राजेन्द्र राजन की दो कविताएं

मनुष्यता के मोर्चे पर
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मैं जितने लोगों को जानता हूं
उनमें से बहुत कम लोगों से होती है मिलने की इच्छा
बहुत कम लोगों से होता है बतियाने का मन
बहुत कम लोगों के लिए उठता है आदर-भाव
बहुत कम लोग हैं ऐसे
जिनसे कतराकर निकल जाने की इच्छा नहीं होती
काम-धंधे खाने-पीने बीवी-बच्चों के सिवा
बाकी चीजों के लिए बंद हैं लोगों के दरवाजे
बहुत कम लोगों के पास है थोड़ा-सा समय
तुम्हारे साथ होने के लिए
शायद ही कोई तैयार होता है
तुम्हारे साथ कुछ खोने के लिए।
 
चाहे जितना बढ़ जाय तम्ुहारे परिचय का संसार
तुम पाओगे बहुत थोड़े-से लोग हैं ऐसे
स्वाधीन है जिनकी बुद्धि
जहर नहीं भरा किसी किस्म का जिनके दिमाग में
किसी चकाचौंध से अंधी नहीं हुई जिनकी दृष्टि
जो शामिल नहीं हुए किसी भागमभाग में
बहुत थोड़े-से लोग हैं ऐसे
जो खोजते रहते हैं जीवन का सत्त्व
विफलताएं कम नहीं कर पातीं जिनका महत्त्व
जो जानना चाहते हैं हर बात का मर्म
जो कहीं भी हों चुपचाप निभाते हैं अपना धर्म
 
इने-गिने लोग हैं ऐसे
जैसे एक छोटा-सा टापू है
जनसंख्या के इस गरजते महासागर में।
 
और इन बहुत थोड़े-से लोगों के बारे में भी
मिलती हैं शर्मनाक खबरें जो तोड़ती हैं तुम्हें भीतर से
 
कोई कहता है वह जिंदगी में उठने के लिए गिर रहा है
कोई कहता है वह मुख्यधारा से कट गया है
और फिर चला जाता है बहकती भीड़ की मझधार में
कोई कहता है वह और सामाजिक होना चाहता है
और दूसरे दिन वह सबसे ज्यादा बाजारू हो जाता है
कोई कहता है बड़ी मुश्किल है सरल होने में।
 
इस तरह इस दुनिया के सबसे विरल लोग
इस दुनिया को बनाने में
कम करते जाते हैं अपना योग
और भी दुर्लभ हो जाते हैं
दुनिया के दुर्लभ लोग।
 
और कभी कभी
खुद के भी कांपने लगते हैं पैर
मनुष्यता के मोर्चे पर अकेले होते हुए।
 
सबसे पीड़ाजनक यही है
इन विरल लोगों का और विरल होते जाना।
 
एक छोटा-सा टापू है मेरा सुख
जो घिर रहा है हर ओर
उफनती हुई बाढ़ से
जिस समय कांप रही है पृथ्वी
मनुष्यों की संख्या के भार से
गायब हो रहे हैं
मनुष्यता के मोर्चे पर लड़ते हुए लोग।
 
 
बामियान में बुद्ध
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निश्चिंत होकर वे जा चुके थे उस सुनसान जगह से
अपनी तोपों बंदूकों बचे हुए विस्फोटकों
और अट्टहासों के साथ
अपनी समझ और अपनी हुकूमत के बीच
कि उनके मुल्क की जमीन पर
उनके इतिहास में
अब कहीं नहीं हैं बुद्ध
जहां वे खड़े थे पहाड़ जैसी मजबूती से
वहां से भी मिटा गिए उनके नामोनिशान।
 
अब कोई नहीं था उस सुनसान जगह में
जहां पत्थर भी कुछ कहते जान पड़ते थे
वहां हर शब्द था डरा हुआ
हर चीज खामोश थी दहशत से दबी हुई
हवा में बस एक सामूहिक अट्टहास था बेखौफ
जो बामियान के पहाड़ों को
रह-रह कर सुनाई देता था।
 
तप रही थी जमीन तप रहा था आसमान
पहाड़ के टूटने की आवाज
धरती की दरारों में समा गई थी
हवा में फैल गई बारूद की गंध
सब दिशाओं में फैल गई थी।
 
तीन दिन बाद जब वहां कोई नहीं था
हर तरफ डरावना सन्नाटा था वहां नमूदार हुआ
लंबी नाक और चौड़ी ठोड़ी वाला एक पठान
तपती जमीन पर वह नंगे पांव बढ़ा उस तरफ
तीन दिन पहले जहां पर्वताकार बुद्ध थे
और अब एक बड़ा सा शून्य था
उस खाली अंधेरी जगह के पास जाकर वह रुक गया
कुछ पल खामोश रहा फिर सिर झुका कर उसने कहा-
क्षमा करें भगवन् !
क्षमा करें!
 
बुद्ध ने आवाज पहचानी
यह खान अब्दुल गफ्फार खां होंगे
फिर अपनी कोमल संयत गंभीर आवाज में बोले
मैं जानता था आप अवश्य आएंगे भंते!
कृपया इधर चले आएं इधर छाया में
आपके पांव जल रहे होंगे।
 
सकुचाए लज्जित-से खान अब्दुल गफ्फार खां
बुद्ध के थोड़ा और निकट गए
फिर सुना-
 
किसी को क्षमा करने का अधिकारी मैं नहीं
जो क्षमा कर सकते थे अब नहीं हैं
वे विलुप्त पथिक
अक्षय शांति के खोजी
जिनकी खोज और साधना के स्मारक नष्ट किए गए।
 
खान अब्दुल गफ्फार खां की आवाज अब भी नम थी-
यहां जो हुआ उससे पीड़ा हुई होगी भगवन्!
 
पीड़ा नहीं
दुख हुआ है भंते
जब कोई सृजन विध्वंस के उन्माद का शिकार होता है
दुख होता है
पर पीड़ा का प्रश्न नहीं
जब मैं शरीर में था एक दिन अंगुलिमाल गरजा था
रुक जाओ भिक्षुक वहीं रुक जाओ
पर मैं रुका नहीं
जैसे कुछ हुआ न हो मेरे कदम आगे बढ़े निष्कंप
जो कंप सकता था वह मेरे भीतर से विदा हो चुका था।
 
खान अब्दुल गफ्फार खां थोड़ा सहज हुए
बुद्ध ने उनकी आंखों में झांका:
यह क्या, आपकी आंखें गीली क्यों हैं भंते
 
मुल्क की हालत ठीक नहीं है भगवन्!
बरसों से हर तरफ खून से सने हाथ दिखाई देते हैं
मारकाट जैसे रोज का धंधा है
सब किसी न किसी नशे में डूबे हैं
होश का एक कतरा भी खोजना मुश्किल है
डर का ऐसा पहरा है कि कोई कुछ बोलता नहीं
कोई कुछ सुनता नहीं
जो बोलते हैं मारे जाते हैं
अभी तीन रोज पहले यहां जो हुआ
उससे इत्तिफाक न रखने वाले चार युवक पकड़ लिए गए
सुना है उन्हें सरेआम फांसी पर लटकाया जाएगा।
 
कुछ पल के लिए एक स्तब्ध मौन में डूब गए बुद्ध
जैसे ढाई हजार साल बाद
नए सिरे से हो रहा हो दुख से सामना
फिर सोच में डूवा उनका प्रश्न उभरा-
और, स्त्रियों की क्या दशा है भंते
 
उनका हाल बयान नहीं किया जा सकता भगवन्!
वे पशुआों से भी बदतर हालत में जीती हैं
डर और गुलामी और सजा की नकेल से बंधी हैंं वे।
 
बुद्ध असमंजस में डूबे रहे कुछ पल
कि आगे कुछ पूछें या न पूछें
फिर उन्होंने पूछा-
और किसान किस हाल में हैं भंते!
 
खान अब्दुल गफ्फर खां की अनुभव-पकी आंखों में
गांवों के रोजमर्रा के चित्र तैर गए-
फसलें सूख रही हैं भगवन्
किसानों की कोई नहीं सुनता
फाकाकशी की छाया लोटती है मेहनतकश घरों में
हुक्मरान हथियार खरीदने के अलावा कुछ नहीं करते।
 
बुद्ध और खान अब्दुल गफ्फार खां के बीच
एक सन्नाटा खिंच गया
बुद्ध को चिंतित देख
शर्म की जमीन पर खड़े बूढ़े पठान ने कहा-
भारत आपके लिए ठीक जगह नहीं है भगवन्!
 
नहीं भंते
हथियारों के पीछे पागल हैं वहां के शासक भी
बहुत छद्म और पाखंड है वहां
मानवता के संहार का उपाय कर
वे कहते हैं:
मैं मुस्करा रहा हूं!
 
इसके बाद खामोश रहे दो दुख
सहसा खान अब्दुल गफ्फार ख्रां का ध्यान टूटा
उन्होंने सूखे आसमान की तरफ नजर फिराई
लगा जैसे किसी बाज के फड़फड़ाने की आवाज आई हो
मगर चुंधियाती धूप में कुछ दिखाई नहीं पड़ा
फिर उनका ध्यान लौटा उस जगह
जो तीन दिन पहले हमेशा के लिए खाली हो गई थी
 
वहां न बुद्ध के होने का स्वप्न था न उनके शब्दों का अर्थ
खान अब्दुल गफ्फार खां खड़े थे अकेले
बामियान के पथरीले सन्नाटे में।  
         
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राजेन्द्र राजन जाने माने कवि हैं. देश के प्रतिष्ठित अख़बार जनसत्ता के सम्पादकीय विभाग में वर्तमान समय  में कार्यरत हैं. 

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