अमन त्रिपाठी की पांच कवितायेँ

१.
वे कभी चुप नहीं होते
किसी डिब्बे में फैले होते हैं शुरू से अख़ीर तक
और उनका कोई न कोई समूह
बोलता रहता है अनवरत
मसलन
यह ट्रेन कहाँ पहुँची है
यह ट्रेन कितनी देर में पहुँचेगी -
दुर्ग
जम्मूतवी
एलटीटी
अमृतसर
यह ट्रेन कितनी धीरे चलती है
और एक गाली निकालते हैं
जाने किससे हताश होकर

जब वो नहीं बोलते
तब उनका मोबाइल बजता रहता है
और आमने सामने बैठे
एक दूसरे की सीट पर एकान्तर पैर टिकाए
काट देते हैं बारह, चौबीस, छत्तीस घंटो का सफर

गंतव्य बदल जाते हैं
उनके चेहरे नहीं बदलते
उनकी आवाज़ें
उनकी गालियाँ
उनका एकान्तर पैर टिकाना नहीं बदलता

उनकी भयानक उदासी नहीं बदलती

_______

२.

मैंने सोचा
मैं खुल जाऊँ तुम्हारे लिए एक दरवाजे की तरह
और तुम्हारे बँधे पैरों में बँधी अनन्त यात्राएँ खोलकर
उड़ो तमाम बेड़ियों को क्षमा करते हुए

मैं चाहता था 
दुनिया की सबसे अच्छी प्रेम कविताओ के भाव
तुम तक पहुँचें मुझ से होकर

बाँधने को हमेशा बड़ी दयनीय चीज़ मानने वाले
ऐसा करना तुम्हें उन भावो में बाँधना ही होता
यह मैंने सीखा और सीखा यह कि प्रेम
बाँधना नहीं है
शब्दों में भी नहीं और भावों में भी नहीं

और तुमने मुझे विवश किया प्रेम करने को
ऐसे जैसे दूब करती है हवा से और हवा उसे सहलाते गुजरती रहती है
ऐसे जैसे चौखट करता है हर जाने वाले को विदा और आने वाले का स्वागत अनन्त काल से
ऐसे जैसे पुकारता है कोई
और आ जाती है पुकार उस तक उसे ले कर

मैंने सोचा
और मैंने तमाम लोगों को नाराज़ और मेरे प्रति ईर्ष्या से भरते देखा
उन लोगों को जो मुझसे प्रेम का दावा करते थे.

_________

३.

मैंने कभी भी
अपने संघर्षों और कष्टों का उल्लेख नहीं किया
मैं जानता था
इससे भी बहुत अधिक संघर्षों और कष्टों में
दुनिया का बहुत बड़ा हिस्सा जीता है
यह मेरे शर्म और शील की कसौटी भी थी
लेकिन 
यह केवल इतना ही नहीं था
यह मेरी नौकरशाहों और दुनिया की तमाम क्रूरताओं के प्रति एक डरपोक चुप्पी थी
जो कि शर्म और संकोच की चादर तले
बजबजा रही थी

_______

४.

दप दप नहीं करता है रक्त
बजता है अन्दर
घट एक सूखा
पानी - पानी !

***

एक बच्ची 
संवाददाता से पूछती है-
'पानी हमारे सामने से जाता है
पर पानी हमारा नहीं है
क्या हम पानी नहीं पीते -
बताओ ?'

गूँजता है देर तक
बताओ...?
बताओ सभ्यता
बताओ लोगों
बताओ सरकारों
क्या हम पानी नहीं पीते ?

***

आसान है सुन लेना
'अल्लाह मेघ दे
पानी दे
छाया दे रे तू...'
आसान है ख़बरें पढ़ लेना
आसान है चर्चाएँ विमर्श
बहुत आसान है यह लिख लेना

बहुत कठिन है लेकिन
जीना पानी के लिए
पानी के लिए मर जाना

_______________

५.

बुन्देलखण्ड
***

मैं - बुन्देलखण्ड
गौरवशाली अतीत का साक्षी एक भू-खण्ड
लड़ रहा हूँ वर्तमान में सतत अस्तित्व को
बच रहा हूँ अब तक

मैं यह स्वीकारता हूँ
बिना किसी झिझक और शर्म के
कि मेरा दो तिहाई हिस्सा
तड़प रहा है बिना पानी

मुझे शर्म नहीं है क्योंकि
ये मेरी गलती नहीं है
हाँ, दुःख है मुझे
कि इन सात सालों में
मेरे ऊपर हजारों किसानों ने
समय से पहले आखिरी साँस ली
यह एक सरकारी आंकड़ा मात्र है
जिसका उन किसानों की
और उनके परिवारों की पीड़ा से कोई सम्बन्ध नहीं

इसका सम्बन्ध मुझसे है
मेरे लिये यह आँकड़ा मात्र नहीं
ऐसी हर एक मृत्यु मेरी एक 
शिरा सूखने के बराबर है

मुझे इसका कष्ट है
कि जो लड़कियाँ मेरे ऊपर खेलती थीं
खिलखिलाती हँसती पढ़ने जाती थीं
अब ससुराल जा रही हैं उसी उम्र में
मेरी जमीन से दूर कहीं
जहाँ पानी हो !
न जाने ऐसी जगह कहाँ होगी

मुझे सालती हैं उन बच्चों की आँखें
जिनका परिवार चला गया है
दूर कहीं कमाने
और वो यहीं रह गये हैं
क्योंकि पढ़ना है उन्हें
जब शाम बीते वो अपनी माँओं से
बात करते हैं
मैं अपने भीतर पानी तलाशता हूँ
कहीं कोई बूँद अतिरिक्त !

मुझे चिंता नहीं है
कि मेरी जमीन फटती जा रही है
मैं उस पर दरारें नहीं गिनता हूँ
मुझे फिक्र है उन पेड़ों की
जो गुजरते किसी यात्री को मालूम पड़ते हैं
धरती का एकमात्र बचा वृक्ष/
मैं आश्चर्यचकित हूँ यह सोचकर
कि उन पेड़ों के पास इतना पानी कहाँ से आता है
कि बचे रह जाते हैं वो छाँह भर
हौसला भर -

मुझे कौतूहल है इस बात का
कि मैं तो जमीन हूँ
पत्थर !
मुझे में इतनी पीड़ा, इतनी चिन्ता कहाँ से है

यह जानना है मुझे/
कि पानी दरअसल मर कहाँ रहा है !

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