुक्तेशजी एक वाकये को याद करते हुए बताया कि, कैसे एक दिन उनके पिताजी के दोस्त उनके स्कूल में आये थे। जो बहुत ही अच्छी बांसुरी बजाते थे, लेकिन जब बच्चों ने उनसे बांसुरी मांगी तो उन्होंने कहा, आपमे से जो भी इस बांसुरी को बजा लेगा ये बांसुरी उसी की हो जाएगी, और संयोग से मैंने बांसुरी बजा ली थी। फिर पिताजी के दोस्त ने मुझे यह कहकर मेरे हाथों में बांसुरी थमा दी कि तुम बांसुरी बजा सकते हो। तब से बांसुरी बजाने का ये शौक मेरी ज़िंदगी का अहम हिस्सा बन गया। फिर क्या था जब भी मुझे बांसुरी बजाने का मौका मिलता था जमकर बांसुरी बजाते थे। एक दिन ऐसा भी मेरी जिंदगी में आया जब मैं बांसुरी से धीरे-धीरे धुनें निकालने लगा। इसी दौरान मुझे मेरे स्कूल के कई प्रोग्राम में बांसुरी बजाने का मौका मिला। इसके बाद ये सिलसिला कभी थमने का नाम नहीं लिया और इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान भी कॉलेज के कई स्टेज शो में बांसुरी से मिठी धुने निकालने का अवसर मिला। इतना ही नहीं मुक्तेशजी पुलिस अकादमी की यादों को साझा करते हुए कहा कि, अकादमी में रहने के दौरान भी मैनें कई स्टेज शो में परफर्मेंस दिए और खुद को निखारने की भरपूर कोशिश भी की।

अपने पुराने दिनों को याद करते हुए मुक्तेशजी बताते हैं कि ट्रेनिंग पूरी होने के बाद जब उनकी पहली पोस्टिंग नॉर्थ ईस्ट डिस्ट्रिक्ट में एसीपी (सीलमपुर) हुई तो यहां लगातार होने वाली आपराधिक वारदातों के कारण वो उलझकर रह गए थे। और कुछ समय के लिए उनका बांसुरी बजाने का शौक ड्यूटी के भारी बोझ के तले दबकर रह गया। लेकिन इसके कुछ समय बाद ही उनका गोवा ट्रांसफर हो गया, जहां उन्होंने वक्त निकालकर बांसुरी बजाने का जमकर रियाज किया और खुद को निखारने और सवांरने की भरपूर कोशिश की। बांसुरी बजाने के प्रति उनकी दीवानगी ही ऐसी थी कि लाख ऊलझन सामने आने के बाद भी उन्होंने रियाज करना बंद नहीं किया और एक के बाद एक कई कार्यक्रमों में शिरकत की।

मुक्तेशजी अपने बांसुरी शौक का जिक्र करते हुए कहते हैं कि परिवार में पत्नी और बच्चों से पूरा सपोर्ट है सभी उनके इस शौक को बढ़ावा देते हैं। यही वजह है कि आज वो इस शौक को ज़िंदा रखने में कामयाब रहे हैं। वो बताते हैं कि उनका भी बेटा इस वाद्य यंत्र का शौकीन है। और वह बहुत ही अच्छी बांसुरी बजाता है।

मुक्तेशजी गोवा के डीजीपी हैं और उनकी बांसुरी प्रेम भी किसी से छुपा नहीं है। लेकिन ये बहुत कम ही लोग जानते हैं कि उन्हें साहित्य में भी गहरी रुचि है औऱ उन्हें जब भी मौका मिलता है वो प्रेमचंद की लिखी किताबें जरुर पढ़ते हैं।

मुक्तेशजी नई जिम्मेदारी के साथ एक बार फिर गोवा आएं हैं। इस बार भी उनका कुछ अलग करने का इरादा है वो गोवा के पुराने दिनों को याद कर बताते हैं कि गोवा में सुकून है, संगीत का खुशनुमा माहौल है, तब मैं ड्यूटी के बाद बचे समय में जमकर रिहर्सल कर लेता था। एक बार फिर नई ज़िम्मेदारी के साथ गोवा आया हूं। और इस बार बांसुरी की विधिवत तालीम लेने की भरपूर कोशिश करुंगा।

पुलिस जीवन के तमाम संघर्षो बीच कला के प्रति इतना समर्पण, मुक्तेशजी का उदाहरण जीवन का एक अलग ही राग प्रस्तुत करता है।

सासिक सोशल मीडिया

  • facebook
  • Twitter
  • LinkedIn
  • Google Plus
  • Youtube

न्यूज़लेटर के लिए रजिस्टर कीजिए

सहयोगकर्ता: Nikesh