प्रज्ञा

साहित्यकार, समीक्षक, और शिक्षक

 

सत्ता की विद्रूपताओं के विरुद्ध विजय तेंदुलकर के नाटक

‘‘ मुझे याद है कि छह या सात बरस की उम्र में मैं कागज और कलम लेकर कहानियां लिखा करता था जोकि मेरे स्कूल के काम का हिस्सा नहीं होती थीं। मैं अक्सर  ज़िंदगी की परिस्थितियों की ऐसी फैंटेसी में खो जाता जिसमें मेरी भूमिका वो नहीं होती जोकि मैं हूं बल्कि मैं जैसा होना चाहता हूं...बचपन की यह आदत बाद तक भी मेरे साथ रही ... बल्कि आज भी मैं किसी और जैसा होना पसंद करता हूं। ऐसा जैसा मैं वास्तविक जीवन में नहीं हो सकता, इसीलिए दिमाग में काल्पनिक परिस्थितियां गढ़कर मैं उनसे खेलता हूं।’’(‘द प्ले इज़ द थिंग ’श्रीराम मेमोरियल लेक्चर-1)1 तेंदुलकर का यह कथन एक नाटककार के नज़रिए से जहां नाटक की रचना-प्रक्रिया की ओर संकेत करता है वहां एक रचनाकार के कला सरोकारों को भी उजागर करता है। उनके कथन ‘‘ जोकि मैं हूं बल्कि जैसा होना चाहता हूं ’’ का विस्तार करके देखें तो यथार्थवादी रचनाकार का रचनात्मक उद्देश्य एकदम साफ तौर पर उभरकर आता है कि ‘जो है उससे बेहतर चाहिए।’ हिंसा, क्रूरता, अमानवीयता, अविश्वास की तमाम तहें दिखाते हुए , बहुत बार प्रकृतवाद के पाले में जाते हुए भी तेंदुलकर के नाटक इनसे परे एक मानवीय और बेहतर समाज चाहते हैं। तनावों की कई अंतर्धराओं से रचे इनके नाटक सामाजिक, नैतिक, धार्मिक-सांस्कृतिक समस्याओं से जूझने के क्रम में अनेक सवाल खड़े करते हैं और अक्सर समाधानों से रहित मोड़ पर अपने दर्शकों को छोड़ जाते हैं। नाटक खत्म होने पर दर्शक सवालों की फेहरिस्त लिए हाल से बाहर निकलता है तो उसके चिंतन की दिशा खुद ब खुद जवाब ढूंढने की ओर अग्रसर होती है और दर्शक का यह अभ्यास उसे एक नयी फैंटेसी गढ़ने को मजबूर करता है । यह फैंटेसी ‘जो है और जो हो सकता है’ के अंतर को साफ करती चलती है। दर्शकों से यह अभ्यास करवा ले जाना बतौर नाटककार तेंदुलकर की उपलब्धि है।

1928 में जन्मे विजय धोडोपंत तेंदुलकर ने पचास से भी अधिक नाटकों की रचना की है। हिंदी में उनके तीस नाटकों का अनुवाद और मंचन किया जा चुका है। वर्ष 2007 में ‘भूत’ और वर्ष 2008 में ‘विट्ठला’ और ‘एक जिद्दी लड़की’ का हिंदी अनुवाद भी प्रकाशित हो गया है। आज विजय तेंदुलकर हमारे बीच नहीं हैं । जाहिर है यह केवल मराठी जगत की क्षति नहीं है और न ही हिंदी जगत की क्षति है, यह नाटक की क्षति है । ‘खामोश अदालत जारी है’, ’ गिद्ध’ ‘,सखाराम बाइंडर’ ,‘जाति ही पूछो साधु की’,‘ घासीराम कोतवाल’,‘ कन्यादान’,‘ कमला’ आदि नाटकों के जरिए तेंदुलकर की जो छवि नाट्य जगत में स्वीकृत हुई वह मराठी नाटककार की सीमा में बंधकर नहीं रह सकी। अपने नाटकों के माध्यम से जिन किरदारों को उन्होंने खड़ा किया वे केवल ‘मराठी मानुष’ नहीं हैं और न ही इनकी समस्याएं , इनके अंत़र्द्वंद्व मराठी जगत तक सीमित हैं। प्रिय भाषा मराठी में लिखते हुए एक हार्दिक प्रसन्नता अनुभव करने के बावजूद स्थानीयता बनाम राष्ट्रीयता तेंदुलकर के नाटकों की पहचान बनती है। 

एक बड़े राष्ट्र के भीतर अनेक समूह, जातियां, भाषायी वर्ग होते हैं जो स्वयं में इतनी महत्ता रखते हैं कि राष्ट्रीयता भी उनसे परिभाषित होने लगती है। तेंदुलकर के नाटकों के व्यक्ति, विचार , मुद्दे किसी देश के छोटे भाषायी समूह के नहीं रहते बल्कि पूरे देश के ज्वलंत विचारों और मुद्दों के प्रतिनिधि बनकर आते हैं। ये स्थानीयता इतनी प्रगाढ़, इतनी सघन और उर्वर है कि इसमें भारतीय मनुष्य के संघर्षां को उगते हुए देखा जा सकता है। ‘सखाराम बाइंडर’ का सखाराम हो या लक्ष्मी और चम्पा, ‘कमला’ की सरिता या कमला, खामोश अदालत जारी है की बेणारे , जाति ही पूछो साधु की का महिपत, घासीराम कोतवाल का घासीराम, पुन्य नगरी के पंडे-पुरोहित,पेशवा या घासीराम की बेटी गौरी- ये सभी किरदार क्या केवल महाराष्ट्र की चौहद्दी तक सीमित हैं? इन किरदारों के माध्यम से तेंदुलकर जिस समाज की कहानी कहते हैं वह स्थानीयता का अतिक्रमण करती हुई पूरे वेग के साथ भारतीय समाज में रूपांतरित हो जाती है। मराठी नाटककारों में अन्नासाहब क्रिलोस्कर, गोविंद बी. देवल , बी. वी. वारेकर, गोविंद देशपांडे ,सतीश आलेकर, जयंत पवांर आदि की व्यवस्था विरोधी नाट्य-लेखन की एक लंबी परंपरा है। इस कड़ी से जुड़ते हुए तेंदुंलकर के नाटक स्थानीयता की सीमा से निकलकर भारतीयता को परिभाषित करते हैं।

यहां जिस भारतीय मनुष्य और उसके संघर्षांं की बात की जा रही है उसे तेंदुलकर के निम्न और मध्यवर्गीय किरदारों, उनके जीवन चित्रों के माध्यम से आसानी से देखा जा सकता है। अपने रचनात्मक लेखन की पहली सीढ़ी विचार की अपेक्षा अनुभव को बताने वाले इस नाटककार का यह कहना है कि ‘‘चरित्र भले ही मेरे नाटककार के दिमाग की उपज हैं पर वो कोई कठपुतली तो नहीं और न ही शतरंज की बिसात पर खड़े राजा-रानी जिन्हें मैं अपनी सहूलियत से आगे बढ़ाऊंगा... जिंदा आदमी की अपनी अलग पहचान होती है और यही कारण है कि वो मेरे नाटक में अपने भिन्न विचार, भिन्न दिशा और भिन्न नियति के साथ हैं।’’(’द प्ले इज़ द थिंग- श्रीराम मेमोरियल लेक्चर-2, 1997)2 । इसलिए तेंदुलकर अन्य नाटककारों से गुज़ारिश भी करते हैं कि नाटककार की शैली किरदारों पर हावी न हो जाए क्योंकि इससे किसी भी दर्शक पर नाटक का जो प्रभाव पड़ेगा वह बिल्कुल ऐसा होगा जैसे एक ही नाटककार  अलग-अलग मुखौटों के पीछे से बोल रहा है। इस विचार का व्यावहारिक रूप तेंदुलकर के नाटकों में कारगर तरीके से दिखाई देता है । उनके अनेक नाटकों में कई-कई पात्र होने के बावजूद दोहराव और एक जैसापन नहीं दिखाई देता। हर किरदार की अपनी अलग शख्सियत है और हर किरदार में जीवन धड़क रहा है।

तेंदुलकर का घासीराम मध्यवर्ग का वह चित्र पेश करता है जो शक्ति, सम्पन्नता, वैभव पाने के लिए निरंतर समझौते करता आया है और पतन के गर्त में गिरता है। यह मध्यवर्ग समाजवादी तो नहीं हो पाया है लेकिन वह सामंती भी है और पूंजीवादी भी। घासीराम कहीं न कहीं उस पूंजीवादी अस्मिता के संघर्ष का प्रतीक है जो नितांत अकेले संघर्षरत है। समाज के निम्न वर्ग से आने वाला घासीराम शक्तिहीनता और उपर उठने का जज्बा लेकर आया है। यह शालीन व्यक्ति पूना में हुए अपने अपमान के कारण ‘सुअर बनकर लौटने की’ प्रतिज्ञा लेता है। वह पहले सामंती समाज को परखता है फिर उसका हिस्सा बनता है। निम्न वर्ग से आया घासीराम व्यवस्था को बदल भी सकता था। कोतवाल बनकर वह स्त्री-पुरुष के अवैध संबंधों पर रोक लगाने की पूरी कोशिश करता है पर वह खुद इस व्यवस्था में इतना जकड़ जाता है कि उसीमें मिलकर रह जाता है और सत्ता उसे अपना मोहरा बनाकर उससे सब कुछ छीन लेती है। तेदुलकर के नाटकों ‘कमला’, ‘सखाराम सबाइंडर’ और ‘खामोश अदालत जारी है’ को भी देखें तो मध्यवर्गीय सामंती, रूढ़ मान्यताओं का चेहरा साफ दिखता है जहां स्वाधीन विचारों वाली स्त्री के लिए जगह नहीं बनती।

ठेठ सामंती समाज में स्त्री की तस्वीर को तेंदुलकर के नाटक सामने लाते हैं। इनके नाटकों में स्त्री- सत्ता के लिए, घरेलू जीवन को सुनिश्चित गति देने के लिए, व्यावसायिक फायदे  के लिए खरीदी-बेची जाती है। यानी स्त्री लालच, प्रलोभन और उपभोग की वस्तु है। स्त्री का वस्तुकरण और इससे जुड़ी अनेक छवियां इनके नाटकों में हैं। पुरुषप्रधान समाज की स्वामित्ववादी परिधि में जीने वाली स्त्री की चेतना जब जागृत होती है तब वह सवाल उठती है-‘‘ मैं पत्नी नहीं गुलाम हूं। उसकी निगाह में मैं भी एक कमला ही ह़़ ... गुलाम को कोई हक हासिल नहीं होता... गुलाम इसलिए होता है कि सिर्फ खटता रहे। मालिक के इशारों पर नाचता रहे।......क्यों जारी रहेगा,? क्यों नहीं पुरुष भी घिसटता चले?...क्यों नहीं नारी एक बार भी मालिक बने? क्यों नहीं वह इंसान की तरह जीने की मांग करे?-(कमला)3 सवालों की यह कड़ी बनते ही पुरुषप्रधान समाज के स्त्री-संबंधी तयशुदा मानकां के अनुसार एक संवेदनहीन वस्तु मान ली गयी बेणारे विरोध करते हुए साफ शब्दों में कहती है-‘‘ मैं लीला बेणारे, एक जिंदा औरत हूं।’’(खामोश अदालत जारी है)4 इन नाटकों में स्त्री के पक्ष को सामने लाने वाली एक गंभीर बात यह भी है कि वास्तविक लड़ाई सामंती सत्ता, सामंती मानसिकता से है। यही वजह है कि इन नाटकों में दो औरतों को एक-दूसरे के प्रतिपक्ष में रखकर दो भिन्न नजरियों को प्रस्तुत किया गया है। ‘कमला’ में सरिता और कमला, ‘सखाराम बाइंडर’ में लक्ष्मी और चम्पा तथा ‘खामोश अदालत जारी है’ में बेणारे और श्रीमती काशीकर। यह प्रयोग इसलिए है कि औरतों का एक बहुत बड़ा वर्ग सामंती मानसिकता की दीवारों में इस तरह कैद कर लिया गया है कि अब उन्हें अपनी स्वाधीन चेतना पर हो रहे हमले का कोई असर नहीं पड़ता।

सामंती सत्ता ने उन्हें इस कदर अनुकूलित कर दिया है कि स्त्री का विवेकवान होना, अपने लिए स्वाधीनता के आकाश की मांग करना उन्हें उच्छृंखलता जान पड़ता है। कमला का जयसिंह को मालिक कहना और उसकी पहली पत्नी के साथ जीवन गुजारना उसके लिए समस्याजनक नहीं है। उसका मानना है-‘‘ दोई मिलके मालिक को ,खुस रखें चइए,जैदाद फेलाएं चइए। मालिक को बच्चा देय चइए।...मैनत-मजूरी ,बच्चा देबो हमारे जिम्मे। लिखा-पढ़ी, हिसाब-किताब तुमाए जिम्मे।... मइने के पन्दरा रात मालिक के संग तुम सोइयो, पन्दरा रात हम सोहैं।’’(कमला)5 ‘सखाराम बाइंडर’ की लक्ष्मी पर पुरूषप्रधान समाज की मानसिकता इस कदर हावी है कि उसे हर हाल में उत्पीड़क सखाराम सही पुरुष जान पड़ता है। यहां तक कि धर्म-कर्म, पूजा-उपासना न करने वाली, पुरुष से जबानदराजी करने वाली, स्वच्छंद विचारों वाली चम्पा की हत्या की साजिश करते समय लक्ष्मी एक औरत नहीं होती वह सामंती व्यवस्था की वफादार कार्यकर्त्ता जान पड़ती है। यही हाल श्रीमती काशीकर का भी है जो अन्य पुरूषों के साथ मिलकर, उन्हीं जैसी निर्मम क्रूरता के साथ  बेणारे को कटघरे में खड़ा करके अपनी अमानवीय गवाही देती हैं। यह उस भारतीय समाज के चित्र हैं जो अधिकार चेतना सम्पन्न स्त्री से भय खाता है। तेंदुलकर के नाटक प्रमाण हैं कि सत्ताएं अपने चाबुक के नीचे रहने वाले लोगों को पसंद करती हैं पर विवेकवान, स्वतंत्रचेता और सत्ता के विरोध में उठने वाले व्यक्ति को अपना परम शत्रु मानती हैं। सत्ता के लिए वह खतरा बन जाता है।

तेंदुलकर सत्ता के संरक्षणकारी प्रलोभनों का पर्दाफाश करते हैं। उनके नाटक ‘घासीराम कोतवाल’ का घासीराम तभी तक शक्तिशाली रहता है जब तक पेशवा की शारीरिक भूख संतुष्ट करने और पंडे-पुरोहितों का कद कम करने के सामान जुटाता है। जहां ये दोनों प्रयोजन सध जाते हैं वह पेशवा के लिए वह निरर्थक हो जाता है। चित्तपावन ब्राह्म्णों के स्थान पर घासीराम को तानाशाह बनने देना पेशवा की सोची-समझी साजिश का ही परिणाम है । इसलिए घासीराम को अपनी कठपुतली बनाकर सत्ता उसे बुरा साबित करके मरवा डालती है। बुराई घासीराम की झोली में और प्रतिष्ठा सत्ता के खाने में आती है। नाटक के अंत में दलित घासीराम को ‘घसिए’ जैसी गाली सत्ता के घिनौने चेहरे का पर्दाफाश कर देती है। घासीराम के बहाने बहुत सारे सवालों को नाटककार ने आवाज़ दी है जो समसामयिक संदर्भां में भी प्रासंगिक हैं।‘अभियान’ से जुड़कर, तेंदुलकर के कई नाटकों के निर्देशित करने वाले निर्देशक राजेंद्रनाथ का कहना है-‘‘  यह नाटक एक तानाशाह के उदय और अंत की कहानी नहीं है.... हरेक को यह याद रखना चाहिए कि कुछ नाटकों में प्लॅाट एक खूंटी भर होता है जिस पर दूसरे कई मुद्दे टांगे जा सकते हैं। ठीक यह स्थिति ‘घासीराम’ के साथ है।’’( द डायरेक्टर्स नोट - रंग यात्रा 2)6

सत्ता के इन्हीं चोर दरवाजों को ‘कुत्ते’ नाटक की औरत के माध्यम से भी दिखाया गया है। यह नाटक बताता है कि सत्ता का अभिजात, धर्म-आध्यात्म का लबादा ओढ़कर आम आदमी को किस तरह अपनी भूख को संतुष्ट करने का जरिया समझता है । यही आम आदमी जब सत्ता से अलग लीक पर चलने लगता है तो वह खदेड़ दिया जाता है। धर्म और जातिगत सत्ता की विद्रूपता को ‘जाति ही पूछो साधु की’,‘ घासीराम कोतवाल’,‘कन्यादान’ ,‘विट्ठला’ आदि नाटक सामने लाते हैं। व्यक्तिगत स्वार्थां के लिए धर्म और जाति का उपयोग दिखाने के साथ तेंदुलकर के नाटक धर्म के व्यावसायिक पहलू को भी उभारते हैं। ‘विट्ठला’ के विपन्न नामा दर्जी को भूत की मदद मिलना एक संयोग ही है जो उसकी नियति बन जाता है। भूत के द्वारा नामा के जीवन में उतरने वाले वैभव, सुख और एश्वर्य उसकी इच्छाओं केे प्रतिरूप तो हैं ही दूसरी ओर वह लालच के प्रतिरूप भी हैं जो धर्म के बाजारीकरण का आधार हैं। नामा की धार्मिक सभाओं में भूत के चमत्कारों से फायदा उठाने वाले तुम्बाजी महाराज धर्म की दुकान के चालाक दुकानदार हैं। स्वयं नामा के प्रलोभन भीतरी भी हैं और  बाहरी भी। अंत में नामा का सारे सुखों को छोड़कर आत्मसंतोष को प्रमुखता देना दरअसल जीवन में विवेकपूर्ण निणर्योंं को प्राथमिकता देना है। इसीलिए एक शक्की पात्र नाटक के आखिरी हिस्से में स्पष्टीकरण देता है-‘‘ भूत नहीं था। नामा की ही दो प्रकृतियां -एक सत् और दूसरी असत्। एक साधु और दूसरा भूत। भूत वगैरा सब झूठ। असत् प्रकृति पर सत् ने विजय पाई है, हां।’’-(विट्ठला)7

यह नाटक दिखाता है कि जिस तरह के समाज में नामा रह रहा है वहां धर्म के रूप में वह चीजें स्वीकार्य हैं जो वास्तविक धर्म नहीं हैं। धर्म सच्चा मनुष्य बनाने की जगह आडम्बरों, पाखंडों ,चमत्कारों के जंजाल में इंसान को फंसा रहा है और धर्म के बाजार का ग्राहक बना रहा है। तेंदुलकर धर्म के इस रूप का मजाक उड़ाते हैं। धर्म के धवल रूप के बदले वे घिनौने रूप को प्रस्तुत करते हैं। वे छद्म उदात्तता के पाखंड की कलई खोलते हैं। अकारण नहीं है कि जातिवाद, धार्मिक संकीर्णता, धर्म के बाजारीकरण का विरोध करने वाला यह नाटककार गुजरात में हुए नरसंहार के बाद साम्प्रदायिक ताकतों से सीधे जूझते हुए अपने नैतिक बल पर एक राज्य के धर्मांध मुख्यमंत्री को खत्म करने की बात करता है। धार्मिक सत्ता के फासीवादी रूप का खंडन तेंदुलकर ने किया है और इस खंडन के साथ वह उन आम लोगों के पक्ष से खड़े हुए हैं जिन्हें धर्म के नाम पर की जाने वाली घिनौनी राजनीति का हिस्सा बनना गवारा नहीं। सत्ता प्रतिष्ठानों से लड़ने के क्रम में तेंदुलकर के नाटक समाज में व्याप्त हिंसा का चेहरा पेश करते हैं। हिंसा के कई चेहरे उनके नाटकों में मौजूद हैं-पारिवारिक हिंसा ,यौन हिंसा, सामाजिक हिंसा, जातिवादी-धार्मिक हिंसा, राजनीतिक हिंसा। मार-पीट, गालियों की बौछार, खून-खराबे के कई दृश्य वीभत्सता की हद तक जाते हुए उनके नाटकों में मिलते हैं। इन कारणों से विवादों का हिस्सा बनते हुए भी नाटककार का कहना है-‘‘ मैं शुरू से मानता रहा हूं कि हिंसा कोई अलग चीज नहीं है, वह तो इंसान की मूलवृत्ति से जुड़ी हुई कुछ बात है।..हिंसा बहुत असली चीज है-वह थी ,है और रहेगी।’’(हिंदी रंगकर्म  दशा और दिशा)8। हिंसा के अनेक स्तरों को अपने नाटकों में दिखाते हुए वे नाटकों के जरिए हिंसा का सीधा समाधान नहीं दिखाते और शायद ये किसी कमजोर नाटक की ही निशानी बनता। तेंदुलकर एक नया रास्ता पकड़कर यह काम करते हैं। यह रास्ता है कि वे परिवार, समाज, धर्म, जाति, राजनीति की झूठी उदात्तता के समक्ष सच्ची क्षुद्रताओं को रख देते हैं, हिंसा इन्हीं क्षुद्रताओं को दिखने वाला औज़ार बनकर आती है। महान उदात्तताओं की परत के नीचे छिपी क्षुद्रताएं नाटकों में उघड़कर सामने आती हैं । बेटी का सौदा करने वाले घासीराम की क्षुद्रता, धर्म, राजनीति और स्त्री का उपभोग करने वाले नाना की क्षुद्रता, धर्म को ढाल बनाकर अपनी वासना को उदात्त बनाने की क्षुद्रता (नाटक-‘कुत्ते’)-ऐसी कई उदाहरण सहज ही इनके नाटकों  में मिल जाएंगे।

तेंदुलकर के नाटकों की ताकत मैदान में मंथर गति से बहने वाली नदी से नहीं तेज़-तूफानी पहाड़ी नदी से नापी जा सकती है। इनके नाटक इसलिए ही सघन हैं कि वे तेजी से भाग रहे हैं। बड़े कैनवास के इनके नाटक द्वंद्वों से टकराते हैं, शक्ति पाते हैं, नए द्वंद्वों को जन्म देते हैं और द्वंद्वहीनता तथा खामोशी के खिलाफ खड़े होते हैं। इन्हीं रचनात्मक सरोकारों से नाटककार उर्जा पाता है। यही वजह है तेंदुलकर कला को एक गंभीर ,सार्थक कर्म मानते हैं। मानवीय त्रासदियों को तनावों, चरम द्वंद्वों से रचने वाले इस रचनाकार के लेखकीय सरोकारों को, प्रतिबद्धता को हम उसके नाटकों के संसार में आसानी से ढूंढ सकते हैं। नाटक के भीतर एक काल्पनिक अदालत का नाटक रचते हुए जब वास्तविकताओं से जूझने की बारी आती है तो ‘खामोश अदालत जारी है’ का पात्र सामंत इस कल्पना से कोरा आनंद उठाने की बात कहता है। लीला बेणारे उसे ठीक करते हुए साफ कहती है-‘‘बिल्कुल। आनंद। लेकिन सामंत ‘जागृति फैलाना भी हमारे कार्यक्रम का प्राथमिक उद्देश्य होना चाहिए’।’’9 इसी नाटक के पात्र कार्निक के जरिए नाटककार ने कला की सार्थकता का मुद्दा उठाया है-‘‘ कोई मुझे समझाएगा कि आधुनिक रंगमंच कैसा  होना चाहिए? लोग अर्थ को जाने बिना केवल शब्दों से खिलवाड़ करते हैं।...’’ (खामोश अदालत जारी है)10। जाहिर है कला के सामाजिक सरोकारों की बेहद साफ समझ ही इन संवादों का आधार है।

इन कलात्मक सरोकारों की जमीन पर खड़े होकर पारिवारिक, सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक सत्ताओं की अमानवीय तानाशाही के वर्गीय चरित्र से आकार लेने वाली विडम्बनाओं, विसंगतियों और विद्रूपताओं की तीखी-खरी पहचान विजय धोंडोपंत तेंदुलकर के नाटक कराते हैं। इस पहचान के साथ जहां ये नाटक मानवीयता के लिए , नए विचारों के लिए जगह बनाने की कोशिश करते हैं वहां सत्ताओं के द्वारा की जा रही उस अनुकूलन -प्रक्रिया के विरुद्ध भी खड़े होते हैं जहां सत्ता के शोषण का शिकार, शोषण को शोषण ही नहीं मानता। ‘जो है उससे बेहतर चाहने’-के प्रयासों से सृजित तेंदुलकर के नाटकों को देखने वाला दर्शक नाटककार के शब्दों के बीच छिपी एक उर्वर चुप्पी को साथ लेकर निकलता है। देश और समाज के कई ज्वलंत सवालों से जूझने के लिए यही चुप्पी यथास्थिति के विरुद्ध प्रतिरोध की भाषा तैयार करती है।

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 संदर्भ
1. कलैक्टिड प्लेज़ इन ट्रांस्लेशन, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटि प्रेस 2005, भूमिका से
2. वही 
3. कमला,विजय तेंदुलकर,राजकमल प्रकाशन दिल्ली ,1984 ,पृ. 78.
4 कलैक्टिड प्लेज़ इन ट्रांस्लेशन, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटि प्रेस 2005, पृ. 61 
5. कमला,विजय तेंदुलकर, राजकमल प्रकाशन दिल्ली ,1984 ,पृ. 60
6. रंगयात्रा 2, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, 2004, पृ. 74-75
7. विट्ठला, विजय तेंदुलकर, ,2008
8. यथाउद्धृत हिंदी रंगकर्मः दशा और दिशा, जयदेव तनेजा,1988, पृ. 228 
9  कलैक्टिड प्लेज़ इन ट्रांस्लेशन, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटि प्रेस 2005, पृ. 59
10. कलैक्टिड प्लेज़ इन ट्रांस्लेशन, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटि प्रेस 2005, पृ. 67                                  

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