कहानी “कभी कुछ अपने लिए भी...........“

बच्चें को थपकाते उसकी भी आँखें नींद से बोझल होने लगी, वह हड़बड़ा कर उठ बैठी घड़ी देखी........ सवा दो.... बगल में नजर डाली तो आराम से मुँह तक रजाई ढापें पड़ा था........हर बार की तरह इस बार भी! आवेश और गुस्से में वो रोने हो आई............ कोई प्रोग्राम फुस्स होने पर वह चन्द आँसू बहाने के सिवा और कर भी क्या पाती है? लेकिन इस बार नहीं.......वह उसे दिखा देगी, बहुत हुआ ये अपनी छोटी-छोटी खुशियों के लिए उसके आगे रिरियाना, वो सुनाता है न उसे जाओ अकेली चली जाओ...........मैने क्या रोंका है? जबकि, जानता है वो अकेले नही जा सकती..........लेकिन क्यों नही जा सकती........आज जाएगी! चार सालो में आज उस पर पहली बार, विवाह के पहले बाला गुस्सा और जुनून हावी हुआ था।

वह उठी...........आलमारी खोलकर साड़ी निकाली, तैयार होते-होते वह बार-बार बिस्तर पर देख लेती.........क्या पता वह हंसते हुए उठ जाये, हालाँकि उसके साथ रहते-रहते वह जान चुकी थी, ऐसे तिकड़म वह नही रचता! उसने बैग टांगा और घड़ी पर नजर डाली, दो चालिस हो रहे थे।

सुनो.......मै जा रही हूँ........ दरवाजा बन्द कर लेनाउसने रजाई उठाकर लापरवाही से उसे देखा और फिर रजाई में मुँह छिपा लिया!उसके अन्दर से घृणा की एक तेज लहर उठी.........मन हुआ उसका मुँह नोच ले! वह पिछले दरवाजे से बाहर निकल...... आई। सामने के हिस्से में सास ससुर थे। और उस समय किसी भी तरह के सवाल-जवाब से वह बचना चाह रही थी।

गलीं में रुककर उसने अपने को सामान्य किया और गली से बाहर आकर सड़क पर निगाह दौड़ाई  कोई रिक्शा नही था.........आटों भी बुरी तरह ठसे हुए जा रहे थे। कुछ दूर पान की गुमटी के पास उसे एक रिक्शा दिखा..........वह उधर चल दी! यू अकेले सड़क पर चलते उसे बड़ा अटपटा लग रहा था! उसने याद करने की कोशिश की कब तक वह इस तरह अकेले बाहर निकली थी इस शहर में उसे याद नही आया...........बस आँखे डबडबा आई।
एई भइया.......खाली हो......? “उसने रिक्शे वाले से पूछा!
कहाँ जाना है.........?“
अजंता टाँकीज.........
कै सवारी.........
अकेले..........
“20
रुपइया होगा!

वह बैठ गई! उसे लगा उसके अकेलेकहने पर रिक्सा बाला अजीब तरह  से उसे देखने लगा था........क्या पता............ये उसका भ्रम हो!

फरवरी का आखिरी हफ्ता था.........उसने हल्का स्वेटर पहन रक्खा था ये सोच कर की वापसी में ठंड लगेगी पर अब तो अच्छी खासी गर्मी लग रही है..........शायद सीधी धूप पड़ने की वजह से! उसका ध्यान पीछे से आने वाले हर बाइक की आवाज़ पर  लगा था- क्या पता वो पीछे-पीछे आ रहा हो! एक बार उसका मन हुआ वो रिक्शा वापस घर की ओर मुड़वा ले। सुधा दी के घर के पास ख्याल आया रुक कर उन्हें भी साथ ले ले। उसका दिमाग ये सब सिर्फ सोच........ रहा था.........खुद वो चुप लगाए बैठी रही। रिक्शा धीमी गति से आगे बढ़ रहा था। उसने अपने आपका विचारो से आजाद किया और निश्चय किया की अब वो कुछ नही सोचेगी।

रिक्शा एक झटके में रुका....... उसके विचारो को भी झटका लगा। सामने पिक्चर हॉल था। बड़े-बड़े पोस्टर लगे थे सलमान खान के। धूप से बचने के लिए उसने पल्लू सिर पे रख लिया। इस चेष्ठा के पीछे कही एक डर भी मौजूद था, कोई पहचान वाला मिल जाए!

सिनेमाहॉल लगभग खाली सा था। पेपर पे तो दिया था फिल्म सुपरहिट है यों भी आजकल तो दो दिन में ही फिल्मों का हिट फ्लाप तय हो जाता है। पहले जैसे अब कहाँ होता की एक ही हाल में महीनों फिल्में चलती थी......... अब तो जब तक मन बनाया देखने तब तक फिल्म उतर चुकी है।
जाकर पता कर दो............ टिकट मिल रहा है क्या?“

उसने रिक्शे वाले से कहा। थोडी देर में वह लौट आया और बोला तीन बजे से मिलेगा..........उसे पैसा थमा वह रिक्शे से उतर गई। अन्दर आते हुए उसने देखा, टिकट खिड़की खुल चुकी थी, पाँच सात लोग खड़े थे..........वो भी जाकर लाइन में लग गई!

एक बालकनीकहते हुए उसे फिर अटपटा लगा। टिकट लेकर वो अन्दर आ गई। लोगो का आना धीरे-धीरे शुरु हो रहा था। वह जहाँ बैठी थी वहाँ से सिनेमा हाल का गेट सामनें दिखता था, रह रहकर उसकी नजर उधर जा पहुचती, शायद वो आ रहा हो!

उसे अपने इस ख्याल पे हंसी आ गई! क्या वो उसे जानती नहीं......हमेशा हर बात में उसे नीचा दिखाना, अपने मर्द होने का दंभ भरना और ऐसा जताना, जैसे उसके बिना उसका कोई अस्तित्व ही नही, कितना डॉमिनेटिंग! वो भी तो पुरी तरह उस पर डिपेंड है......... अपनी हर छोटी आवश्यकता के लिए........अपनी हर छोटी खुशी के लिए उसका मुँह ताकना पड़ता है उसे, उसकी मर्जी वह उन्हें पूरा करे या नहीं! फिल्में देखने का कितना शौक था उसे। शादी के बाद जो गिनती की फिल्में देखी भी तों वो भी चिरौरी करके रिरिआ के.........और उसकी अदा मानों फिल्म दिखा के उस पर कोई एहसान कर रहा हो। मुँह गिराकर, तनाव भरे चेहरे के साथ जाता......यूँ फिल्म देखने का सारा मजा ही किरकिरा हो जाता।

वह अक्सर उससे चिढ़कर कहती, “अगर मैं आत्मनिर्भर होती तो कब का तुम्हें छोड़़ चुकी होती..........मेंरी मजबूरी है जो मैं तुम्हारे साथ रही चली आ रही हूँ।

वह बेशर्मी से हंस देता और वह चिढ़ उसके ठस्सपनें पर। पता नहीं क्यों उसे ये बात शर्मनाक नहीं लगती, कि उसकी पत्नी उसके साथ सिर्फ मजबूरी में रह रहीं है..........प्यार करती है, इसीलिए नहीं........

सोचते-सोचते उसकी आँखें फिर डबडबा आई! उसने पलकें झपकाते हुए अपने आस-पास नजर दौड़ाई़, ज्यादातर परिवार वाले लोग थे, कुछ औरतें तीन-चार के ग्रूप में थी! कुछ लड़किया- लडकें शायद कॉलेज गोल करके आये थे आज शिवरात्रिभी थी, शहर के शिवमंदिर में मेंला लगा था। कुछ देहाती औरतें-मर्द लगता था सीधे मेले से यहीं चले आये हैं। औरतें की चमकउआ साड़ी, आँखों की चमक, झोलें टोकरियों में भरें मेलहे समान। बच्चों के हाथों में डमरू पिपहरी, बाँसुरी, गुब्बारे, आदि........

उसने देखा लोग ऊपर जा रहे थे। नीचे फर्स्टक्लास, लेडीज वालो की भीड़ बढ गई थी। वह उठ गई, ऊपर जाने से पहले उसने फिर गेट की ओर देखा.......क्या पता? ऊपर भी काफी भीड़ थी......... वह एक कोने की सीट पर बढ गई । फिल्म छूटने में अभी कूछ मिनट शेष थे! आजकल सिनेमा हॉलो में इतनी भीड़ जुटती नहीं। परिवार के साथ तो लोगों ने फिल्म देखना लगभग बंद ही कर दिया है।लेकिन ये फिल्म खूब भीड़ जुटा रही थी! साल के लगभग सारे अवॉर्ड इसी फिल्म को मिले थे। गाने भी सुपरहिट थे। एक छोटा बच्चा बड़ी स्टाइल से कमर पर हाथ रखकर फिल्म का टाइटिल सांग गा रहा था। अक्सर वो उसे टालने के लिए कहता था! भीड़ थोड़ी कम हो जाए फिर चलेंगेलेकिन उसे तो फिल्म देखना तभी अच्छा लगता है जब हॉल खूब भरा हो। खाली हॉल में बैठ कर तो अच्छी फिल्म का मजा भी गायब हो जाता है।

फिल्म छूट चुकी थी। लोग अन्दर जाने का उपक्रम कर रहें थे। सोचते-सोचते उसके सिर में हल्का दर्द होने लगा था। मन हुआ लौट जाए। लेकिन वह भीड़ के साथ अन्दर हो ली। हॉल में अन्धेरा था उसे दहशत होने लगी। भीड़ में अपने यूँ अकेले होने की दहशत! यूँ भी सिनेमाहाँल के अन्दर का अन्धेरा एक अलग से रहस्यमय संसार की सृष्टि सा रचता लगता है, उसने सतर्क नजरें पूरे हॉल पे दौडा़ई बीच की सीट पर तीन-चार औरतें बैठी थी, उसके साथ शायद कोई आदमी नही था.........वह उन्हीं की बगल में बैठ गई। भीड़ बढ़ रही थी उसे चिन्ता हुई वह बिना सीट नम्बर के बैठ गई है......... कहीं टिकट चैकर उसे उठा न दें। दिल में धुकपुकी मचा रही। उसकी बगल बाली सीट खाली थी। मन ही मन ये चिन्ता भी थी कि, उस खाली सीट पर कौन जाने कैसा व्यक्ति आकर बैठता है। जिस हिसाब से भीड बढ रही थी। उससे ये लगता तो नही था की बगल की सीट खाली रह जाएगी, उसने अपने आपको लताडा, अगर कोई बैठ भी गया तो क्या पहाड़ टूट पड़ेगा? उसे ऊब सी महसूस होने लगी......... पति पर बेतरह गुस्सा आ रहा था...... आखों में आँसू उमड़ गये। फिल्म शुरू हो गई थी! आँखें आसुओं से भरी थी, और दिमाग गुस्सें से । कई देर तो उसे समझ में ही नही आया.......... सामनें पर्दे पर हो क्या रहा है.......? पर्दे पर गाना शुरू हो चुका था.......... उसने अपना ध्यान फिल्म में लगाना चाहा!

हीरों उसका पसंदीदा था! हिरोइन नामी फिल्मी खानदान की बेटी थी.......... इस फिल्म से पहले उसकी छवि एक सेक्सी गुड़िया जैसी ही थी..........जिसे नांचना बढ़ियां आता था। वो फिल्म के बारे में सोचने लगी- इस फिल्म में हिरोंइन ने अपनी......... पिछली फिल्म के मुकाबले ज्यादा शालीन कपड़े पहने थे! फिल्म में उटपटांग संवाद भी नही थे । उसने फिल्म की कहानी में मन लगाना चाहा। कुछ  देर के लिए वह भूल गई की वह किन परिस्थितियों में फिल्म देखने आई है।

यों भी वो फिल्म देखने की शौकीन थी। शादी से पहले कितनी फिल्म देखती थी..........शादी से पहले जिन्दगी भी तो कितनी अपनी थी- अपने दिन, अपनी रातें........ अपनी नीदें........अपने सपने! सब कुछ कितना पीछे छूट गया है.........ये हर वक्त की भड़भड़ाहट उसे कभी कभी अपने जिन्दा होने पर भी शक होता है- उसकी तो बस सुबह होती है........शाम होती है, कवितायें कहानियां पढ़ना लिखना.......... सपने जैसी बातें हो गई है। अर्सा गुजर गया....... जब उसने अपने लिए कुछ किया हो......... अपनी खुशी के लिए कुछ किया हो.......... अपनी किसी पसन्द की जगह गई हो। शादी के बाद अपनी निजी पसन्द हो ही क्यों! फिर क्यो नही वह अपनी इच्छाओं का होम कर पति की इच्छानुसार रहती। इच्छाओं का क्या है.......... एक पूरी हो मन दूसरे के लिए ललकनें लगता हैं। पति को फिल्में नही पसन्द हैं। तो क्यों वो पीछे पड़ी रहती है। क्यो नही एक अच्छी पली बनने की कोशिश करती। अच्छी पली मानें? जो पति कहें वही करों........लेकिन उसनें तो बहुत सी ऐसी औरतो को देखा जो जिन्दगी भर पति की गुलामी करती रहती हैं। फिर भी पति को खुश नही कर पाती........... खुद तो जिन्दगी भर दुःख पाती ही है।

मध्यान्तर हो गया था, हाल की लाइटें जल गई! उसने आँखें फैलाकर चारों ओर देखा, उसे बहुत तेज थकान महसूस हुई, गला सूखता सा लगा अन्दर से फिर आवाज़ आई- घर वापस चलों.......... यूँ भी फिल्म में मन नही लग रहा था, पर एक जिद थी जो उसे सीट से नही उठने दे रही थी!

फिल्म शुरू हो गई। उसने फिर से स्वयं कोफिल्म के प्रति एकाग्र किया! पर्दे पर नायक-नायिका के बीच कुछ भावुक संवाद चल रहे थे। थोडी देर बाद गाना शुरू हो गया..........उसके सिर में जैसे कोई हथौड़ी पीट रहा हो, वो सोचनें लगी, अपने अरचितों परचितों में शायद ही कोई महिला अकेली फिल्म देखने आई हो! उसने कुछ नया तो किया है। भले ही ये अपनी जिद में किया गया एक फितूर हो।

फिल्म खत्म हो चुकी थी......... आखिर कार! डसने एक गहरी साँस ली....... लगा इन चन्द लम्हों में उसने कई युग की यात्रा की हो। थकान से बदन टूट रहा था। घर में उसके इस दुरसाहस की क्या प्रतिक्रिया होगी, इस बारे में वो सोचना नही चाहती थी! उसने एक रिक्शा लिया गंतव्य बताया और बैठ गयी।
उसे लगा घर जैसे-जैसे करीब आता जा रहा है, उसके सर का दर्द उतनी ही तेजी से बढ़ रहा है।

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सपना सिंह,  रीवा (म0 प्र0)

प्रकाशित कृतियॉँ -  धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान के किशोर कालमों से लेखन की शुरूआत, पहली कहानी 1993 के सिम्बर हंस में प्रकाशित ... लम्बे गैप के बाद पुनः लेखन की शुरूआत, अबतक -‘‘हंस-कथादेश’’, परिकथा, कथाक्रम सखी जागरण, समर लोक, संबोधन (प्रेमकथा विषेषांक), हमारा भारत, निकट इत्यादि में दर्जन भर से अधिक कहानियॉँ प्रकाशित एक कहानी संग्रह और उपन्यास का प्रकाषनाधीन ।

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