​जितेन्द्र श्रीवास्तव की बाईस संग्रहणीय कविताएं

कैंची

गुम हो गयी कैंची
कुछ पल के लिए
गुम हो गया मन का उजास

मैं दुखी नहीं रह सकता
जीवन भर
लेकिन इस क्षण के दुख को
झिड़क भी नहीं सकता

मैं जानता हूँ
कैंची तो मिल जाएगी
पचीस पचास की अधितम सौ डेढ़ सौ की
संभवतः पहले से अधिक धारदार

अभी कम्पनियों ने
बनाना बंद नहीं किया है कैंची

कोई उससे जेब काटे नसें काटे
या काट ले जिगर
इससे झुठलाया नहीं जा सकता कैंची के सही उपयोग को

कैंची बनी थी जीवन संवारने के लिए
अब क्या करे वह 
जब कोई बनाने की जगह
बिगाड़ ले या बिगाड़ दे जीवन उससे
काटने लगे उससे आत्मा दश या समाज की

आज सुबह जो खो गई
उसी कैंची से वर्षों पहले
मैंने संवारी थीं अपनी मूँछें पहली बार

रेखों का मूँछों में बदलना
फिर उन्हें संवारना
आसान नहीं है
उन धड़कनों को आज शब्द देना

वह कैंची साक्षी थी
मेरे उन पलों और उठते दिनों की
फिर मेरे प्रौढ़ होने 
मेरी मूँछों के पकने की भी

जो खो गई
जिसे चुरा ले गया यमदूत-सा कोई
बहुत सारे सामानों के साथ
पुतलियों के ऐन नीचे से
वह तथ्य के रूप में महज एक कैंची थी
जिसकी कीमत इन दिनों सौ रूपये होगी
ज्यादा से ज्यादा डेढ़ सौ
ल्ेकिन मैं इतना ही मानकर अपमान नहीं कर सकता
उसके लम्बे साहचर्य का

मैं जानता हूँ
उसकी यादें हर पल नहीं रह सकतीं मेरे साथ
इस जीवन में बहुत कम हैं खाली पल
और काम हैं बहुत सारे
लेकिन वह जरूर याद आएगी कभी-कभी
औचक 
यूँ ही।

किरकिरा रही है आत्मा धरती की

बरस कर लौट गए बादल क्षितिज की छाँह में
यहाँ पसर गया नमक चहुँओर
तन मन नयन से रिस-रिस कर

अभी-अभी तो चढ़ा था वैशाख
उम्मीदें नाच रही थीं खेत से खलिहान तक

अब चारों ओर नमक ही नमक है
किरकिरा रही है आत्मा धरती की।

चुप्पी का समाजशास्त्र

उम्मीद थी
मिलोगे तुम इलाहाबाद में
पर नहीं मिले

गोरखपुर में भी ढूँढा
पर नहीं मिले

ढूँढा बनारस, जौनपुर, अयोध्या, उज्जैन, मथुरा, वृन्दावन, हरिद्वार
तुम नहीं मिले

किसी ने कहा
तुम मिल सकते हो ओरछा में
मैं वहाँ भी गया
पर तुम कहीं नहीं दिखे

मैंने बेतवा के पारदर्शी जल में
बार-बार देखा
आँखे डुबोकर देखा
तुम नहीं दिखे

तुम नहीं दिखे
गढ़ कुण्हार के खण्डहर में भी

मैं भटकता रहा
बार-बार लौटता रहा
तुमको खोजकर
अपने अंधेरे में

न जाने तुम किस चिड़िया के खाली खोते में
सब भूल-भाल सब छोड़-छाड़
अलख जगाए बैठे हो

ताकता हूँ हर दिशा में
बारी-बारी चारों ओर
सब चमाचम है

कभी धूप कभी बदरी
कभी ठण्डी हवा कभी लू 
सब कुछ अपनी गति से चल रहा है

लोग भी खूब हैं धरती पर
एक नहीं दिख रहा
इस ओर कहाँ ध्यान है किसी का
पैसा     पैसा    पैसा
पद    प्रभाव    पैसा
यही आचरण
दर्शन यही समय का

देखो न
बहक गया मैं भी
अभी तो खोजने निकलना है तुमको
और मैं हूँ
कि बताने लगा दुनिया का चाल-चलन

पर किसे फुर्सत है
जो सुने मेरा अगड़म-बगड़म
किसी को क्या दिलचस्पी है इस बात में
कि दिल्ली से हजार कि.मी. दूर
देवरिया जिले के एक गाँव में
सिर्फ एक कट्ठे जमीन के लिए 
हो रहा है खून-खराबा
पिछले कई वर्षों से

इन दिनों लोगों की समाचारों में थोड़ी-बहुत दिलचस्पी है
वे चिन्तित हैं अपनी सुरक्षा को लेकर
उन्हें चिन्ता है अपने जान-माल की
इज्जत, आबरू की

पर कोई नहीं सोच रहा उन स्त्रियों की
रक्षा और सम्मान के बारे में
जिनसे संभव है
इस जीवन में कभी कोई मुलाकात न हो

हमारे समय में निजता इतना बड़ा मूल्य है
कि कोई बाहर ही नहीं निकलना चाहता उसके दायरे से

वरना क्यों होता
कि आजाद घूमते बलात्कारी
दलितों-आदिवासियों के हत्यारे
शासन करते
किसानों के अपराधी

सब चुप हैं
अपनी-अपनी चुप्पी में अपना भला ढूँढ़ते
सबने आशय ढूँढ लिया है
जनतंत्र का
अपनी-अपनी चुप्पी में

हमारे समय में
जितना आसान है उतना ही कठिन
चुप्पी का भाष्य

बहुत तेजी से बदल रहा है परिदृश्य
बहुत तेजी से बदल रहे हैं निहितार्थ

वह दिन दूर नहीं
जब चुप्पी स्वीकृत हो जाएगी
एक धर्मनिरपेक्ष धार्मिक आचरण में

पर तुम कहाँ हो
मथुरा में अजमेर में
येरुशलम में मक्का-मदीना में
हिन्दुस्तान से पाकिस्तान जाती किसी ट्रेन में
अमेरिकी राष्ट्रपति के घर में
कहीं तो नहीं हो

तुम ईश्वर भी नहीं हो
किसी धर्म के 
जो हम स्वीकार लें तुम्हारी अदृश्यता

तुम्हें बाहर खोजता हूँ
भीतर डूबता हूँ
स्ूज गई हैं आँखें आत्मा की

नींद बार-बार पटकती है पुतलियों को
शिथिल होता है तन-मन-नयन
पर जानता हूँ
यदि सो गया तो
फिर उठना नहीं होगा
और मुझे तो खोजना है तुम्हें

इसीलिए हारकर बैठूँगा नहीं इस बार
नहीं होने दूँगा तिरोहित
अपनी उम्मीद को

मैं जानता हूँ
खूब अच्छी तरह जानता हूँ
एक दिन मिलोगे तुम जरूर मिलोगे
तुम्हारे बिना होना 
बिना पुतलियों की आँख होना है।
 
तमकुही कोठी का मैदान

तमकुही कोठी निशानी होती
महज सामंतवाद की
तो निश्चित तौर पर मैं उसे याद नहीं करता

यदि वह महज आकांक्षा होती
अतृप्त दिनों में अघाए दिनों की
तो यकीनन मैं उसे याद नहीं करता

मैं उसे इसलिए भी याद नहीं करना चाहता
कि उसके खुले मैदान में खोई थी प्राणों सी प्यारी मेरी साइकिल
सन् उन्नीस सौ नवासी की एक हंगामेदार राजनीतिक सभा में

लेकिन मैं उस सभा को नहीं भूलना चाहता
मैं उस जैसी तमाम सभाओं को नहीं भूलना चाहता
जिनमें एक साथ खड़े हो सकते थे हजारों पैर
जुड़ सकते थे हजारों कंधे
एक साथ निकल सकती थीं हजारों आवाजें
बदल सकती थीं सरकारें
कुछ हद तक ही सही
पस्त हो सकते थे निजामों के मंसूबे

मैं जिस तरह नहीं भूल सकता अपना शहर
उसी तरह नहीं भूल सकता
तमकुही कोठी का मैदान

वह सामंतवाद की कैद से निकलकर
कब जनतंत्र का पहरूआ बन गया
शायद उसे भी पता न चला

ठीक-ठीक कोई नहीं जानता
किस दिन शहर की पहचान में बदल गया वह मैदान

न जाने कितनी सभाएं हुईं वहाँ
न जाने किन-किन लोगों ने कीं वहाँ रैलियाँ
वह जंतर-मंतर था अपने शहर में

आपके शहर में भी होगा या रहा होगा
कोई न कोई तमकुही कोठी का मैदान
एक जंतर-मंतर

सायास हरा दिए गए लोगों का आक्रोष
वहीं आकार लेता होगा
वहीं रंग पाता होगा अपनी पसंद का

मेरे शहर में
जिलाधिकारी की नाक के ठीक नीचे
इसी मैदान में
रचा जाता था प्रतिरोध का सौन्दर्यशास्त्र

वह जमीन जो ऐशगाह थी कभी सामंतों की
धन्य-धन्य होती थी
किसानों-मजूरों की चरण धूलि पाकर

समय बदलने का
एक जीवन्त प्रतीक था तमकुही कोठी का मैदान
लेकिन समय फिर बदल गया
सामंतों ने फिर चोला बदल लिया

अब नामोनिशान तक नहीं है मैदान का
वहाँ कोठियाँ हैं फ्लैट्स हैं
अब आम आदमी वहीं बगल की सड़क से
धीरे से निकल जाता है
उस ओर
जहाँ कचहरी है

और अब आपको क्या बताना 
आप तो जानते ही हैं
जनतंत्र में कचहरी मृगतृष्णा गरीब की।

किसी सगे की तरह

जो चीजें वर्षां रही हों आपके साथ
उनका किसी दिन किसी स्टेशन से गुम हो जाना
अखरता है देर तक दिनों तक

चीजें आती हैं पैसों से
लेकिन वे महज पैसा नहीं होतीं
एक लम्बा वक्त गुजारा होता है आपने उनके साथ
आपके जीवन में वे होती हैं
किसी सगे की तरह

उनका जाना
महज कुछ चीजों का खो जाना नहीं
किसी सगे का
हमेशा हमेशा के लिए चले जाना है।

इस गृहस्थी में

देखो तो कहाँ गुम हो गई रसीद!

देखो न
तुम तो बैठी हो चुपचाप
अब हँसो नहीं खोजो
बहुत जरूरी है रसीदों को बचाकर रखना

हम कोई धन्ना सेठ तो नहीं
जो खराब हो जाएं हाल-फिलहाल की खरीदी चीजें
तो बिसरा दें उन्हें
खरीद लाएं दूसरी-तीसरी

हमारे लिए तो हर नई चीज
किसी न किसी सपने का सच होना है
हमारे सपनों में कई जरूरी-जरूरी चीजें हैं
और खरीदी गई चीजों में बसे हैं कुछ पुराने सपने

उठो,  देखो न कहाँ गुम हो गई रसीद!

उसे महज एक कागज का टुकड़ा मानकर
भुलाना अच्छा नहीं होगा
वह रहेगी तभी पहचानेगा शो-रूम का मैनेजर
कुछ पुराने-धुराने हो गए कपड़ों के बावजूद
उन्हें बदलना पड़ेगा सामान

अभी बहुत कम है वेतन
मैं नहीं ले सकता क्रेडिट-कार्ड
उपयोगी चीजों के लिए भी नहीं हैं पैसे
मैं नहीं खरीद सकता सजावट के सामान

वैसे अच्छा है
तुम मुझसे ज्यादा समझती हो यह-सब
बड़े हिसाब-किताब से चलाती हो घर
लेकिन इस समय जब मैं हूँ बहुत परेशान
तुम बैठी हो चुपचाप

उठो, देखो न कहाँ गुम हो गई रसीद!

अरे, यह क्या
अब तो तुम्हारे होठों पर आ गयी है शोख हँसी
लगता है जरूर तुमने सहेज कर रखा है उसे
अपने लॉकर वाले पर्स में
चलो इसी बात पर खुश होकर
मैं भी हँस लेता हूँ थोड़ा-सा

यह अच्छा है इस गृहस्थी में
जो चीजें गुम हो जाती हैं मुझसे
उन्हें ढूँढ़कर सहेज देती हो तुम

मैंने अब तक किए हैं आधे-अधूरे ही काम
जो हो सके पूरे या दिखते हैं लोगों को पूरे
उनका सारा श्रेय तुम्हारा है।

किसी ईश्वर से अधिक विराट

वे तीन सरकारी ड्राइवर थे
जो बातें कर रहे थे विजय माल्या के बारे में
दो लगातार बोले जा रहे थे

पहले ने कहा
अद्भुत आदमी है माल्या
ऊसर में फसलें खड़ी कर देता है

दूसरे ने कहा
बहुत शौकीन है वह
तरह-तरह के शौक हैं उसके
पानी के जहाज पर करता है पार्टियाँ
पानी की तरह बहाता है शराब
धन तो मैल है उसके हाथों की
वह किसी के हाथ न आएगा
सबको कर लेगा मुट्ठी में

दूसरा जब तक बोल रहा था
पहला बेचैन था कुछ कहने के लिए
टूट रहा था उसका धैर्य

जैसे ही चुप हुआ दूसरा
बोल पड़ा वह
हर साल शानदार कैलेण्डर बनवाता है वह
जिसे देखने के लिए सब मरते हैं
जवान तो जवान बूढ़े भी आह भरते हैं

फिर उसने दूसरे के हाथ पर जोर की ताली मारी
हँसा ठठाकर उसके साथ
कि अचानक उसे ध्यान आया तीसरे का

तीसरा जो अब तक चुप था
पहले के कुछ कहने से पहले ही बोल पड़ा
“मैं नहीं बुलाया गया हूँ माल्या की किसी पार्टी में
मैं आज तक नहीं चढ़ा किसी भी जहाज पर
मैं इतना अमीर नहीं कि पी सकूँ अंग्रेजी शराब मँहगी बीयर
मैं तो सस्ती भी नहीं पीता
मैं क्रिकेट भी नहीं देखता अक्सर
मुझे अश्लील लगता है आई.पी.एल. में धन का ताण्डव नृत्य

वैसे तुम लोग गए थे क्या राजाराम के वहाँ
उसके पिता के निधन के बाद?

सुना है बड़ी मुश्किलों से पाला था उन्होंने
अपनी पत्नी के निधन के बाद राजाराम और उसकी बहन को

मैं आज जाऊँगा उसके घर
वैसे तुम लोग कुछ ज्यादा ही परेशान हो
माल्या के बारे में
क्या माल्या की दिलचस्पी है
किसी ड्राइवर या चपरासी की मुश्किलों को जानने में
उसने तो तनख्वाह भी नहीं दिया
कई महीने से अपने जहाजी कर्मचारियों को

आज जब मैं दुखी हूँ अपने दोस्त के लिए
तो क्या वह मेरे साथ जाएगा राजाराम के घर
पीएगा उसके बर्तन में पानी
दुलराएगा उसका मन?

वैसे यह सिर्फ एक सवाल है
मैं इसका उत्तर जानता हूँ
जब तुम लोग नहीं जा रहे
जो रोज उठते-बैठते हैं साथ नौकरी करते हैं
तो वह क्या जाएगा एक दलित के घर
और यदि वह चला भी गया
तो संचार माध्यम उसे इस तरह
प्रकाशित, प्रसारित और प्रचारित करेंगे
जैसे रव-रव नरक में गया हो कोई त्यागी
किसी का उद्धार करने

हम गरीब हैं
वर्ण व्यवस्था के मारे हैं
लेकिन तमाशा नहीं हैं, यह हमें ही समझाना होगा जमाने को

विजय माल्या की समस्याएँ
एक उद्योगपति की अपनी बनाई समस्याएँ हैं
हम लोग साधारण लोग हैं
बहुतों की निगाहें है हमारी रोटी पर
क्षमा करना
मैं कोई माओवादी नहीं, एक ड्राइवर हूँ
लेकिन मुझे ऐतराज है
किसी धन्नासेठ की निजी समस्या को
राष्ट्रीय समस्या में बदलने की कोशिशों पर“

बोलते-बोलते लाल हो गया था उसका चेहरा
शब्द काँपने लगे थे उसके क्रोध की ज्वाला से

मैं वहीं थोड़ी दूर खड़ा था
मेरा मन झनझना गया था पूरी तरह
यकीन नहीं हो रहा था
कोई ड्राइवर सोच सकता है इस तरह

मेरा यकीन जो डगमगा गया था सपनों के बारे में
फिर संभल गया थोड़ा-सा उसकी बातें सुनकर

मैंने देखा उसके दोनों साथी खिसक लिए थे धीरे से
उन्हें लगा होगा शायद खिसक गया है उनका साथी अचानक

मैं रोक न सका अपने को
तेज कदमों से पहुँचा उसके पास
किया एक जोरदार सैल्यूट
जैसे कोई जवान करता है झण्डे को

मुझे ऐसा करते देख अकबका गया वह
बिना कुछ कहे ही चला गया दूसरी ओर
शायद उसे फालतू लगी होगी मेरी भावुकता

उस दिन वह एक मामूली-सा ड्राइवर
अपनी आत्मा का पहरूआ
मुझे किसी ईश्वर से अधिक विराट और शक्तिशाली लगा।

रामदुलारी

रामदुलारी नहीं रहीं
गईं राम के पास
बुझे स्वर में कहा माँ ने

मैं अपलक निहारता रहा माँ को थोड़ी देर
उनका दुःख महसूस कर सकता था मैं

रामदुलारी सहयोगी थीं माँ की
तीस वर्ष से लम्बी अवधि तक
माँ के कई दुःखों की बँटाइदार

माँ के अलावा सब दाई कहते थे रामदुलारी को
काम में नाम डूब गया था उनका
कभी-कभी माँ उनके साहस के किस्से सुनाती थीं

सन् दो हजार दस में तिरासी वर्ष की आयु में
दुनिया से विदा हुईं रामदुलारी ने
कोई तिरसठ वर्ष पहले सन् उन्नीस सौ सैंतालिस में
पियक्कड़ पति की पिटाई का प्रतिरोध करते हुए
जमकर धुला था उसे
गाँव भर में दबे स्वर में
लोग कहने लगे थे उन्हें मर्द मारन
पर हिम्मत नहीं थी किसी में सामने मुँह खोलने की

रामदुलारी ने वर्षों पहले
जो पाठ पढ़ाया था अपने पति को
उसका सुख भोग रही हैं
गाँव की नई पीढ़ी की स्त्रियाँ
उनमें गहरी कृतज्ञता है रामदुलारी के लिए
वे उन्हें ‘मर्द मारन’ नहीं
‘योद्धा’ की तरह याद करती हैं

जतियों में सुख तलाशते गाँव में
हमेशा जाति को लांघा था रामदुलारी ने
कोई भेद नहीं था उनमें बड़े-छोटे का
सबके लिए चुल्लू भर पानी था उनके पास

माँ कहती हैं
व्यर्थ की बातें हैं बड़ी जाति अपार धन
रामदुलारी न किसी बड़ी जाति में पैदा हुई थीं
न धन्ना सेठ के घर
पर उनके आचरण ने सिखाया हमेशा
निष्कलुष रहने का सलीका
बाभनों, कायस्थों, ठाकुरों, बनियों, भूमिहारों में
डींगें चाहे जितनी बड़ी हों अपनी श्रेष्ठता की
पर कोई स्त्री-पुरुष नहीं इनमें
जो आस-पास भी ठहर सके रामदुलारी के।

लोकतंत्र का समकालीन प्रमेय

कल अचानक मिले रूद्रपुर में जगप्रवेश
मेरे बाल सखा
हाफ पैंटिया यार

मूछों में आ चुकी सफेदी
खुटियाई दाढ़ी से ताल मिला रही थी
अब उतनी बेफिक्री उतना संवरापन नहीं था
जितना होता था नेहरू माध्यमिक विद्यालय में साथ पढ़ते हुए

धधाकर मिले जगप्रवेश
खूब हँसे हमारे मन
हमने याद किया अपने शिक्षकों और सहपाठियों को
हालचाल लिया एक दूसरे के परिवार का
और खूब प्रसन्न हुए इस बात पर
कि दोनों पिता हैं दो-दो बेटियों के

जगप्रवेश को मालूम था मेरे बारे में
बड़े भाई साहब ने बहुत कुछ बता दिया था उन्हें
वे खुश थे अपने मित्र की खुशी में
मैं भी कुछ-कुछ जानता था उनके बारे में
मसलन यह कि वे कोटेदार हैं
एक राजनीतिक पार्टी के स्थानीय नेता हैं
उनकी पत्नी शिक्षिका हैं
और एक बड़ा-सा घर है शहर में उनके नाम

बात-बात में पता लगा
जगप्रवेश विधायक होना चाहते हैं
उन्होंने खूब धन-बल जुटाया है बीच के दिनों में
टिकट का प्रबंध पक्का है 
उन्होंने आँकड़े इकट्ठा कर लिए है जातियों के
उनकी अपनी जाति के वोट हैं ढेर सारे

कल बहुत सारी इधर-उधर की बातें करते हुए
जगप्रवेश ने धीरे से कहा मुस्कुराते हुए
आपको भी मेरा साथ देना होगा भाई साहब
हम जाति भाई नहीं लेकिन दोस्त हैं पुराने
आपके आने से बल मिलेगा
आपकी जाति का एकमुश्त वोट मिल जाएगा मुझे

और मित्रो इस तरह मैं
अचानक मित्र से एक जाति में बदल गया
मैं अचरज में था
कि स्कूल के दिनों में
गणित में बेहद होशियार जगप्रवेश
अब भाषा और रिश्तों में 
नए प्रमेय गढ़ रहा था

मुझे कोई आश्चर्य नहीं होगा
जो किसी दिन आपको भी मिले आपका कोई पुराना मित्र
लोकतंत्र का पहरुवा बनने को उत्सुक विकल
और धीरे से बातों ही बातों में
आपको रूपान्तरित कर दे एक जाति में।

 
जाडे़ की बारिश

जाड़े की यह बारिश
प्रेमियों के लिए
दृश्य चाहे जो सिरजती हो
गड़ती है आत्मा में आँख में पाँख में हाथ की गदोरियों में
निर्धनों के
पक्षियों के
मवेशियों के
बिना नागा सुबह उठकर
घर सँवारने वालियों के

जाड़े की बारिश में
गिरते ओले
गिरते हैं किसानों के सपनों पर

वह चाहे जितनी अच्छी लगती हो
पेंटिग्स में
फिल्मों में
कुछ कविताओं में
रोजमर्रा के जीवन में अखरती है

जिनके पास कोई कमी नहीं
जो भरे हुए हैं बाहर तक
जिनके पाँवों में लगती नहीं मिट्टी अक्सर
वे भी कहते मिलते हैं
कब बीतेगा यह मौसम
जून जुलाई तो नहीं फरवरी है।

 
साहब लोग रेनकोट ढूँढ रहे हैं

“हजारों टन अनाज सड़ गया
सरकारी गोदामों के बाहर“

यह खबर कविता में आकर पुनर्नवा नहीं हो रही
यह हर साल का किस्सा है
हर साल सड़ जाता है हजारों टन अनाज
प्रशासनिक लापरवाहियों से

हर साल मर जाते हैं हजारों लोग 
भूख और कुपोषण से 
हर साल कुछ लोगों पर कृपा होती है लक्ष्मी की
बाढ़ हो आकाल हो या हो महामारी

बचपन का एक दृश्य
अक्सर निकल आता है पुतलियों के एलबम से
दो छोटे बच्चे तन्मय होकर खा रहे हैं रोटियाँ
बहन के हाथ पर रखी रोटियों पर
रखी है आलू की भुजिया
वे एक कौर में आलू का एक टुकड़ा लगाते हैं
भुजिया के साथ भुने गए मिर्च के टुकड़े
बड़े चाव से खाते हैं
रोटियाँ खत्म हो जाती हैं
वे देखते हैं एक दूसरे का चेहरा
जहाँ अतृप्ति है
आधे भोजन के बाद की उदासी है
उनके लिए जो भोजन था
मालिकों के लिए वो बासी है

बचपन का यह दृश्य
मुझे बार-बार रोकता है
पर सरकारों को कौन रोकेगा
जिनका स्थायी भाव बनते जा रहे हैं देशी-विदेशी पूंजीपति
कौन रोकेगा
हमारे बीच से निकले उन अफसरों को
जो देखते ही देखते एक दिन किसी और लोक के हो जाते हैं

कौन तोड़ेगा उस कलम की नोक
सोख लेगा उसकी स्याही
जो बड़ी-बड़ी बातों बड़े-बड़े वादों के बीच
जनता के उद्धार की बातें करती है
और छोड़ती जाती है बीच में इतनी जगह
कि आसानी से समा जाएं उसमें सूदखोर

वैसे सरकार को अभी फुर्सत नहीं है
अक्सर सरकार को फुर्सत नहीं होती
लेकिन उसकी मंशा पर शक मत कीजिए
वह रोकना चाहती है किसानों की आत्महत्याएं
स्त्रियों के प्रति बढ़ती दुर्घटनाएं
वह दलितों-आदिवासियों को उनका हक दिलाना चाहती है
वह बहुत कुछ ऐसा करना चाहती है
कि बदल जाए देश का नक्शा
लेकिन अभी व्यवधान न डालिए
इस समय वह व्यस्त है विदेशी पूंजीपतियों के साथ
स्थायी संबंध विकसित करने के लिए चल रही एक दीर्घ वार्ता में

यकीन जानिए उसे बिल्कुल नहीं पता
कि बाहर हो रही है मूसलाधार बारिश
और जनता भींग रही है

इस क्षण वह विदेशी मेहमानों के साथ
चुस्कियाँ ले रही है साफ्ट ड्रिंक की
चबा रही है अंकल चिप्स
और बाहर जनता भींग रही हैं
साहब लोक रेनकोट ढूँढ रहे हैं
और हजारों -लाखों टन अनाज सड़ रहा है
सरकारी गोदामों के बाहर।

सपने अधूरी सवारी के विरूद्ध होते हैं
स्वप्न पालना
हाथी पालना नहीं होता
जो शौक रखते हैं
चमचों, दलालां और गुलामों का 
कहे जाते हैं स्वप्नदर्शी सभाओं में
सपने उनके सिरहाने थूकने भी नहीं जाते

सृष्टि में मनुष्यों से अधिक हैं यातनाएं
यातनाओं से अधिक हैं सपने
सपनों से थोड़े ही कम हैं सपनों के सौदागर

जो छोड़ देते हैं पीछा सपनों का
ऐरे -गैरे दबावों में
फिर लौटते नहीं सपने उन तक

सपनों को कमजोर कन्धे
और बार-बार चुंधियाने वाली आँखें
रास नहीं आतीं

उन्हें पसन्द नहीं वे लोग
जो ललक कर आते हैं उनके पास
फिर छुई-मुई हो जाते हैं

सपने अधूरी सवारी के विरूद्ध होते हैं।

 

घर प्रतीक्षा करेगा

जो नहीं लौटे
घर उनकी प्रतीक्षा करेगा

यह सच बार-बार झांकेगा पुतलियों में
जो समा गए धरती में
जिन्हें पी लिया पानी ने
जो विलीन हो गए धूप और हवा में
वे लौटेंगे कैसे कहाँ से 
फिर भी घर उनकी प्रतीक्षा करेगा

सृष्टि में किसी के पास नहीं
घर जैसी स्मृति

घर कुछ नहीं भूलता
लोग भूल जाते हैं घर।

गाँव का दक्खिन हो गया है “आखिरी आदमी“ 

मौसम बदल रहा है
गाँव में सुगबुगाहट है चुनाव की
अब प्रधानी में बहुत पैसा है

खड़ंजा हो बाँध हो बिजली हो बाढ़ हो अकाल हो
प्रधान की पौ-बारह रहती है

अब भी दफ्तरों में टंगती हैं
महात्मा गांधी और डॉक्टर अम्बेडकर की तस्वीरें
पर कोई ताकना भी नहीं चाहता
महात्मा गांधी के “आखिरी आदमी“  की तरफ
डॉक्टर अम्बेडकर के सपनों की तरफ

इन दिनों लोकतंत्र में
गाँव का दक्खिन हो गया है “आखिरी आदमी “

पिछली बार पाँच लोग मारे गए थे मेरे गाँव में 
प्रधानी के चुनाव में 
निकलने नहीं दिया था जबरों ने 
दलितों को उनकी बस्ती से
उनके वोट खा गए थे वे 
सरकारी योजनाओं की तरह

किसान बदहाल हैं 
मर रहे हैं भरी जवानी में
जो बचे हैं उनकी जेबें इस कदर खाली हैं
कि वे भर नहीं सकते बच्चों की फीस
उनके घर में नहीं हैं
किसी के बदन पर साबूत कपड़े

लड़कियाँ भी महफूज नहीं हैं
गाँवों में

अब फिर चुनाव सिर पर है
धीरे-धीरे गर्म हो रही है हवा
लोग अकन रहे हैं एक दूसरे की कानाफूसी
मैदान में उम्मीदवार भी कई हैं
पर “आखिरी आदमी “ को 
“कोई उम्मीद बर नहीं आती
कोई सूरत नजर नहीं आती
आगे आती थी हाल-ए-दिल पे हँसी
अब किसी बात पर नहीं आती।“

तुम्हारे साथ चलते हुए

कल वसंत पंचमी थी
हम घूमते रहे थे
शहर में
शहर की कई फुलवारियों में

फूलों का निमंत्रण
मादक हो न हो
होता है पवित्र निश्छल विश्वासभीना
मैंने कल ही जाना यह
तुम्हारे साथ चलते हुए

और आज इस क्षण
जब घर में पूरा कर रहे हैं हम
अपने-अपने हिस्से का काम
तुमने बाँध रखा है सिर को तौलिए से
निकाल रही हो झाले कोने-अंतरे से
उन्हीं में से एक-दो आ गिरे हैं तौलिए पर
लटक रहे हैं तुम्हारे गालों पर

ऐसे में तुम अजब-गजब दिखती हो
मेरे टोकने पर हँस देती हो
और सचमुच बदल जाता है मेरी आँखों का रंग
मुझे महसूस होता है
जैसे सृष्टि के सारे फूलों का रंग
उतर आया है तुम्हारी हँसी में। “

एक पूरा स्वप्न

हर सुबह एक नई उम्मीद की तरह हो 
हर शाम खुश हो
किसी उम्मीद के पूरा होने पर
कहीं से कोई खबर न आए
ईमान डूबने की
एक मनुष्य के लिए
यह सबसे बड़ा स्वप्न है
उसके इंसान होने के
सबसे ठोस सबूत की तरह

इस विज्ञान समय में
जब सब कुछ संभव है तब भी
मनुष्य होना मात्र एक-सा ढाँचा होना नहीं है
सृष्टि में चाहे जितने विकास संभव हो जाएं
रोबोट इंसान नहीं हो सकेगा
हालांकि मनुष्य के रोबोट में बदलने के खतरे
हर रोज बढ़ रहे हैं
हर रोज बढ़ रही है खाई
मनुष्य-मनुष्य के बीच 
अमीरी-गरीबी के बीच
राष्ट्र-राष्ट्र के दरम्यान

आजकल ऐसे लोग बढ़ते जा रहे हैं
जिनके होने से शर्मिंदा हैं पशु

प्रतिदिन कम हो रहा है आदर
मनुष्य का मनुष्य के लिए
घट रही है संवदेनशीलता
हर क्षण बढ़ रही है आकांक्षा
बढ़ रहा है शक्ति-विमर्श
हर क्षण के हजारवें अंश तक तीव्रतर है लालसा
शक्ति की महफिलों में कोरस का अंग बनने के लिए

निरंतर छीज रहा है आत्मा का रसायन 
सूख रहा है मनुष्यता का जीवद्रव्य

एक कम मनुष्यता वाले समय में
चुनौती का शिखर है बचाना
एक साबूत मनुष्य का एक पूरा स्वप्न।

पत्नी पूछती है कुछ वैसा ही प्रश्न
जो कभी पूछा था माँ ने पिता से

ए जी, ये लोकतंत्र क्या होता है?

पूछा था माँ ने पिता जी से
कई वर्ष पहले जब मैं किशोर था

माँ के सवाल पर
थोड़ा अकबकाए फिर मुस्कुराए थे पिताजी

माँ समझ गयी थी
वे टाल रहे हैं उसका सवाल
उसने फिर पूछा था -
बताइए न, ये लोकतंत्र क्या होता है?

अब पिता सतर्क थे
‘सतर्क’ के हर अर्थ में
उन्होंने कहा था -
तुम जानती हो लोकतंत्र की परिभाषा उसके निहितार्थ
पढ़ाती हो बच्चों को
फिर मुझसे क्यों पूछती हो, क्या दुविधा है?

माँ ने कहा था -
दुविधा ही दुविधा है
उत्तर की सुविधा भी एक दुविधा है
जो शब्दों में है
अभिव्यक्ति में पहुँच नहीं पाता
जो अभिव्यक्ति में पहुँचता है
जीवन में उतर नहीं पाता

ऐसा क्यों है
प्रेम की तरह लोकतंत्र दिखता खुला-खुला सा है
पर रहस्य है!

जब जो चाहे 
कभी भाषा से 
कभी शक्ति से
कभी भक्ति से
कभी छल कभी प्रेम से
अपनी सुविधा की व्याख्या रच लेता है
और काठ के घोड़े-सा लोकतंत्र टुकुर-टुकुर ताकता रह जाता है

यह सब कहते हुए
स्वर शांत था माँ का

कोई उद्विग्नता, क्षणिक आवेश, आवेग, आक्रोश न था उसमें
जैसे कही गई बातें महज प्रतिक्रिया न हों
निष्पत्तियाँ हों सघन अनुभव की
लोकतंत्र की आकांक्षा से भरे एक जीवन की

और यह सब सुनते हुए
जादुई वाणी वाले सिद्ध वक्ता मेरे पिता
चुप थे बिलकुल चुप
जैसे मैं हूँ इस समय
उस संवाद के ढाई दशक बाद
अपनी पत्नी के इस सवाल पर
ए जी, ये बराबरी क्या होती है?

खेतों का अस्वीकार

आज ज्योंही मैं पहुँचा
गाँव के गोंइड़े वाले खेत में
उसने नजर उठाकर देखा पल भर
फिर पूछा
कहो बाबू, कहाँ से आए हो
कुछ-कुछ शहरी जान पड़ते हो?

लगता है
कोई जान-पहचान है इस गाँव में
इधर निकल आए हो शायद निवृत होने!

मैं अचरज में पड़ा हुआ
किंकर्तव्यविमूढ़-सा खड़ा हुआ
ताकने लगा निर्निमेश उसको
जिसकी मिट़्टी में लोट-लोट लहलोट हुआ
मैं बचपन में खेला करता था

मैं भागा तेज वहाँ से
पहुँचा नदी किनारे वाले चक में
चक ने देखा मुझको
कुछ चकमक-चकमक-सा लगा उसे
थोड़ी देर रहा चुप वह
फिर पूछा उसने
किसे ढूंढ रहे हो बाबू
इतनी बेसब्री से
यहाँ तो आँसू हैं
हत सपने हैं
अकथ हुई लाचारी है
लेकिन तुम कुछ अलग-अलग दिखते हो
कहाँ रहते हो?

इधर कहाँ निकल आए हो
यहाँ धूल है मिट्टी है
सड़क के नाम पर गिटट्ी है
चारों ओर पसरा हुआ
योजनाओं का कीचड़ है

ख़ैर छोड़ो, कहाँ से आए हो
क्या करते हो
आखिर इतना चुप क्यां हो
क्या कभी नहीं कुछ कहते हो?

मैं ठकुआया खड़ा रहा
बहता रहा आँखों का द्रव
मैं भूला
भूला रहा बरस-बरस बरसों-बरस जिन खेतों को
यही सोच-सोच कि मालिक हूँ उनका
उन खेतों ने सचमुच मुझको भुला दिया था

कुछ देर
मैं अवसन्न खड़़ा रहा सच के सिरहाने

देवियो-सज्जनो
मालिक बनने को उत्सुक लोगो
आज उन खेतों ने 
मुझे पहचानने से इंकार कर दिया है
जिनके मालिक थे मेरे दादा
उनके बाद मेरे पिता
और उनके बाद मैं हूँ
बिना किसी शक-सुबहें के 

आप सब अचरज में पड़ गए हैं सुनते-सुनते
यकीन नहीं कर पा रहे मेरी बातों का
पर सच यही है सोलह आना
कि मैं मालिक हूँ जिनका खसरा खतौनी में
उन खेतों ने
मुझे पहचानने से इंकार कर दिया है।

 

जब धर्म ध्वजाएं लथपथ हैं मासूमों के रक्त से

कल इकतीस जुलाई है
जहाँ-तहाँ याद किए जाएंगे प्रेमचंद
हो सकता है सरकार की ओर से जारी हो कोई स्मरण-पत्र
पर क्या सचमुच अब लोगों को याद आते हैं
प्रेमचंद या उन्हीं की तरह के दूसरे लोग?

एक सच यह भी है 
परिवर्तन के लिए जूझ रहे लोग
यकीन नहीं कर पाते
सरकारी गैर सरकारी जलसों का 
वे गला खखारकर थूकना चाहते हैं
जलसाघरों के प्रवेश द्वार पर
वे प्रेमचंद के फटे कोट और फटे जूते को
सजावट का सामान बनाना नहीं चाहते
वे उसके सहारे कुछ कदम और आगे जाना चाहते हैं

वे जानते हैं इस महादेश में
फटा कोट और फटा जूता पहनने वाले अकेले नहीं थे प्रेमचंद
आज भी करोड़ों ‘गोबर’
जी रहे हैं जूठन पर
उनके हिस्से में फटा कोट और फटा जूता भी नहीं है

वे प्रेमचंद के उस जीवन-प्रसंग का महिमा मंडन नहीं करते
उसे बदल लेते हैं अपनी ताकत में
प्रेमचंद की चेतना को घोल लेते हैं अपने रक्त में 
बना लेते हैं अपना जीवद्रव्य

ये वे लोग हैं
जिन्हें अब भी यकीन है
‘साहित्य राजनीति के पीछे नहीं
आगे चलने वाली मशाल है’

वैसे कल सचमुच इकतीस जुलाई है
और यह महज संयोग हो सकता है
मगर एक तथ्य है
कल ही बीती है उनतीस जुलाई
जब देश भर में मनाई गई ईद
और एक खबरिया चैनल के ‘एंकर’ ने
याद किया ‘ईदगाह’ को लेकिन
हामिद की दादी को भूलवश बता गया उसकी माँ

कुछ साहित्य प्रेमी नाराज हैं इस घटना से
उनका कहना है
पूरी तैयारी से आना चाहिए ‘एंकर’ को

इस विवाद पर एक मित्र का कहना है
इस स्मरण को उस तरह न देखें
जैसे देखते हैं बहुसंख्यक
इसे अल्पसंख्यकों की निगाह से देखें
और सोचें कि जब पूरी दुनिया में घमासान है धर्मां के बीच
जब कत्ल हो रहे हैं बच्चे, बूढ़े, जवान और लूटी जा रही हैं स्त्रियाँ
जब धर्म ध्वजाएं लथपथ हैं मासूमों के रक्त से 
तब हिन्दी के एक ‘एंकर’ को याद तो है ‘ईदगाह’।

वे योद्धा हैं नई सदी के
जो गा रहे हैं
नई संस्कृति के सृजन का गीत

जब वे बोलते हैं हमें महसूस होता है
वे हमारा अपमान कर रहे हैं
जबकि वे सदियों की चुप्पी का समापन करते हुए
बस मुँह खोल रहे होते हैं

उन क्षणों में वे अकन रहे होते हैं
अपनी आवाज का वज़न
महसूस रहे होते हैं उसका सौन्दर्य 
और हम डर जाते हैं

वे हमसे पूछना नहीं 
अपने हक़ का भूगोल स्वयं बताना चाहते हैं
संस्कृति की उपलब्ध सभी टीकाओं को
सहर्ष समर्पित करना चाहते हैं अग्नि को
कहीं कोई दुविधा नहीं है उनमें
वे नई संस्कृति के अग्रधावक हैं सौ फीसद

इन दिनों उनकी वाणी से हो रही अम्ल वर्षा
विषाद है उनके पूर्वजों का
उसका कोई लेना-देना नहीं
किसी आम किसी खास से

वे अनन्त काल से चलती चली आ रही 
गलतियों पर अंतिम ब्रेक लगाना चाहते हैं
भस्म करना चाहते हैं
उस चादर के अंतिम रेशे को भी
जो कवच की तरह काम आती रही पुराण पंथियों के

सचमुच वे योद्धा हैं नई सदी के
हमारा विश्वास करीब लाएगा उन्हें
वे हमारे खिलाफ नहीं वंचना के विरुद्ध हैं
निश्चय ही हमें इस संग्राम में
होना चाहिए उनके साथ।

संजना तिवारी 

आप निश्चित ही जानते होंगे
एश्वर्य राय, प्रियंका चोपड़ा, कैटरीना कैफ़
एंजलीना जोली, सुष्मिता सेन सहित कई दूसरों को भी
और यकीन जानिए मुझे रत्ती भर भी ऐतराज नहीं
कि आप जानते हैं
ज़माने की कई मशहूर हस्तियों को

लेकिन क्या आप जानते हैं संजना तिवारी को भी ?

संजना तिवारी ने अभिनय नहीं किया 
एकता कपूर के किसी धारावाहिक में
वे किसी न्यूज़ चैनल की एंकर भी नहीं हैं

मेरी अधिकतम जानकारी में उन्हांने
कोई जुलूस नहीं निकाला कभी

चमक-दमक
लाभ -हानि
प्रेम और घृणा के गणित में पड़े संसार को 
ठेंगा दिखाती हुई      
वे फुटपाथ पर बेचती हैं दुनिया का महान साहित्य
और उन पत्रिकाआें को जिनमें 
शृंगार, जिम और ‘मुनाफे’ पर कोई लेख नहीं होता

वैसे वे चाहतीं तो खोल सकती थीं
प्रसाधन का कोई छोटा-सा स्टोर
या ढूँढ सकती थीं अपने लिए कोई नौकरी
न सही किसी मल्टीनेशनल कम्पनी में 
किसी प्रकाशन संस्था में टाइपिस्ट की ही सही

ऐसा तो हो नहीं सकता
कि कोई घर न हो उनका
और यह कैसे हो 
कि घर हो और उम्मीद न हो

यह कहने-सुनने में चाहे जितना अटपटा लगे
पर सच यही है
घर और उम्मीद में वही रिष्ता है
जो साँसों और जीवन में होता है
खै़र, छोड़िए इन बातों को 
और थोड़ी देर के लिए
दुनिया को देखिए संजना तिवारी की निगाह से
जो इस बेहद बिकाऊ समय में
अब कम-कम बिकने वाली
सपनों से भरी उन इबारतों को बेचती हैं
जो फर्क़ करना सिखाती हैं
सपनों के सौदागरों और सर्जकों के बीच

संजना तिवारी महज एक स्त्री का नाम नहीं है
किताबें बेचना उनका खानदानी व्यवसाय नहीं है
वे किसी भी ‘साहित्यिक’ से अधिक जानती हैं
साहित्यिक पत्रिकाओं के बारे में

वे सुझाव भी देती हैं नए पाठकों को
कि उन्हें क्या जरूर पढ़ना चाहिए

संजना तिवारी महज एक नाम नहीं
तेजी से लुप्त हो रही एक प्रवृत्ति हैं
जिसका बचना बहुत जरूरी है

और जाने क्यों मुझे
कुछ-कुछ यकीन है आप सब पर
जो अब भी पढ़ते-सुनते हैं कविता
जिनकी दिलचस्पी बची हुई नाटकों में 
जिनके सपनों का रंग अभी नहीं हुआ है धूसर

इसलिए अगली बार जब भी जाइएगा मण्डी हाऊस
श्रीराम सेण्टर के सामने
पेड़ के नीचे दरी पर रखी सैकड़ों किताबों-पत्रिकाओं में से
कम से कम एक जरूर ले आइएगा अपने साथ

और यकीन रखिए आपका यह उपहार
किसी और पर फर्क़ डाले न डाले
दाल में नमक जितना ही सही
जरूर डालेगा अगली पीढ़ी पर।


विद्रोह

प्रकाश भेद देता है
अंधकार की हर माया 
उम्मीद की फसल लहलहाती है
उजाले का साथ पाकर

एक भकजोन्हिया
धीरे से कर देता है विद्रोह
सनातन दिखने वाले अंधकार के विरूद्ध
और दोस्त, तुम अब भी पूछ रहे हो
बताओ तुम्हारी योजना क्या है!

_____________________

​जितेन्द्र श्रीवास्तव, जन्म उ.प्र. के देवरिया जिले की रुद्रपुर तहसील के एक गाँव सिलहटा में। बी.ए. तक की पढ़ाई गाँव और गोरखपुर में। जे.एन.यू., नई दिल्ली से हिन्दी साहित्य में एम.ए., एम.फिल और पी-एच.डी.। एम.ए. और एम.फिल. में प्रथम स्थान।

प्रकाशित कृतियाँ : कविता - इन दिनों हालचाल, अनभ्ै कथा, असुन्दर सुन्दर, बिल्कुल तुम्हारी तरह, कायान्तरण, कवि ने कहा। हिन्दी के साथ-साथ भोजपुरी में भी लेखन-प्रकाशन। कुछ कविताएं अंग्रेजी, मराठी, उर्दू, उड़िया और पंजाबी में अनूदित। लम्बी कविता सोनचिरई की कई नाट्य प्रस्तुतियाँ।

आलोचना- भारतीय समाज, राष्ट्रवाद और प्रेमचंद, शब्दों में समय, आलोचना का मानुष-मर्म, सर्जक का स्वप्न, विचारधारा, नए विमर्श और समकालीन कविता, उपन्यास की परिधि।संपादन- प्रेमचंद : स्त्री जीवन की कहानियाँ, प्रेमचंद : दलित जीवन की कहानियाँ, प्रेमचंद : स्त्री और दलित विषयक विचार, प्रेमचंद : हिन्दू-मुस्लिम एकता संबंधी कहानियाँ और विचार, प्रेमचंद : किसान जीवन की कहानियाँ, प्रेमचंद : स्वाधीनता आन्दोलन की कहानियाँ, कहानियाँ रिश्तों की ¬(परिवार)। भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली से प्रकाशित गोदान, रंगभूमि और ध्रुवस्वामिनी की भूमिकाएँ लिखी हैं। प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका ‘उम्मीद’ का संपादन।

पुस्कार-सम्मान- कविता के लिए भारत भूषण अग्रवाल सम्मान और आलोचना के लिए देवीशंकर अवस्थी सम्मान सहित हिन्दी अकादमी दिल्ली का ‘कृति सम्मान’, उ.प्र. हिन्दी संस्थान का ‘रामचन्द्र शुक्ल पुरस्कार’, उ. प्र. हिन्दी संस्थान का ‘विजयदेव नारायण साही पुरस्कार’, भारतीय भाषा परिषद्, कोलकाता का युवा पुरस्कार, डॉ. रामविलास शर्मा आलोचना सम्मान परम्परा ऋतुराज सम्मान और रश्मिरथी सम्मान।

देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में जितेन्द्र श्रीवास्तव के कवि-कर्म पर अब तक सात शोध कार्य हो चुके हैं। प्रख्यात आलोचक प्रो. अरुण होता ने जितेन्द्र श्रीवास्तव के कवि-कर्म पर ‘‘सृजन का आयतन’’ नाम से एक आलोचनात्मक पुस्तक का संपादन किया है, जिसमें हिन्दी के सुप्रसिद्ध आलोचकों और कवियों के आलेख संकलित हैं।  

जीविका, अध्यापन। कार्यक्षेत्र पहाड़, गाँव और अब महानगर। राजकीय महाविद्यालय बलुवाकोट, धारचूला (पिथौरागढ़), राजकीय महिला महाविद्यालय, झाँसी और आचार्य नरेन्द्रदेव किसान स्नातकोत्तर महाविद्यालय, बभनान, गोण्डा (उ.प्र.) में अध्यापन के पश्चात इन दिनों इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के मानविकी विद्यापीठ में अध्यापन ।

सम्पर्क : हिन्दी संकाय, मानविकी विद्यापीठ, ब्लॉक-एफ, इग्नू, मैदान गढ़ी, नई दिल्ली-68, ई-मेल- jitendra82003@gmail.com

 

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