प्रसिद्ध वरिष्ठ कथाकार राजेंद्र राजन की कहानी 'विदाई वेला'

गांव में खानों का आना बरसों से जारी है। बदस्तूर। अक्तूबर के अन्त नवम्बर के शुरू या फिर दीवाली के बाद वे अपने वतन से यहां आते हैं। कश्मीर में जब सर्दी दस्तक देने लगती है तो जाहिर है काम धन्धों पर उन्हें मन्दी का मार झेलनी पड़ती है। ऐसे में रोजी रोटी की तलाश में खान हिमाचल के निचले इलाकों का रूख करते हैं। खासकर ऐसी जगहों का जहां बर्फवारी न हो। कंधे पर बड़ी बड़ी आरियां और हाथों में कुल्हाड़ियां। फिरन या खूब गर्म कुर्ते पाजामें खिचड़ीनुमा दाड़ी में ये खान हर गांव की फिजां में यूं घुलमिल से जाते हैं जैसे यहीं के मूल वाशिन्दे हों। हर कोई उनके आने की प्रतीक्षा करता प्रतीत होता है।

मां को भी हर साल खानों का इन्तजार रहता है। अब्दुल गफूर, रहमान, निसार अहमद, लम्बी फेहरिस्त है। कुछ तो ऐसे हैं जिन्होंने गांव में स्थायी तौर पर क्वार्टर किराए पर ले रखे हैं। गर्मियों में छह महीने अपने वतन में लौटने के बावजूद उनका किराया मुफत भरते रहते हैं।

गफूर की उम्र साठ के आसपास है। बीस बरस से लगातार मेरे घर आ रहा है। उस रोज मैं अभी रजाई में दुबका हुआ था कि मां गफूर से बतियाने लगीं।

‘खान भाई। नीचे उतर गेट से। बैंच पर बैठो गफूर जैसे मां की आवाज सुनने के लिए व्यग्र सा था। उसे पता है मां हर साल सर्दियों में दो तीन दरख्त जरूर कटवाती हैं।

‘अम्मा! कैसी हैं तू? सेहत ठीक है न।’ बैंच पर बैठते हुए गफूर नेआत्मीयता से पूछा।’

‘सेहत, तो खत्म ही समझोगे। न मालूम कब बुलावा आ जाए?’

‘ऐसा क्यों बोलती है तू। खुदा तुझे लम्बी उम्र देगा। भली चंगी तो है। जैसा पिछले साल देखा था..... बस तू खुश रहा कर....’

‘तू आराम से बैठ बैंच पर। ठण्ड है चाय का प्याला लाती हूं तेरे लिए।’

मुझे मां की बोतं सुनकर, कोफत होने लगती है। चाय के लिए बिस्तर पर लेटे लेटे मैं गुहार लगाता हूं तो भी चाय नसीब नहीं होती।’

तू बीमार है क्या? मंजे पर पड़ा रहता है। खुद उठकर नहीं बना सकता चाय? तेरी नौकर हूं मैं क्या?’

चुप्पी साध लेने में ही भलाई है। फिर स्टील के गिलास में बूढ़ी उंगलियों में मां मटमैले कपड़े में गिलास को लपेट कर पकड़ा जाती है। अक्सर मुझे इस बात से ईष्र्या होने लगती है कि मां खान, डाकिए, बिजली फोन के बिल वाले या किसी भी उस शख्स को चाय पिलाने के लिए तत्पर रहती है जो कोई भी घर में दस्तक देता है, बैंच पर बैठकर मां से बतियाने लगता है।

‘चार पांच रूख जमीन में गिरे पड़े हैं। बरसात में उखड़ जाते हैं। उन्हें काटकर घर लाना हैै।’

‘पहले देख लेता हूं। फिर काटकर अपने साथियों से सलाह मशविरा कर लगा देंगे कोण तेरे घर।’

‘ठीक है कल आणा सवेरे। साथ चलूंगी।’

अब्दुल गफूर गाथा तो वली मौहम्मद नाम का दूसरा खान आ धमका।’ अम्मा पार साल तो तूने मुझे पेड़ों का ठेका दिया था।’े

‘ठीक है तू भी देख लेणा, पेड़ों की जो कम में काम करेगा उसी को मिलेगा ठेका।’

मां ने वली मौहम्मद को टरका दिया।

हर साल मां दो तीन दरख्त कटवा देती है। मैं क्या जरूरत है जब घर में दो दो गैस कनैक्शन मौजूद हैं तो चूल्हे में खपने की क्या जरूरत है? पचासी पार की हो चली है। धूंए से आंखों में जलन होती है। आंख की रौशनी कम हो चुकी है फिर भी चूल्हे में फंसे रहने में मां को मजा आता है। चूल्हे से कब मुक्त होगी?

मुझे इन खानों पर भी कुढन होती है। जंगल दरख्तों, लकड़ियों के दुश्मन। गांव में इनकी पदचाप शुरू हुई नहं कि समझो पेड़ों की शामत आई। एक दरख्त की कीमत भले ही हजार दो हजार हो, काट कर, मौछे कर घर तक पहुंचाने में चार पांच हजार मांग लेते हैं। चंद घण्टों में ही पेड़ का सफाया कर घर पहुंचा देते हैं।

मां ने कब गफूर को ठेका दे दिया मुझे पता ही नहीं चला। सब चुपके से कर जाती है। उसे पता है मुझसे सलाह मशविरा करेगी तो मैं उसे दरख्त कटने से रोकूंगा। दलीलों से उसे पराजित करने का प्रयास करूंगा।

ये खान भी न मालूम किस मिट्टी के बने हैं? इतनी ताकत कहां से संजो कर रखते हैं अपने शरीर में। चन्द घण्टों में ही दरख्तों का सफाय कर उनके मालिक के घर पहुंचा देते हैं।

इस बार मां ने पांच पेड़ कटवा दिये। तीन गिरे हुए थे। दो सही सलामत थे। जैसे जैसे पेड़ कटते गये घर के आंगन में लकड़ियां का कोठा सजता गया। मुझे झुंझलाहट हुई तो पूछ बैठा, ‘क्यों आंगन को लकड़ियों से भर रही है। घर में कोई शादी ब्याह है क्या? फिर आंगन में कोई इस तरह लकड़ियों को ढेर सजाता है?’

‘तू रहा निरा मूर्ख। तू भूल गया। छह महीने पहले पुरोहित ने क्या कहा था?’

‘क्या कहा था?’

‘पूस से पहले ही कोई करीबी, खून के रिश्ते का माणू चल बसेगा।’

‘तो फिर?’

‘मेरा टैम आ चुका है। मेरे जाणे के बाद लकड़ियां कहां से ढोएगा? एक सूखी डाली तो काट नहीं सकता। सारा गांव हमारा दुश्मन है। एक भी लकड़ी नहीं देगा तुझे कोई। सब हराम के पीर हैं। अरे मूर्ख मेरे जाणे के बाद तुझे तकलीफ न हो इसी का इन्तजाम तो कर रही हूं।’

हे ईश्वर। मां की मति मारी गयी है। ये शहर थोडे़ ही है। गांव है। सब इकट्ठे हो जाते हैं। मद्द करते हैं अन्तेष्टि में। संवेदनाएं भरी नहीं हैं यहां। मूल्य अभी भी बचे हुए हैं। मानवता का चेहरा महानगरों में भले ही घिनौना क्यों न हो गांव में बाध्य होकर ही सही, सब एक दूसरे का साथ देते हैं।

फिर मां को मेरी फिक्र क्यों? अरे भई जो मर गया उसे ठिकाने लगाने का कोई न कोई इन्तजाम तो हो ही जाता है। कस्बा भी तो दूर नहीं है वहीं से ट्राली भर कर आ जायेगी लकड़ी की।

ज्यों ज्यों आंगन में लकड़ियों का कोठा विस्तार पाने लगा मेरा दिल बैठने लगा। मुझे उन बेतरतीब काटी हुई लकड़ियों में यमदूत के प्रतीक दिखाई देने लगे। उनके काले लम्बे, कलमुल्हंे हाथ मानों मां की गर्दन को दबोचने के लिए बाज की तरह टूट पड़ रहे हो जैसे जब जब मेरी नजर आम करियाल ओई, आंवले, तूणी के दरख्तों की उन कटी हुई लकड़ियों पर पड़ती मां की मृत देह अरे तू क्यों फिक्र करता है। का निम्ब काल्पनिक मेरी आंखों के सामने कौंध जाता।

काश मां लकड़ियां का वह अम्बार आंगन से हटा लेती। उन्हें बेच देतीं या गोड के किसी कमरे में जमा कर देतीं। मगर मां से उलझने का अर्थ होता बेवजह की बहस।

‘गोड से लकड़िया निकलाने में कितनी दिक्कत होगी? आंगन में पड़ी हैं। गांव के सब लोग एक एक लकड़ी कंधों पर रखकर शमशान घाट तक ले जायेंगे।’

मेरा दिल यह सोच सोच कर डूब रहा था कि कहीं सचमुच मां की मानसिकता का कोई गहरा रिश्ता लकड़ियों से न हो? उसके तर्क मेरे कानों में गूंजते रहते। ‘अरे सारी न भी लगे तो तेरहवीं के काम आ जायेंगी न। कर्म के रोज सारे गांव को भत भी तो खिलाना ही पड़ेगा। तब भी तो जरूरत होगी लकड़ियों कीे।’

अब मैं यह सोचकर भयभीत हो गया था कि समधों का इन्तजाम के बाद मां कहीं बाजार जाकर तेरहवीं के संस्कार का सारा सामान खरीद कर घर में न रख दे। उसका कोई पता नहीं चलता। सिरफिरी जो है।

‘कम से कम मेरे मरणे पर एक लाख रूपये खर्च होगा तेरा। इतनी रकम है तेरे पास?’

मैं मां की बातों को अनदेखा करने की कोशिश करता। लेकिन वह अपनी मृत्यु के बाद की यात्रा को मेरे लिए सहज, सुगम बनाने में उतारू है। मै। जब भी उसे समझाने की कोशिश करता मुझसे उलझ पड़ती। ‘ तू कहता है कि मैं पैंशन की रकम को रूख कटवाने में जाया कर रही हूं। ओबरी में राशन का सामान भरा है। आटा, दालें, चावल, घी, रिफाइंड, चीनी सब कुछ। सामान जिसकी जरूरत तुझे मेरे बाद पड़ेगी, तो इसमें बुरा क्या है? मेरे अन्दर जिम्मेदारी की भावना है। तू तो कभी खेत खलिहाण देखने तक नहीं गया। तू क्या जाने जमीन का मोह? फसल वाहणे, निंदाई, गड़ाई, कटाई, उसे घर तक पहुंचाने में तेरा कोई हाथ है? मैं ही खपती रहती हूं जमीन से। हर साल हजारों फूंक कर भी चार सौ पांच सौ की गेहूं, मक्की तक नहीं होती। अगर मैं खेतों को बंजर छोड़ दूंगी तो बंाझ हो जायेगी जमीन। दूसरों के पशु चर जायेंगे खेत। लोग बाग सेंध लगा देंगे। हड़प जायेंगे सारे खेत। तुझे क्या पता चोरी छिपे, रात बिरात में कितने ही दरख्तों का सफाया कर चुके हैं लोग। मैं क्या रात भर जाग जाग कर पहरा दे सकती हूं खेतों में। घास, पते, पतराह, फसल तक सब साफ कर जाते हैं लोग। मैं कब तक चैकीदारी कर सकती हूं?

मैं तो रूखों पेड़ों की बात कर रहा हूं। क्या जरूरत है उन्हें कटवाने की? सर्दी में चूल्हे के लिए गोड में लकड़ियों के ढेर के ढेर लगे पड़े हैं।                                                   

‘मेरे मरने के बाद कैसे फूंकेगा मुझे? तू काटेगा हरे पेड़। कभी दराट तक पकड़ा है हाथ में?’

‘अम्मा ये बातें नहीं करते। अपशगुन होता है। मरने के बाद कुदरत खुद ब खुद अपणा काम करती है। और तू क्या आज ही .....भगवान करे तेरी लम्बी उम्र हो.....’

‘तू जा और अपणा काम कर। तुझे क्या पता दीन दुनिया का।’

सचमुच मां के समक्ष मैं खुद को कितना बौना, असहाय, अपाहिज सा महसूस करता हूं। कितनी फिक्रमंद है वो। अपनी विदाई की तैयारियों में जुटी है। मेरे लिए सचमुच शर्म से डूब मरने की बात है। वो मुझे इतना कमजोर क्यों समझती है? उसके जाने के बाद उसके संस्कार के इन्तजाम में क्या मैं कोई कोताही बरतूंगा?

मां मेरी हर छोटी बड़ी मुश्किल को सुगम बना रही है और मैं गिन्नी पित्र की तरह लगातार बौना सा होता जा रहा हूं। उसके हर काम के पीछे दायित्व बोध छिपा है। उसे यह भी पता है कि वह जो कर रही है वह रिवाज़ के मुताबिक उचित नहीं है। मगर उस पर धुन सवार है। न मालूम किन जन्मों का कर्ज अदा कर रही है? मुझे हमेशा इस बात का मलाल रहा कि मैंने जिन्दगी के साठ बसन्त देख लिए लेकिन उसे वह सुख नहीं दे पाया जिसकी वह हकदार है। मैं चाहता हूं कि मैं उसके पास बैठूं। उसके साथ सुख दुःख सांझा करूं। मगर यह हो नहीं पाता। उससे तर्क वितर्क से में लड़ता भिड़ता रहता हूं।

हर वक्त, हर लम्हा, अपराध बोध मुझे जकड़े रहता है। क्योंकि मां के चेहरे पर मैंने शायद कभी भी उस खुशी की चमक नहीं देखी जिसे देखने के वास्ते मैं सालों साल प्रतीक्षारत सा रहा हूं। उसकी उदास, पुरनम आंखों में गहराते काले कोरे मुझे विचलित करते रहते हैं। उसका दुःख, अवसाद, मूक यातना की परतों में छिपा दर्द बूंद बूंद रिसता रहता है। अक्सर मैं खुद को विस्मय से सराबोर पाता हूं। सन्नाटे, चुप्पी निस्तब्ध्ता का घना कोहरा मां के इर्द गिर्द आकार पाता जाता है। कुछ है तो एकालाप। फर्श, दीवारें, छत, घर की हर चीज जिससे गाहे-बगाहे उसका स्पर्श जुड़ा है। कमजोर ठूंठ होती उंगलियों में स्पेदन धीरे धीरे कम हो रहा है। वाण की चारपाई पर धंसी वह कभी छत, कभी दीवारों तो कभी सूनेपन को एकटक सी निहारती रहती है।                                    

मां के कमरे में ढेरों तरह के सामान का निर्जीव वजूद है तो उसके भीतर मीलों लम्बा मरूस्थल बिछा है जहां रेत के बवूलों, बवंडर के अलावा कुछ भी नहीं है। मां के भीतर पसरा बियाबान मुझे चिड़ाता है। मेरे मनोबल, आत्मविश्वास की बुनियाद को कमजोर बनाता हुआ।

एकाध दिन छोड़कर मां सुबह सवेरे ही देहरी पर आ धमकती है। उसे पता है यही वक्त है जब वह मुझसे मन की बात कह सकती है। जानती है मैं बिस्तर से उठने के बाद उसके हाथ नहीं आऊंगा। तब वह अपनी कहानियां मुझे नहीं सुना पायेगी। आवारागर्दी करने में घर से बाहर निकल जाऊंगा। उम्र का वह पड़ाव बेहद नाजुक सा होता है जब विदाई वेला दस्तक देने लगती है। बूढ़ी काया से हर कोई कन्नी काटने लगता है। एकाकीपन का दंश अभिशाप बनकर आपको भीतर ही भीतर दीमक सा खोखला करता जाता है।

‘बैंक जाणा है आज, तैयार हो जा तू।’ उहूं पहले मुझे गरमागरम चाय पिला। मेरी शर्त से वह आग बबूला हो जाती हैे, शर्म नहीं आती तेरे को। पच्चीस साल छोटा है मुझसे। खुद नहीं बना सकता चाय?’

लिहाफ के बाहर हाथ निकालते ही लगता है हाथ सुन्न हो गये हों। मूआ सूरज भी नहीं निकल रहा। कोहरे के पंजों ने समूची फिजां को अपनी गिरफ्त में ले रखा है।

‘चाय तो पिला। फिर सोचता हूं। बैंक जाणे के बारे में।’

‘तुझे मां से मोल भाव करते शर्म नहीं आती।’ उसे पता है जब तक वो कांसे के मोटे से गिलास में मुझे चाय बनाकर नहीं देगी मैं उसकी किसी बात की तरफ ध्यान नहीं देने वाला।

‘ये हर महीने बैंक जाणे की बजाय इकट्ठे पैसे क्यों नही निकाल लेती।’

‘कितणे?’

‘यही कोई चालीस पचास हजार।’

‘चोरी हो गये तो। चोर शहर से गांव की ओर भी रूख करने लगे हैं। दो चोरियां तो पिछले महीने हो चुकी हैं। कम्पलेंट लिखवाने के बावजूद पुलिस का एक भी सिपाही तक नहीं आया था तफतीश करने।’

मां बेहद समझदार है। दुनिया देखी है उसने। मुझे तो अपने सामने बच्चा समझती है। उसे डर है कहीं ज्यादा पैसे निकालणे पर मैं उससे मांग न बैठूं। या फिर चोरी छिपे उसके रुपयों पर हाथ न साफ कर दूं। उसे मुझपर कतई भरोसा नहीं है।

‘नहीं वो बात नहीं है। गांव से बाजार तक के एक चक्कर में तीन सौ का पेट्रोल जल जाता है।’

‘तू हर रोज जो गाड़ी लेकर बाजार निकलता है तो क्या तेरी गाड़ी पाणी से चलती है। भिखारियों की तरह हर वक्त मांगता रहता है मुझसे पैसे? कहां जाती है तेरी पेंशन बता?’ ठग विद्या से हर वक्त लूटता खसोटता रहता है मुझे......’

‘अम्मा तू छोड़ ये बेकार की बहसबाजी? कितणे पैसे निकालने हैं बैंक से?’

‘चल तो सही बैंक में ही बता दूंगी। पढ़ी लिखी होती तो भला क्यों लाचार होना पड़ता मुझे तेरे आगे। पढ़े लिखों के बीच अंगूठा लगाते हुए शर्म आती है मुझे’

‘बेकार की बातें मत बना। तैयार हो जा एक घण्टे में। जब तक बैंक से पैसे निकलवाकर तुझे घर नहीं छोड़ देता, तू पागल बनाकर छोड़ेंगे मुझे।’

‘हर बार पूछता है। कितणे पैसे निकालणे हैं बैंक से। कमीना कहीं का......’ मां बुडबुड़ाती रहती है। फार्म तो तू ही भरता है। फिर मुझसे क्यों पूछता है। पढ़ी लिखी होती तो तेरा सहारा क्यों लेती?’

‘सब सुणता हूं मैं तेरी बातें। हर वक्त गालियां देती रहती है मुझको। मैंने तेरा क्या बिगाड़ा है? कौण सी दुश्मनी निकाल रही है तू? अरे तू बिना पढ़े ही इतणी होशियार है। पढ़ी लिखी होती तो पूरा गांव बेच डालती।

’मां पर व्यंग्य वाण छोड़ने में मैं भी मजा लेता हूं। हर बार बैंक से पैसे निकालने के बाद उन्हें रूमाल में बांधने से पहले नोटों का मुआयना करती है। ‘देख फटे पुराने नोट ठंूस देते हैं ये बैंक वाले गड्डियों में......’ मां ठीक ही कहती है दो चार पुराने नोट तो निकल ही आते हैं। मैं उन्हें कैशियर से गुजारिश कर बदलवा देता हूं।’

‘घर लौटकर मैं पुनः मां से उलझ पड़ता हूं। ये अबकी बार तो तूने मेरी बात मान ली। एक साथ तीस हजार निकाल लिए। कोई कारज वारज करना है क्या?’

‘जग तो बेटा खुद व खुद हो जायेगा। पुरोहित की भविष्यवाणी याद है?’

’कौन सी?’

‘बताया नहीं था तुझे। कहा था तेरी मां चंद महीनों की मेहमान है। उसे सुखी रख किसी तरह। बेटा मेरा वक्त नजदीक है।’

‘तू हर वक्त ये उल जलूल बातें कर क्यों मेरा दिल छोटा करती रहती है? किसी ने चार दिन चैन से जीणां हो तो तू उन्हें भी नरक बना देती है। मरना जीना क्या तेरे मेरे हाथ में है?’

‘वो तो ठीक है पर बुजुर्गों को पहले से अंदेशा हो जाता है। दम निकला तो कहां से करेगा पैसों का इन्तजाम। कफन तक के पैसे तो तेरी जेब में नहीं होते। कार के पेट्रोल के लिए पैसे मांगता है। कैंटीन से दारू लाने के लिए पैसे मांगता है। निकम्मा जाहिल कहीं का। तिगणी-चैगणी है तेरी पेंशन मुझसे। फिर भी तेरा गुजारा नहीं होता। बक्से में अगर पैसे निकलेंगे तो कारज में ही काम आयेंगे तेरे। तेरहवीं होते होते एक लाख के नीचे आ जायेगा तू। याद है जब तेरा बाप मेरा था लकड़ी के बक्से से नोट ही नोट मिले थे। उसे पता थी तेरी हालत। वह अपणे संस्कार का प्रबंध खुद व खुद करके गया था।’

‘तो तू भी उसी राह पर चल रही है।’

‘क्यों नहीं। मैं नहीं चाहती मेरे जाने के बाद रीति रिवाजों को पूरा करने में तुझे कोई दिक्कत आये......’

‘अम्मा तू समझती क्यों नहीं। ये सब अपशगुन की बातें हैं। तू क्यों घर का माहौल खराब करने पर तुली हुई है?’

‘अब तू जा मुझसे कोई बात करने की जरूरत नहीं है। मुझे जो अच्छा लगेगा करूंगी। मेरे काम में कोई भी अड़चन खड़ी करने की जरूरत नहीं है।’

मुझे लगा चुप्पी साध लेने में ही भलाई है। दीवार से सिर टकराने से क्या फायदा? लहुलुहान तो खुद को ही होना होगा। मां को न तर्क से, न ही जोर जबरदस्ती से जीता जा सकता है। उसे मनमाफिक अपनी जिन्दगी जीने का अधिकार है।

मां मेरी हर छोटी बड़ी तकलीफ को आसान बनाने का ख्वाब बुनती रहती है। ख्वाब ही नहीं बुनती बल्कि उसे हकीकत में बदलने का पुख्ता इन्तजाम भी करती है।

सच कहती है मां। जब तक जिन्दा हूं कितना बेखबर हूं। अपनी जिम्मेदारियों से निर्वहन से कोसों दूर। घर, जमीन, फसल, पेड़, पत्तों झाड़ियों से मेरा कतई लगाव नहीं है। ये सब कुछ कितना फालतू सा लगता है। जमीन जायदाद की मुझे कोई कद्र नहं है। मां ने घर की हर छोटी बड़ी चीज को कितनी आत्मीयता, लगाव, जनून की हद तक संभाल रखा है। मकान, जमीन, खेत खलिहान सबको सीने से चिपकाए हुए है। दूध पीते बच्चे की तरह।

मां और घर एक दूजे के पर्याय बन चुके हैं। सोचता हूं जिस रोज मां नहीं रहेगी घर फूट फूट कर रोएगा। जार जार खुद को बिसरेगा। मां के विदा होते ही घर किसी कटे दरख्त सा लुढ़क जाएगा। उसका वजूद खतरे में होगा। उसकी सुध लेने वाला तब कोई नहीं होगा। घर के भीतर बाहर लिपटे सन्नाटे के साये मुझे डंसने को दौंडेगें।

पिता को विदा हुए बारह बरस बीत चुके हैं। इन सालों में मां को मिलने वाली फैमिली पेंशन में कई गुणा इजाफा हो चुका है। बाइसौ से आठ हजार। उसने अपने पोते और मेरे नाम दो दो लाख की दो एफडीआर करवा रखी है। हर साल उन्हें रीन्यू कराती रहती है। एफडीआर की मैच्योरिटी का वक्त करीब आते ही मां का राग शुरू हो जाता है, ‘ख्याल रखना। ठीक वक्त पर फिक्स रक्म का ब्याज मेरे खाते में जमा हो जाए। तेरे और तेरे बेटे के काम ही आयेंगे ये चार लाख रुपये। तुम लोगों के लिए ही तो मर खप रही हूं हर वक्त।’

‘क्यों फिक्स करवा रखा है हमारे नाम पैसे? किसी धर्म के काम लगा। मन्दिर को दान दे देती या फिर गांव के स्कूल में दो कमरे ही जोड़ देती इन पैसों से? पोते को तेरे पैसे की क्या जरूरत है? अपना कमा खा रहा है। उड़ा देगा तेरी कमाई तेरा .....। उसे कौण सी तेरी फिक्र है?’

‘तू कुछ भी बोल। खून का रिश्ता तो है न। मेरे और तेरे बाद उसी का तो है सब। अपणी धन दौलत को पराए लोगों पर क्यों लुटाऊं। परोपकार की बातें झूठी हैं। हर कोई दूसरे को लूटने में लगा है।’

मैं निरूत्तर हो जाता हूं।

‘पोता जिसके लिए वह दिन रात सोचती रहती है। उसे भला चंगा होने की खबर लेती रहती है। उसके हर बार घर आने पर दो चार हजार उसके हाथों में थमा देती है। पोता तो दादी के प्रति निर्मम सा बना रहता है। बेफिक्र। संवेदनविहीन। फोन पर कभी उसका कुशलक्षेम नहीं पूछता। घर आते ही कार पार्किंग में खड़ी कर सामान लेकर अपणे कमरे में बन्द हो जाता है। लैपटाप, मोबाइल, इंटरनेट, टीवी की दुनिया में खोया रहता है। उसे इस बात तक की परवाह नहीं होती कि घर के दूसरे कमरों में कौन है? आसपास गांव में क्या हलचल है?’

अपनी जमीन जड़ों से बेखबर, बेपरवाह, लापरवाह ये नयी पीढ़ी अपने अभिभावकों के जीवन में उपस्थित होकर भी नदारद है। फिर मैं स्वयं के बारे में भी अन्वेषण करने का प्रयास करता हूं। जब मैं स्वयं भी मां के प्रति दायित्व बोध से मुक्त सा हूं तो मैं अपने बेटे से यह कैसे अपेक्षा करूं कि वह दादी के प्रति आदर, सत्कार, संवेदनशीलता लगाव दर्शाये?

इधर एक नयी आफत ने मां को घेर लिया था।

रोजमर्रा के कामों में यह एक नयी डयूटी जुड़ गयी थी।

ऊंचे पहाड़ों से बन्दरों का निचले इलाकों में आना बदस्तूर जारी था। ऐसी भी अफवाहें थीं कि शिमला या दीगर इलाकों से बन्दरों को पकड़ पकड़ कर नीक अंधरे में निचले यानी कम ऊंचाई वाले इलाकों में छोड़ दिया जाता है। वरना बन्दर कहां मीलों लम्बी यात्रा तय कर दूसरी जगहों पर पहुंच पाते हैं।

गांव में बन्दरों की पलटन आंख खुलते ही हमला बोल देती है। पानी की टंकियां के ढकन खोल डुबकी लगाना शुरू कर देते हैं। टीवी की डिश को तहस नहस कर जाते। गलती से दरवाजा खुला रह जाये तो रसोई तक में संेध लगाकर खाने का सामान उड़ा ले जाते। छत्तों पर चढ़कर भूरी स्लेटों को अनुभवी मिस्त्री की तरह कीलों समेत उखाड़ फेंकते। उन के नीचे सीलिंग में ताक झांक करते।

बन्दरों का वह हिंसक रूप आतंक पैदा करता। मां उन्हें भगाने में एड़ी चोटी का जोर लगा देती। लेकिन भय बन्दरों से कोसों दूर था। गोड पर उनका आक्रमण नाकाबिले बर्दाश्त हो रहा था। गोड यानी पशुशाला से मां का लगाव कुछ वैसा ही था जैसे फूल खुद को कभी भी खुशबू से जुदा नहीं कर पाते। यूं तो गाय, भैंस, भेड़ बकरियों को बांधने के लिए गोड का इस्तेमाल कई साल पहले बन्द हो चुका था, उसकी सुरक्षा की चिन्ता में मां दिन रात घुली जा रही थी।

साठ साल पहले जब मिट्टी के नये घर का निर्माण नहीं हुआ था गोड ही हमारा आशियाना था। तब कई साल तक हम भैंस के मलमूत्र की दुर्गन्ध के दरम्यान, रात भर सोने के लिये हम बाध्य थे। गोड के एक कोने में ही रसोई थी। मिट्टी गारे, बांस की छत्त, घास फूस से अच्छादित गोड मां को बेहद प्रिय था।

बन्दरों ने पहले गोड को ही निशाना बनाया था। यूं उसकी एक दीवार पूरी तरह ढह चुकी थी। गोड कब धराशायी हो जाएगा कोई नहीं जानता था। इसी के डर से मैं उसके पास तक नहीं फटकता था। मगर दूसरी तरफ उसे गिराकर उसे नये सिरे से बनवाने के लिए मां योजनाबद्ध तरीके से काम कर रही थी। छत्त के लिए बांस, गज, कोती बरल आदि के लिए लकड़ी का इन्तजाम वह कर चुकी थी। पक्की ईंटों का ढेर भी लगना शुरू हो गया था। सीमेंट, रेता, बजरी यहां तक कि ठेकेदार से लेकर का प्रबन्ध उसने यूं कर लिया था जैसे वह बचपन से ही निर्माण कार्य में सिद्धहस्त हो।

मैं मां से उलझ बैठा। ‘ये तुझे कौण सी नयी धुन सवार हो गयी है। गोड गिरता है तो गिरने दे। तुणे वहां सोणा है क्या? या फिर भैंस बांधनी है। एफडी तुड़वाकर दो लाख बेमतलब ही जाया कर देगी। बिमारी शमारी में पैसे की जरूरत रहती है?’

मुझे लगा मैंने पुनः बररे के छत्ते में हाथ डाल दिया है। ‘तू खर्च कर रहा है क्या पैसे? तुझे क्यों तकलीफ हो रही है? अपणी जमीन-जायदाद को बचाने की चिन्ता नहीं है तुझे। पशु नहीं बंधते तो क्या हुआ? लकड़िया भर पड़ी हैं। बांस हैं। शटरिंग का सामान है। घास है। कहां जायेगा ये सब सामान? लोग अपने घर को संभालने के लिए एक एक चीज को जोड़ते हैं। तू चाहता है, गोड ढहता है तो ढह जाए। उसके बाद शरीक गरैत उस जमीन पर कब्जा कर लेंगे। बेवकूफ कहीं का हर वक्त पागलों सी बातें करता है। मेरे मरने के बाद बेच देगा सब। जुए, शराब, औरतबाजी में उड़ा देगा सब। राजा महाराजा के खानदान से नहीं है तू। जमीन पर रहा कर। तूने कभी घर को घर समझा है? तू, तेरी घरवाली, तेरा बेटा सब मुझे यूं देखते हैं जैसे मैं कोई डायन हूं। कमीने कहीं के। खुदगर्ज।

मां देर तक बड़बड़ाती रही। मां को अपनी निजता, स्वतन्त्रता में कोई भी दखल बर्दाश्त नहीं था। उसका अहम, अस्मिता, निर्णय लेने की क्षमता, सब सर्वोपरि थे।

बार-बार मुझे मां के समक्ष अपना अस्तित्व बौना प्रतीत होता। तर्क वितर्क से मैं उसे कभी भी नहीं जीत पाया। मुझे लगने लगा था कि गोड के प्रति मां की फिक्र वाजिब थी। पैंशन की पाई पाई को वह घर के जर्रे जरे को सुरक्षित रखने में इस्तेमाल करना चाहती है।

शायद उसका निर्णय सही था।

मां के असंख्य रूप थे।

हमारा मकान गांव के दूसरे घरों की बनिस्वत ढलान पर था। मूसलाधार बारिश के वक्त आंगन में पानी की छोटी सी झील आकार पा जाती। कई दफा पानी कमरों तक में दाखिल होकर सामान को तहस नहस कर चुका था।े पानी आंगन में जमा हो जाता। नालियां बेकाबू हो जातीं। समूचे गांव का पानी गेट पर आकर जमा होने लगता।

बादलों की तेज गड़गड़ाहट के बीच अक्सर बारिश रात के वक्त ही होती। लगता बादल फट पड़ेगा। घर को पलक झपकते ही जमींदोज कर देगा। मां और मैं इतिहास होकर रह जाएंगे।

ऐसे मुश्किल वक्त में मां बिस्तर से उठती। ढार्च ढूंढती। मिट्टी के तेल की ढिबरी जलाती। बरसों पुरानी, जर्जर, टूटी हुई छतरी लेकर गेट पर जाती। दराट से गेट पर बनी नाली में फंसा कचरा साफ करती। अगर वह ऐसा न करे तो पानी गेट से निकल कर सीढ़ियों  पर उतर जाएगा। फिर सारे घर को अपने आगोश में लेगा। नाली से तेजदार पानी के बीच से कूड़ा साफ करने के प्रयास विफल हो रहे थे। लेकिन मां वहां नाली में डटी रहती। बारिश के शोर से मेरी नींद टूट जाती। बरामदे में खड़ा मूकदर्शक सा बना मैं मां को नाली में फंसा गांव के तमाम दीगर घरों को कूड़ा, कचरा साफ करते हुए निहारता। बादलों की भयाक्रान्त गर्जन, कड़कती बिजली जब कौंधती तो एक पल के लिए लगता कि वह मां की बूढ़ी काया को कहीं लान बैठे। नाली के मुहाने पर आम का दुर्बल सा दरख्त खूब जोर से दहाड़े मारने लगता। मानों जड़ों से जुदा होने से पहले चीत्कार कर रहा हो। लेकिन आम का वह दरख्त मजबूत था। दिक्कत केवल यह थी कि गलती से बारिश से बचने के लिए अगर मां उस दरख्त से तने से चिपक जाती तो मेरा दिल बैठने लगता। ये बिजली पेड़ को ही पहले अपना शिकार बनाती है। फिर उसके साथ खड़े व्यक्ति को भी लील लेती है। मैं बारिश के शोर में मां को आम के पेड़ से दूर रहने की हिदायत देता। लेकिन मेरी गुहार बारिश के शोर में डूब जाती। नक्कारखाने में तूती की तरह।

घर को बाढ़ से सुरक्षित रखने के वास्ते मां की वह जद्दोजहद में कितने ही सालों से देख रहा था। अक्सर ऐसे विम्ब मुझे ‘मदर इंडिया’ फिल्म में नरगिस के उस दृश्य को तरोताजा कर जाते जिसमें वह खेत की मेढ़ को बाढ़ से बचाने के लिए बच्चों के साथ जूझती है, और मेढ़ से ही लिपट जाती है।

मां का मानना था कि घर की बुनियाद कमजोर हो चुकी है। बरसात का पानी बुनियाद के काफी नीचे गहरे तक जमीन को खोखला कर चुका है। यहीं नहीं घर के एक कोने में तीस साल पुराना एक सैप्टिक टेंक भी था। इसे पिता ने तब बनवाया था जब गांव में किसी ने निजी शौचालय बनाने की कल्पना तक नहीं की थी। इस मायने में वे प्रगतिशील थे। मां का कहना था कि सैप्टिक टेंक की भीतरी दीवारें टूट चुकी थीं और मल मूत्र घर की बुनियाद में दूर दूर तक मिट्टी के कणों में समा चुका था। प्रतिफल यह था कि मकान के सभी कमरों में नमी की वजह से पलस्तर झड़ने लगा था। दीमक का मूक आक्रमण दीवारों, अलमारियों लकड़ी की छत यानी हर चीज को खोखला बना चुका था।

साठ साल पुराना वह मिट्टी गारे का वह घर कब मुझे और मां को लील लेगा, हम नहीं जानते थे। मगर मां की पैंशन का ज्यादातर हिस्सा मकान की मुरम्मत में जाया हो रहा था। लेकिन हालात जस के तस थे। मुरम्मत बेअसर थी। मुरम्मत पर खर्च होने वाली रकम जैसे कूंए में डूब जाती।

मकान की पहली मंजिल के बरामदे की छत भी जबाव दे चुकी थी। बरसात का पानी बरामदे के फर्श पर यूं गिरता जैसे वहां कोई छत्त ही न हो। दरअसल गज और कांती बांस की थीं। बांस झर झर कर खोखला हो चुके थे। छत्त पर स्लेटों को थामने के लिए बांस की फ्रेम का जो ताना बाना बुना गया था वह इतना कमजोर पड़ चुका था कि उसने तीर कमान की शक्ल अख्तियार कर ली थी। स्लेटों पर बंदर, कुत्ते, बिल्लियां पक्षी धमां चैकड़ी करते। ऐसे में स्लेटें यूं टूटती जैसे कांच के गिलासों से भरी ट्रे हाथ से छूटकर फर्श पर कर्कश आवाज के साथ छोटे बड़े टुकड़ों में तब्दील हो जाए।                                                                    

बरामदे की छत्त को बदलने का अर्थ था डेढ़ दो लाख की चपत। मुझे इस बात से भी कोफत होती कि मरने से पहले मां फिक्सड डिपोजिट और पैंशन की रकम मकान के हर कोने को चुस्त दुरस्त करने, उसे पुनः सुदृढ़ कर रहने लायक बनाने उसे नया रंग रूप देने में स्वाहा किए जा रही है। जितना धन वह आज तक पिताजी के हाथों निर्मित मकान पर बहा चुकी थी, उससे नये मकान के तीन चार कमरे बनाए जा सकते थे। लेकिन मां को मै, तो क्या खुदा भी शायद समझा-बुझा नहीं सकता था।

उसकी अपनी धुन थी। अपना राग था। वो अपनी मस्ती मं जिये जा रही थी।                                

इधर मां को एक नयी समस्या ने घेर लिया है।

उसकी दोनों आंखों में मोतिया उतर आया है। वैसे यह भी कम हैरत की बात नहीं थी कि जिन्दगी के पचासी बसन्त उसने स्वस्थ रहकर बिता दिए थे। कई लोगों को तो साठ या सत्तह की उम्र में ही आंखांे में मोतिया दस्तक देने लगता है। फिर परेशन की जदोजहद शुरू होती हैं।

मोतिया के आपरेशन को लेकर गांव में तरह तरह की अफवाहें थीं। नौसिखिए डाॅक्टर के हाथों कितने ही मरीज मोतिया का आपरेशन कराने के बाद बची खुची रौशनी भी गवां चुके हैं। रेडियो, टीवी, अखबारों मंे मुफत आई आपरेशन कैम्पों में सैंकड़ों मरीजों का हमेशा के लिए अन्धा हो जाने की खबरें सचमुच चैंकाने वाली थीं। मुझे आंख के किसी अनुभवी डाॅक्टर की तलाश थी जो मां के मोतिया के आपरेशन के बाद उसे भला चंगा कर दे। इस काम में मैं कतई जोखिम नहीं उठाना चाहता था।

जब से मां ने मोतिया के आप्रेशन का राग छेड़ा है गांव में आस पड़ोस में चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया है। जैसे लोग अपनी सभी समस्याओं को भूलकर मेरी मां की आंखों के आपरेशन पर अपना ध्यान केन्द्रित कर रहे हों। जिस प्रकार हमारे न्यूज चैनलस जनता के दुःख को भुना भुनाकर टीआरपी बटोरते रहते हैं, ठीक उसी तर्ज पर गांव के लोग दूसरों के दुःख में शामिल होने की बजाय उसके बारे में अच्छी बुरी चर्चाएं फैलाकर आनन्द की अनुभूति बटोरने से गुरेज नहीं करते। अफवाहें आम फहम थीं कि मैंने अपनी बूढ़ी मां को मरने के लिए छोड़ दिया है। वह सारे काम खुद करती है और मैं कतई उसकी देखभाल नहीं करता। मां के मोतिया का आपरेशन करवाने से मैं कतरा रहा हूं। या यह कि बेटा यानी मैं बुढ़िया के मरने की प्रतीक्षा कर रहा हूं। यूं भी मरणोपरान्त के रस्मो रिवाज, संस्कारों को नियमानुसार निबटाने की पूर्व तैयारी में वह जिस प्रकार आजकल जुटी है उससे तो यही आभास मिलता है कि वह चन्दरोज की मेहमान है। अगर ऐसे पूर्वानुमान का सच मान लिया जाए तो मुझे मोतिया के आपरेशन बीस बीस हजार फूंकने का क्या फायदा है? बचे रहेंगे तो बुढ़िया के कारज पर खर्च होंगे।

जितने मुंह, उतनी बातें।                           

लोगों की फुसफुसाहटें मेरे कानों में गर्म शीशे की तरह घुल जाती हैं। मेरा अन्तर्मन, तड़प उठता है। तो क्या मुझे मां को मरने के लिए छोड़ देना चाहिए। छिः छिः। घिन्न आने लगती है मुझे अपनी ही सोच पर। अपराध बोध मुझे जकड़ लेता है। मां को यूं अनदेखा छोड़ना नाइन्साफी होगा। मेरा जमीर मुझे ताउम्र कचोटता रहेगा।                    

इधर गांव में पुरोहित का निरन्तर आना जाना लगा हुआ है। रक्षा बंधन का त्यौहार नजदीक है। हर घर में परम्परा के मुताबिक रखड़ियां बांटता फिर रहा है। पारिवारिक पुरोहित की यह रिबाज मैं बचपन से देखता आ रहा हूं। कितने प्यार से कलाई पर रखड़ी बांध जाता है। मन्त्रोचारण के साथ। लगता है सब पाप धुल गये हों।                                                                                          भीतर, बाहर का वातावरण शुद्ध हो गया हो जैसे।

‘बेटा वो पुरोहित रखड़ियां दे गया है। चार। मेरी तेरी। बेटे और बहू के लिए। बांध लेना कलाई पर जरूर।’

भाई भले ही बहन की राखी को अपनी कलाई पर सुशोभित करने का गुरेज करे, पुरोहित की बांटी हुई रखड़ियां कोई भी पहनना नहीं भूलता। आस्था की डोर पुरोहित की रखड़ियां की तरह सुदृढ़ होती है। अपने अधिपत्य को स्थापित कर ही लेती है।

पुरोहित को एक दिन मां ने अपने पास बिठा ही लिया।

‘हवन करवाना है।’

‘किस लिए?’

‘यूं ही मन है।’

मां का यह नया अलाप था। उसने पुरोहित से अपना एक ख्वाब सांझा किया था कि जिसमें उसने किसी भूत प्रेत और फिर यमदूत ने दर्शन देकर बताया था कि वह चन्द रोज की मेहमान है। हवन करव ले। आत्मा को शान्ति मिलेगी। घर भी शुद्ध रहेगा।’

कभी कभी मुझे मां का बेजा बर्ताव असहनीय प्रतीत होता। तो क्या वह सचमुच पगला गयी है? या फिर तन्दरूस्त रहकर अपनी हर इच्छा पूरी कर लेना चाहती है।

जिन्दगी को जीने का उसका वह अनोखा अंदाज था जो मुझे मां के प्रति वितृष्णा भाव से भरता जा रहा था। मां के प्रति मेरा बचा खुचा अनुराग भी क्षीण पड़ता जा रहा था। कभी कभी वह मुझे सचमुच किसी निर्जीव वस्तु के समान फालतू, अवांछनीय सी लगती। किसी कबाड़ या ठूंठ मं तब्दील होती जिसका अस्तित्व, उपस्थिति, हर वक्त आंखों के समक्ष बने रहने का एहसास मुझे नामुराद सा लग रहा था।

तो क्या सचमुच मां के लिए मेरे भीतर संवेदना का स्रोत सूख चुका था? क्या वह मेरे लिए एक सूखी नदी थी जो जल की बूंदों के स्पर्श के लिए तड़फ उठती है?

मैं स्वयं को ऊहापोह की स्थिति में जकड़ा हुआ पा रहा था।

पंडित ने मुझसे पूछा, ‘ अम्मा जी हवन के लिए कह रही है। तुम्हारा क्या ख्याल है जजमान?’ यानी मां की इच्छापूर्ति के लिए पुरोहित को मेरी सहमति जरूरी जान पड़ी थी। वैसे वह पूछता भी नहीं तो कोई फर्क नहीं पड़ता। मां जो ठान लेती है, वह कर करके ही रहती है। उसका हठ, जिद्द राजहठ की मानिन्द ही तो है।

‘पंडितजी कर दो कोई तारीख तय।ै’

‘अरे वाह बेटा। ये हुई न बात। ‘ठीक है तुम लोग बातें करो। मैं सोनूं के लिए खाना बनाती हूं।’ 

‘अम्मा जी बिना प्याज लहसुन के। बिलकुल सादा। मिर्च विर्च तेज न हो।’

‘भइया सत्तर साल से जानती हूं। तब तेरे दादा हमारे पुरोहित थे। पन्द्रह बरस की थी जब ब्याह कर आई थी। मन्त्रोचारण के वक्त तेरे दादा इस कदर ध्यानमग्न हो जाते थे कि उनके मुखश्री से लार टपकने लगती थी। बार-बार मुंह पोंछते थे तेरे दादा। पंडित दीनानाथ। तू उसका पोता है। मेरे पोते की हमउम्र का।’

‘भाषण बन्द कर और जल्दी से खाना बना। भूख लग रही है मुझे भी। मैंने मां को टोका तो बोली ‘ठीक है ठीक है। तू बातें कर सोनू से....’

‘पंडित जी एक बात सच-सच बताना।’

‘पूछो जजमान।’

‘कब तक जियेगी?’ मैंने होले से पंडित जी के कान से मुंह सटाकर पूछा।

पुरोहित सकपका गया, ’जजमान ऐसे प्रश्न नहीं पूछते। अपशगुन होता है। अम्मा जी की जन्मपत्री थोड़े ही बनी है जो मैं उसे देखकर भविष्यवाणी कर दूं। और हां होती भी तो भी मै। यह घृणित कार्य कभी नहीं करता।े

‘पंडित जी। प्लीज मेरी बात मान लो। कुछ तो संकेत दो न। अजब गजब ढंग है इसके इन दिनों। बार-बार मुझे डराती रहती है कि मैं जाने वाली हूं। इसका आतंक मुझे सता रहा है। रात भर नींद नहीं आती।’

‘बेकार की बातें मत करो। जजमान तुम मुझे भावुक बना रहे हो। तुम्हारी नींद में कोई विघ्न नहीं है। सुबह देर तक तान कर सोते हो। तुम्हारी मनोदशा ठीक है। नाटक कर रहे हो। तुम्हारे मन की बात तुम्हारे चेहरे पर अंकित है।’

चलो माना मैं गलत हूं। लेकिन सच्ची बात कहने में आपका क्या नुक्सान है। तीन पीढ़ियों से घरेलू पुरोहित हो। कुछ तो लिहाज करो मेरा?’े

‘जजमान। मैं ऐसी कोई भी भविष्यवाणी नहीं कर सकता जो तुम्हारे भविष्य को नरक बना दे। अम्मा जी की खुशियां छीन ले। जीवन के प्रत्येक सत्य को उद्घाटित नहीं किया जा सकता। ऐसे प्रश्नों से दूर रहो और ठीक से मां के प्रति अपनी जिम्मेवारी निभाओ।’

‘मोतिया के आपरेशन की जिद्द पकड़ रखी है।’

‘इसमें गलत क्या है?

‘एक तरफ विदा होने का शोर मचा रखा है। हर वक्त अपना दुष्प्रचार स्वयं करती रहती है। अपशगुन के बीज बो रही है घर में। ये विष बेल कहीं घर को नष्ट न कर दे।’

‘तुम अपने कर्तव्यबोध से विमुख हो रहे हो। मोतिया बिन्द के आपरेशन का अम्मा जी का स्वयं के बारे में अनाप शनाप बोलते रहने से कोई संबंध नहीं है।’

‘पंडितजी। आप भोले क्यों बन रहे हैं। अगर एकाध महीने में उसे दुनिया से कूच करना ही है तो चालीस पचास हजार फूंकने की क्या जरूरत है?’

‘मुझे लगता है अब मुझे यहां से चलना चाहिए। मेरे हिस्से का भोजन भी तुम स्वयं कर लेणा। अम्मा जी के प्रति तुम्हारा अपमानजनक व्यवहार और मानसिकता से मेरा मन व्यग्र हो उठा है। मुझे लगता है तुमने अपने घर की हवा को स्वयं ही अपने तुच्छ विचारों से दूषित कर दिया है। मेरी सांस घुट रही है।’

मुझे तुरन्त अपनी गलती का अहसास हुआ। मां के प्रति मेरी निर्मम सोच। क्रूरता की सीमाएं लांघ चुका हूं मैं। मैंने किसी प्रकार स्थिति को संभाला, ‘पंडितजी क्षमा करें। मुझसे भूल हुई है। मेरा मानसिक संतुलन बिगड़ गया है।’

बमुश्किल पंडित जी को भोजन के लिए राजी किया। पारिवारिक पुरोहित की नाराजगी भी मोल लेना किसी अपराध से कम नहीं। ठीक ही तो कह रहा हैं पंडित जी। मैं अपने दायित्व बोध से भाग रहा हूं। मां के मोतियाबिन्द का आप्रेशन परम आवश्यक है। भले ही वह आपरेशन के बाद एक दिन ही जी पाये। मां के प्रति कर्तव्य की अनुपालना सर्वोपरि है।

पंडितजी के लौटने के बाद मुझे लगा मैं सचमुच ही अपने भीतर छोटा हो गया है। संकुचित, संकीर्ण मानसिकता में जकड़ा जैसे मैं कोई मांसपिण्ड हूं। संवेदना से कोसों दूर।                         

पुरोहित के तर्क मेरा पीछा करते। ‘सोचो वृद्धावस्था में तुम्हंे जब स्वयं की आंखों में मोतियाबिन्द का आप्रेशन करवाना पड़ेगा तो क्या तुम मृत्यु की प्रतीक्षा करोगे? दुनिया को रौशन आंखों से देखने की तड़फ क्या समाप्त हो जायेगी? यही छटपटाहट अम्मा जी की आंखों में है। उसके भीतर जिजीविषाहै। वह प्रत्येक पल को जीना चाहती है। उसका मनोबल उतंग शिखर के समान आज भी बुलन्द है। जीने की ललक क्या होती है? उसकी चमक क्या तुमने अपनी मां की आंखों में देखी है? खुदगर्ज न बनो अपना फर्ज पूरा करो। वरना कयामत के रोज ईश्वर के प्रश्नों का सामना करने का साहस तुममें शेष ना होगा।

पुरोहित के पुरजोर तर्कों ने मुझे निरूत्तर सा कर दिया था। 

मां ने अगले रोज पुनः बैंक की जिद्द पकड़ ली।

‘अरे अजीब है तू। दस दिन पहले ही तो तूने दस हजार निकाल थे। ये रोज रोज मैं नहीं जा सकता बैंक। दो मील पैदल चल लेगी तो तेरा क्या बिगड़ जायेगा? खेतों की देखभाल के लिए भी तो हर रोज चार मील पैदल आती जाती है।’

वह निःशब्द एकटक मुझे निहारती रही।

‘अरे वो कांऊटर पर लड़की बैठती है न। भर देगी तेरा विदड्राअल फार्म अंगूठा भी लगवा देगी।’ काफी देर तक मैं बड़बड़ाता रहा। कब तक ढोता रहूंगा इसे मैं अपनी कार में। मर जाये तो पीछा छूट जाए, पर मरने का तो स्वांग करती रहती है......... शायद सहानुभूति बटोरने का यह भी एक तरीका है......

मां को मेरे व्यंग्य वाण चुभ गये थे। यूं तो वह अक्सर मेरी बातों पर तिलमिला उठती थी। डांट डपट तो हर वक्त उसकी जवान पर रहती। मेरे ताने उसके अहम को बींध जाते। उसके क्रोध की अभिव्यक्ति का भयावह रूप गाली गलौच के रूप में सामने आता। उसकी देहभाषा पर आतंक के भाव मेरे लिए असहनीय होते। मगर इस बार उसने कोई प्रतिक्रिया नहीं की। चुपचाप पी गयी मेरे तंज को। विषपायी कंठ की तरह।

दूसरे दिन सुबह जगा तो नौ बज रहे थे। जगते ही मुझे चाय की तलब हुई। उसे नाराज करने के बाद चाय की गुहार की हिम्मत मुझमें नहीं बची थी।

मां घर पर नहीं थी।                             े

दोपहर को लौटी तो मैंने तलखी से पूछा, ‘कहां गयी थी? बताकर तो जाती!’

वह निःशब्द रही। उसके मौन का रहस्य जानने के लिए मैं उत्सुक था।

मां ने उसी पुराने नीले मटमैले कपड़े के झोेले की गांठ खोेलकर रूमाल निकाला। बंद रूमाल को खोलकर उसमें से सौ सौ के नोटों की दो गाड्डियां निकालीं। मेरे हाथों में रखते हुए बोली, ‘ये रहे बीस हजार। मेरी आंखों के आपरेशन के लिए। पता किया है मैंने। सरकारी अस्पताल में तो मुफ्त होगा। पर मुझे प्राइवेट अस्पताल मंे ही करवाना है। रोटरी फाऊंडेशन में।

हतप्रभ सा मैं मां को देखता रहा। सुन्न। मुझे काटो तो खून नहीं। अपाहिज सा। लगा मैं एक बार फिर से गिन्नी पिग में तब्दील हो गया हूं।

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