प्रज्ञा

साहित्यकार, समीक्षक, और शिक्षक

 

रंग संसार: स्वयं प्रकाश के नाटक

‘‘ कहानीकार के रूप में प्रसिद्धि पाने से बहुत पहले मैंने नाटक और एकांकी लिखना शुरू कर दिया था। लिखता ही नहीं, खेलता भी था। यानि अभिनय, गायन, मंच-सज्जा, मेकअप ,प्रचार आदि सब। कहानी, उपन्यास, निबंध, और नाटक एक ही मां कहिए बाप के बेटे हैं, मां की दुलारी तो कविता है-और उनकी शक्लें, आदतें और स्वभाव इतने मिलते-जुलते हैं कि पता ही नहीं चलता कब, कौन, किसकी जगह ले बैठे। यहां तक कि कौन कब किसमें घुस जाये और कौन कब किसमें से निकल पड़े। कहानी में कभी-कभी क्या नाटक होता है और नाटक में क्या कहानी।’’1---(नुक्कड़ नाटककार स्वयं प्रकाश से लिया गया साक्षात्कार) सन् 1997 से नुक्कड़ नाटक पर शोध के दौरान कई बार स्वयं प्रकाश जी से लंबी बातचीत का सुयोग हुआ तो कई बार पत्रों के जरिए संवाद भी। उनकी प्रसिद्धि एक कथाकार के रूप में हिंदी साहित्य में है पर देखा जाए तो साहित्य की तमाम विधाओं में उन्होंने हस्तक्षेप किया है। चिंतन के नए आयाम दिए हैं। अपनी लेखन यात्रा में लगातार सक्रिय और सचेत रहकर भूमिका निभाने वाले स्वयं प्रकाश ने रचनात्मक लेखन की चुनौती को सदा गंभीरता से लिया फिर चाहे वह वयस्कों के लिए लेखन हो या बाल-पाठकों के लिए। बच्चों के लिए लिखने को तो वो बेहद गंभीर और चुनौतीपूर्ण कदम मानते रहे हैं।

उनके कथा-साहित्य में  नाटकीय पक्षों और विभिन्न नाटकीय उतार-चढ़ावों से वाकिफ कुछ लोग शायद नहीं जानते होंगे कि उन्होंने नाटक के क्षेत्र में भी अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। नाटक चाहे वो प्रोसीनियम का हिस्सा हो या फिर जनांदोलन की भूमिका निभाने वाला नुक्कड़ नाटक ही क्यों न हो, दोनों में उनकी गहरी पैठ रही है। हिंदी क्षेत्र में  आपात्काल  और व्यावसायिक्र्र- लोकप्रिय थियेटर की प्रतिक्रिया में जन्म लेने वाले राजनीतिक नाटक के रूप में वे  आठवें दशक में शुरू होने वाले नुक्कड़ नाटकों सें जुड़े। इस  दौरान ‘सबका दुश्मन’, ‘नयी बिरादरी’ और ‘अशोक चक्रवाली साइकिल’ जैसे सशक्त नाटक उन्होंने नुक्कड़ नाटक आंदोलन को दिए। ‘घर-कैद’ के नाम से इनका एक नाटक दिल्ली और मुंबई आदि के दर्शकों के बीच काफी चर्चित रहा वहीं दूसरी और 1980 में प्रकाशित-‘फीनिक्स’  अपने समय के प्रमुख राजनीतिक सरोकारांं के चलते नाटक की दुनिया में अपनी सशक्त पहचान बनाने में सफल रहा। बाद में ‘इतिहास से पहले’ और ‘चौबोली’ भी चर्चित रहे।

प्रगतिशील-जनवादी नाटकों में आम जनता की दुख- तकलीफों का बयान, समस्याओं के विविध चेहरे, जनपक्षधरता से उपजे इंसानी सरोकार और बेहतर जीवन की संभावना की तलाश शामिल रहती है। इस आधार पर देखें तो स्वयं प्रकाश के नाटक वैचारिक स्तर पर अपनी प्रतिबद्धता के साथ आजादी के बाद लोकतंत्र के नाम पर कायम शासन की कमियों-खामियों को सामने लाते हैं और पूंजीवादी लोकतंत्र में जनवाद के नाम पर जो मजाक चल रहा है उसकी पोल भी खोलते हैं। इनके नाटक व्यापक सामाजिक न्याय की लड़ाई के दौरान उन विसंगतियों और विडम्बनाओं से साक्षात्कार भी कराते हैं जो सत्ता पक्ष की कारगुजारियों का प्रतिफलन हैं । पूंजीवादी-सामंती व्यवस्था के क्रूरतम रूप, निस्पृहता और मानवविरोधी कार्यवाही को स्वयं प्रकाश ने अपने नाटकों का विषय बनाया है।

लगभग पैंतालीस बरसों की होने जा रही नुक्कड़ नाटक यात्रा में आज इस विधा को जो लोकप्रियता और मकाम हासिल है वह इसके शुरूआती दौर में न था। एक वैकल्पिक राजनीतिक हथियार की तरह नुक्कड़ नाटक सामने आया था। जिसे जनता के मुद्दों को उसीकी भाषा में उसीके बीच ले जाना था। देश के आपात्कालीन परिदृश्य ने जनवादी रचनाकारों को संगठित करके कविता, कहानी के मंच से अपनी बात रखने को उत्साहित किया वहीं नुक्कड़ नाटक के उदय ने वाकई भरत के ‘पंचम वेद’ की सच्ची भूमिका निभाते हुए जनता के फौरी मुद्दों और सामाजिक-राजनीतिक विडम्बनाओं के बीच सही रास्ते की पहचान कराने में अपना योगदान दिया। अनेक लेखकों ने इस शक्ति को पहचानकर नुक्कड़ नाटक लिखे, कई मंडलियां बनीं जिन्होंने उन्हें खेला। शोषण के विरोध में हिंदी, अहिंदी भाषा की अनेक कहानियों के नाट्य रूपांतर किए गए और उन्हें जनता के बीच ले जाया गया। उस समय नुक्कड़ नाटकों की स्क्रिप्ट खोजना और उनका दस्तावेजीकरण आज जितना सुलभ और आसान भी नहीं था। इसके पहले  और सशक्त प्रयास के रूप में सव्यसाची के संपादन में वाम जनवादी लेखन के अनियतकालीन आयोजन -‘उत्तरार्द्ध’ का जनवादी नाटक विशेषांक आया। 1983 में आए इस विशेषांक में कई मंडलियों और लेखकों के नाटक, हिंदी-विदेशी कहानीकारों की कहानियों के नाट्य रूपांतर शामिल थे और इसी के दूसरे खंड में शामिल थे नाटककार स्वयं प्रकाश के दो नाटक--‘ नयी बिरादरी’ और ‘सबका दुश्मन’। बाद में सन् 2008 में वाणी प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित बारह नुक्कड़ नाटकों पर आधारित मेरे द्वारा संपादित किताब-‘जनता के बीचः जनता की बात’ में भी मैंने इन दो नाटकों को नाटककार की सहमति और प्रोत्साहन मिलने पर शामिल किया।

पिछले दो दशकों में देश में राजनीतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक स्तर पर बड़ा परिवर्तन आया है। पहले अयोध्या और फिर गुजरात की मानवविरोधी घटनाओं के साथ जिस प्रकार देश का राजनीतिक, सामाजिक, सांप्रदायिक ध्र्रुवीकरण किया गया उससे देश की एकता को काफी खतरा पहुंचा। इसी प्रकार सामाजिक न्याय की लड़ाई भी राजनीतिक सत्ता प्राप्ति के लक्ष्य तक सीमित होकर रह गई जबकि सामाजिक न्याय का रास्ता इससे कहीं आगे चलकर पूरे समाज के रूढ़िवादी और जड़तावादी ढांचे को ध्वस्त करने की ओर जाता है। बरसों बाद सामाजिक न्याय की दिशा में संघर्षरत रहने के बाद दलित समुदायां के चंद प्रतिनिधि सामाजिक-राजनीतिक स्तरों पर ऊंचे पदों पर पहुंचे हैं पर सवाल यह है कि क्या हम आजादी के इतने बरसों बाद भी जातिवाद जैसी अमानवीय जड़ता को खत्म कर पाए हैं? शिक्षा,खान-पान, प्रेम और विवाह जैसी बुनियादी बातें उठते ही सारा सच एकदम सामने आ जाता है। इससे यह बात साफ हो जाती है कि सामाजिक न्याय की लड़ाई मात्र राजनीतिक सत्ता प्राप्ति से ही पूरी नहीं होगी बल्कि इसके लिए एक लंबा सामाजिक-सांस्कृतिक संघर्ष करना होगा जिसका हथियार बनेगी-शिक्षा। नाटककार स्वयं प्रकाश का नाटक ‘नयी बिरादरी’ इसी बात की गहराई में जाकर स्थितियों का गंभीर विश्लेषण करता है। नाटक का प्रमुख किरदार रामेश्वर और उसका दोस्त जात- बिरादरी से बड़ी बिरादरी मनुष्यता की मानते हैं। सदियों से चली आ रही मनुवादी व्यवस्था के ये प्रबल विरोधी हैं। नाटक का शुरूआती गीत ही जातिगत उत्पीड़न की जन्मजात टीस और अपमान की बदस्तूर चली आ रही कथा को बयां करता है-‘‘ पैदा होने से पहले किसने,किससे पूछा था, वह कौनसा मजहब लेगा, वह कौनसी जात चाहेगा, पूछा होता  भी मानो, तो कौन भला यह कहता, मुझे अछूत होना है, मुझको हरिजन बनना है, फिर भी हरिजन होना ही हम लोगों की गलती है, हम मजबूरों को जिसकी हर रोज सजा मिलती है।’’2 

वर्चस्व प्राप्त समूह, वर्ण व्यवस्था की निचली पायदान पर खड़े इंसान को इंसान नहीं समझता इसीलिए दमन की प्रचंड अग्नि में उसे झौंकने में इस समूह को कोई संकोच भी नहीं होता। ब्राह्मण हो चाहे बनिया या कोई अफसर, जातिगत पूर्वाग्रहों का स्वरूप और घृणा अधिकांशतः सबके दिमाग में एक ही जैसी है। और तो और लूटने के प्रपंच भी सबके एक समान। ब्राह्मण की धर्म के नाम पर, ठाकुर की बेगार, बनिये का सूद के नाम पर पीढ़ी दर पीढ़ी ठगने की कवायद और सरकारी योजनाओं के तहत दलित समाज को अधिकारियों द्वारा लूटने के गोरखधंधे। नाटक के दलित धूड़ा के जरिए सर्वणों की नफरत को दर्शाया गया है। उसकी पत्नी को ठाकुर के पांव दबाने के बहाने हवेली में बुलाया जाना दोहरे शोषण की दास्तान व्यक्त करता है-दलित के रूप में भी और स्त्री के रूप में भी। मना करने पर हिंसा का शिकार होना पड़ता है। धूड़ा को हत्या के झूठे मामले में फंसाया जाता है और  उसकी पत्नी पर जुल्म के दौरान उनका बेटा रामेश्वर अपने दोस्त के साथ अचानक गांव आता है। जुल्म और अन्याय का दोनों मिलकर विरोध करते हैं। नाटककार ने इस प्रकरण में एक और द्वंद्व को उभारा है। मुसीबत में मदद के लिए आए रामेश्वर के ब्राह्मण दोस्त के प्रति रमिया का नजरिया-‘‘क्या करेगा कोई? ऊंची जात वाला हमारी क्यों मदद करेगा?’’3 रमिया का ये सवाल सदियों से सर्वणों द्वारा जारी उत्पीड़न की उस भयानक विडम्बना को दिखाता है जिसके कारण  वह यही समझती है कि कोई सवर्ण उनका हितैषी कैसे हो सकता है?

एक ओर ये नाटक दलितों की इस इकहरी समझ को भी तोड़ता है तो दूसरी ओर सर्वणों को भी चेताता है कि आजादी के बाद, सामाजिक न्याय की दिशा में अधिकारों का इल्म होने पर जुल्म करना अब उतना आसान नहीं। नाटक के अंत में सूत्रधार कहता है-‘‘यही सबसे बड़ा सवाल है जनाब! आदमी की बिरादरी कहां है? कौन सी है? यदि हो, तो इनके आंसू पौंछने कोई क्यों नहीं आया? खून चूसने वाले, सताने वाले आपने देखा संगठित हैं, मिले हुए हैं, एक हैं और जो पिट रहे हैं असंगठित हैं, बंटे हुए हैं, अनेक हैं। रामेसर और उसका दोस्त अगर इन लोगों को जोड़ पाएंगे तभी जुलम-जासती की चट्टान को तोड़ पांएगे? मगर इन लोगों को खुद भी जागना और जगाना पड़ेगा, भागना नहीं चोट्टों को भगाना पड़ेगा।’’4 बेहतर साहित्य सदा असंभाव्य संभावना की राह दिखाता है । स्वयं प्रकाश का यह नाटक भी इस दिशा में सार्थक कदम उठाता है। यदि मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य को देखें तो सन् 2014 के लोकसभा चुनाव परिणामों ने विभिन्न जाति, समूहों के आधार पर चुनाव जीतने वाले क्षेत्रीय दलों के अस्तित्व को प्रश्नित किया है। बहुत सी जगहों पर तो इनका समूचा सफाया हुआ है पर सवाल उठता है कि क्या इस चुनाव ने जाति या अस्मिता के सवालों को खत्म किया है? यदि नहीं तो फिर साहित्य और समाज के खेमे से सदियों से चली आ रही समानता की मांग आज भी प्रासंगिक है और ये समस्याएं आज भी ज्चलंत। स्वयं प्रकाश का यह नाटक भले ही कई दशक पूर्व के भारतीय समाज की वास्तविकता से हमारा परिचय कराता है पर यह अत्यंत दुखद है कि आज भी वास्तविकता का यह परिदृश्य बदला नहीं है। आज भी झज्जर, मिर्चपुर और भगाणा की घटनाएं जाति आधारित विद्वेष और नफरत को दिखाती हैं। दलित समुदाय के सशक्तिकरण के प्रयासों को समाज का दबंग वर्ग बलात्कार, हत्या, आगजनी और लूट के जरिये दबाना चाहता है। ये घटनाएं तो वे हैं जो कि मीडिया के माध्यम से हमारे सामने आती हैं और हमें झकझोर देती हैं परंतु देश के विभिन्न भागों में अनेक ऐसी घटनाएं घट रही हैं जिनकी सूचनाएं तक मुख्यधारा के मीडिया में नहीं आतीं। ऐसे में सवाल उठता है कि इक्कीसवीं सदी का ग्लोबल भारत क्या वास्तव में आगे बढ़ रहा है, या फिर हम आज भी किसी मध्यकालीन समय में जी रहे हैं। मनुष्य की पहचान और उसका अस्तित्व आज भी उसकी मनुष्यता से नहीं बल्कि उसी जाति से आंका जा रहा है। मुझे लगता है कि बड़े साहित्य का काम ही यही है कि वह असुविधाजनक परंतु वास्तविक सवालों को हमारे बौद्धिक, भावात्मक और वैचारिक पटल से ओझल न होने दे। स्वयं प्रकाश के इस नाटक के माध्यम से यही काम करते हैं।  

प्रेमचंद ने अपने अपने लेख ‘महाजनी सभ्यता’ में इस सभ्यता के एक सिद्धांत के रूप में पैसा ही सर्वापरि और ‘टाइम इज़ मनी’ जैसे मनुष्य विरोधी सिद्धांत की कलई खोली थी। स्वयं प्रकाश व्यावहारिक रूप में अपने नाटक ‘सबका दुश्मन’ में उसे दिखाते हैं। सूदखोरी, कालाबाजारी करने वाला मुनाफाखोर व्यापारी वर्ग किसी का भी सगा नहीं है। मजदूरों और श्रमजीवी वर्ग का ही नहीं अपने परिवार का भी ये दुश्मन है। इस संदर्भ में पिता-पुत्री संबंध भी केवल धन आधारित रह जाता है --इस त्रासदी को नाटक में दिखाया गया है। अनाज की ब्लैकमार्किंटिंग करने वाले सेठ को अपनी बेटी और भूख से कुलबुलाते उसके बच्चे भी नजर नहीं आते। अनाज के दाम स्वरूप शादी के अवसर पर खुद ही उपहार में दिए गेहने  अपने ही पास गिरवी रखवाने पर सेठ का दामाद चौंकता है। इस पर सेठ धड़ल्ले से कहता है-‘‘इसमें इंसानियत की क्या बात है? भई देखो...रिश्तेदारी...रिश्तेदारी की जगह...बिजनेस,बिजनेस की जगह,इसमें बुरा मानने की बात नहीं है। यह व्यवहार की बात है।’’5 नाटक में एक पागल पात्र सेठ की बच्ची का कारूणिक विलाप सुनकर गोदाम की चाबी छीन लेता है और जनता को अनाज मिल जाता है। मुनाफाखोर परजीवी वर्ग का नुमाइंदा सेठ भाग खड़ा होता है। पर विडम्बना यह है कि आज के आर्थिक उदारीकरण के दौर में सेठ के गोदाम की चाबी और भी सुरक्षित हो गयी है। मुनाफाखोर और जमाखोर देश की राजनीतिक व्यवस्था से उपजी निराशा और आक्रोश का लाभ उठा रहे हैं। यहाँ मुक्तिबोध की बात याद आती है कि कविता में कहने की आदत नहीं पर कह दूं/वर्तमान समाज चल नहीं सकता/पूंजी से जुड़ा हृदय बदल नहीं सकता। परंतु देशव्यापी जो जन आक्रोश है वह भी निरंतर बढ़ रहा है और देश में ‘पागलां’ की संख्या बढ़ रही है और बदलाव की  सम्भावना भी यहीं है।  

नुक्कड़ नाटक को ‘अर्जेंट संदेश’ की विधा , राजनीतिक कार्यवाही और कलात्मक प्रेरणा से सम्पन्न मानने वाले स्वयं प्रकाश के नाटकों की भाषा बेहद चुस्त है। एक के बाद एक संवाद, संवादों की गति, क्षिप्रता उनमें उभरता द्वंद्व, किरदारों के तेवर और व्यंग्य की धार सभी उनके नाटकों को सशक्त बनाते हैं। उनका मानना है-‘‘ नाटक का शिल्प और उसकी भाषा कथ्य पर निर्भर करती है। नुक्कड़ नाटक चूंकि तुरत सम्प्रेष्य ( इंस्टैंटली कम्युनिकेबल) है इसलिए उसकी भाषा हमेशा स्थानीय रूप से सर्वसुलभ होनी चाहिए। नुक्कड़ नाटक का काम है ‘व्यंग्य’। लोगों ने गीत-संगीत , कोरस और पैथोस (करूणा) का भी खूब अच्छा इस्तेमाल इसमें किया है। प्रतीक-बिंब-आवृत्ति का भी। यहां तक की क्रोध और गालियों का भी। शारीरिक संरचनाओं का भी। आशुकविता और मूकाभिनय का भी। फ्रीज और फ्लैशबैक का भी। ध्वनि प्रभावों और भाषिक विखंडन (ऊलजलूल जुमले या अर्थहीन शब्द-संयोजन आदि का भी।) यानि शिल्प की दृष्टि से इस नाट्य रूप में अपार संभावनाएं हैं।’’6

आजादी के बाद सत्ता के दमनकारी और मानवविरोधी रूप को अपने नाटकों में दिखाने के क्रम में उनका एक  प्रभावशाली नाटक है-‘फीनिक्स’। एक अमर पक्षी के रूप में फीनिक्स के मिथ को नाटक में आम जनता के प्रतीकात्मक रूप में उभारा गया है जो जीवन यात्रा के बाद अपनी देह में से ही एक नयी देह धारण कर लेता है। इस नाटक में आम जनता, जिसका अस्तित्व सत्ता की नजर में नगण्य है वह अपने सवालों के साथ फांसी दिए जाने के बाद भी नई देह धारण कर लेती है। जनता के सवाल उसकी मांगों का अंत नहीं होता। ये नाटक सत्ता की मानवविरोधी कारगुजारियों का पर्दाफाश करता है। आम जनता को जबरन अपराधी बनाकर , राजा के प्रति बगावत के जुर्म में  राजद्रोह साबित कर मौत की सजा देती है। तीन अंकों में बंटे इस नाटक के पहले अंक की भाषा गौर करने लायक है। बाबू और आदमी के संवाद की असंगति दरअसल सामाजिक-राजनीतिक विडम्बनाओं के रस्ते अर्थवान होती चलती है। पहले ही अंक में बाबू, मास्टर, शायर, एक देहाती , एक लड़का सभी आम जनता के रूप में सामने आते हैं जिन्हें पुलिस वाला नियंत्रित करने की कोशिश करता है। बाबू की बातें दर्शकों को चौंकाती हैं- चौराहे पर सबको घर का बनाया लड्डू खिलाना, पिता का नाम महात्मा गांधी बताना, सरकार को निरर्थक बताना आदि। पुलिस वाले उसे कभी मुसलमान बताकर तो कभी किसी कांस्पिरेसी का हिस्सा बताने लगते हैं। अचानक शाही सवारी के निकलते वक्त महाराज की पालकी उठाने वाले का एक आदमी का संतुलन बिगड़ता है, राजा गिरने को होता है। बगावत समझकर पुलिस दमनात्मक कार्यवाही करती। बाबू, मास्टर, लड़के और शायर को गंभीर चोटें आती हैं। इन्हें असपताल भेजा जाता है जिससे ठीक करके इन्हें बगावत और राजद्रोह के जुर्म में मरने के लिए तैयार किया जाए।

दूसरे अंक में अस्पताल में इन लोगों की बातचीत, बगावत सिद्ध करने के लिए पत्रकारों का आना, साजिश में विदेशी हाथ जैसे आरोप भी जुड़ने लगते हैं। कुल मिलाकर कहें तो निरपराध जनता को जबरन बागी घोषित करके दंडित करना सत्ता और उसके नुमाइंदों की चाल है। इस बीच नर्स की कर्कश आवाज, रूखे व्यवहार को उजागर करते हुए नाटककार ने ये भी दिखाया है कि अस्पताल में पुरूष डॉक्टर द्वारा उसका शारीरिक शोषण जारी है। यहां इन पर झूठे इल्जाम को और भी पुख्ता बनाने के नजरिए से पुलिस अफसर पत्रकारों से कहता है-‘‘आपको याद होगा महीना भर पहले इन्होंने सरकारी जुलूस पर बम फेंका था जिसमें दो सरकारी कामदार मारे गए थे। इस किस्म की वारदातें और भी जगह हुईं या होने वाली थीं। लेकिन उन्हें निहायत चुस्ती के साथ निबटा दिया गया और नाकाम कर दिया गया। तब उन्होंने जिंदगी के अलग-अलग शोबों में घुसकर बगावत के बीज फैलाने शुरू किए। इन्होंने किसानों से कहा तुम भूखे हो हालांकि तुम ही अनाज उगाते हो! लेकिन इन्होंने ये नहीं बताया कि इसमें गलती सरकार की नहीं खुद किसानों की है जो आलसी हैं और कम अनाज उगाते हैं। इन्होंने मजदूरों से कहा तुम्हारी मेहनत की कमाई कारखानेदार लूट रहा है। वह लखपति से करोड़पति हो रहा है और तुम गरीब से कंगाल। सब जानते हैं मजदूरों में कितनी अक्ल होती है!वे पुश्तैनी जाहिल,कामचोर और शराबी हैं।’’7 

तीसरे अंक में यही तर्क राजा दोहराता है। दरबार की औरतों की तमाम व्यभिचारी प्रवृत्तियां जो वीभत्सता की हद तक पहुंचती हैं, राजा की शोषणधर्मी अराजक मानसिकता -मास्टर, शायर , लड़का , बाबू को अपनी सफाई में न बोलने देकर फांसी की सजा सुनाना। बाद में जनता के पक्षधर लोगों का ‘वाम दिशा और समय साम्यवादी’ गीत सुनकर राजा का  सावधान होना और भयग्रस्त होकर धर्माचार्य से अपना भविष्य बांचने को कहना जैसी बातें राजा के जरिए लोकतंत्र के खोखलेपन की ओर इशारा करती हैं जो जनता के संघर्ष को कुचलने के लिए निरपराधियों को केवल इसलिए सजा-ए-मौत देता है ताकि शेष जनता सबक ले और सारे जुल्म सहते हुए कभी अपने हक के लिए मुंह न खोले। न्याय, व्यवस्था , शांति और खुशहाली की बिना पर बाबू को फांसी दे दी जाती है। पर उसके अगले ही क्षण खबर आती है कि ‘‘वह आदमी अभी बीच चौराहे पर लड्डू बांटता पकड़ा गया।’’8 राजा स्तब्ध रह जाता है और अंतिम दृश्य में सब फ्रीज होते हैं और मंच पर रह जाती है बाबू की व्यंग्यात्मक हंसी।

व्यंग्यात्मकता और प्रतीक से निर्मित इस नाटक की घटनाएं एक के बाद एक नंगे सच को सामने लाती हैं और आजादी के बाद के आपात्कालीन परिदृश्य से साक्षात्कार कराती हैं। प्रत्यक्ष आपात्काल और अप्रत्यक्ष आपात्काल दोनों को इसमें देखा जा सकता है। अधिकारविहीन जनता को कुचलना और शांति-व्यवस्था बनाए रखने की आड़ में चुपके से जनता के मानवीय और संवैधानिक हितों को हस्तगत कर लेना। धारदार कथ्य का प्रस्तुतिकरण भी वाकई सशक्त है। वाम राजनीति को जनपक्षधर राजनीति सिद्ध करते हुए कहीं फैज़ की नज्म का इस्तेमाल है तो कहीं शमशेर के गीत का प्रयोग। संगीत तो पूरे नाटक में है ही। पहले अंक में जनता को कुचलने के लिए नृत्य और ताल की मुद्राओं में लाठी पत्थर युद्ध की संरचना, चौराहे और त्रस्त जनता को बिंबिंत करने के लिए विभिन्न ध्वनि संयोजन दृश्य को कथ्य और प्रस्तुति के स्तर पर बेहद ऊंचाई पर ले जाते हैं। अस्पताल के भीतर की छोटी-छोटी गतिविधियां नाटक को शक्ति पहुंचाती हैं। दरअसल चाहे चौराहा हो या अस्पताल ये सभी स्थान जनता के संगठित होने की जगहें बन जाती हैं। जहां जनता के दुख-तकलीफ एक हो जाते हैं और नफरत पैदा करने वाली सत्ता की प्रतिक्रिया में जनता एक दूसरे से प्यार करने लगती है। ये संगठनात्मक कार्यवाही के मंच बन जाते हैं।

यदि इन तीनों नाटकों के अंत को देखें तो तीनों में ही हमें समानता मिलेगी। शोषक सत्ता के अत्याचारों से त्रस्त जनता अपनी मुक्ति के रास्ते को पहचानकर कृतसंकल्प होती है। ‘नयी बिरादरी’ और ‘सबका दुश्मन’ जैसे नुक्कड़ नाटक में शोषक वर्ग से सीधे टकराकर अपने हितों के लिए सचेत होती जनता अपने भविष्य की नयी नींव रखती है। ‘नयी बिरादरी’ नाटक में तार्किक-बौद्धिक रूप में यह भविष्य दिखाई देता है तो ‘सबका दुश्मन’ नाटक में अतिक्रांतिकारिता का पक्ष लेकर। इसी तरह  मंच नाटक ‘फीनिक्स’ की बात करें तो शासक अभिजन की नजर में दोषी पाए गए लोगों को फांसी दिए जाने वाले अंतिम दृश्य में जबरन बागी बना दिए गए आम लोगों के पक्ष में नेपथ्य में कई आवाजें खड़ी होती हैं। ये आवाजें चीखती हैं, शोर मचाती हैं और वाम विचार के गीत गाती हैं। इस साम्य के अतिरिक्त तीनों नाटकों में ही  भयाक्रांत करने वाले वर्तमान, दमन तंत्र की उत्पीड़क कार्यवाही और तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों में भी  आम जनता आशा के गीत गाती है। एक नयी सुबह का स्वप्न ये नाटक दिखाते हैं। ये तीनों नाटक सामाजिक-राजनीतिक संरचना के विश्लेषण के क्रम में अंतर्विरोधों से जूझते हैं, विसंगतियों-विद्रूपताओं को परखते हैं, इनके किरदार कई मौकों पर निराश होते हैं, टूटते भी हैं पर व्यवस्थागत सुधार के प्रति नाउम्मीद नहीं होते। इस तरह रचनाकाल की दृष्टि से पुराने होते हुए भी ये नाटक आज के माहौल में भी वैचारिक स्तर पर अपनी अर्थवत्ता बनाए हुए हैं। ये नाटक न सिर्फ यथास्थिति का हरसंभव विरोध करते हैं बल्कि प्रतिरोध के नए रास्ते ईजाद करते हैं। चीनी क्रांति के जनक माओ ने सच्चे कलाकार के बारे में कहा था कि ‘‘ क्रांतिकारी लेखक अथवा कलाकार तभी उपयोगी काम कर सकता है जब वह आम जनता से घनिष्ठ सम्बंध कायम करता है, उसके विचारों और उसकी भावनाओं को आवाज़ देता है, उसका वफादार प्रवक्ता बनकर उसी सेवा करता है। केवल आम जनता का प्रवक्ता बनकर ही वह उसको शिक्षित कर सकता है, केवल आम जनता का शिष्य बनकर ही वह उसका शिक्षक बन सकता है।’’9 स्वयं प्रकाश एक सच्चे जनवादी लेखक की तरह आम जनता के जीवन के आक्रोश और संघर्षों को अपने साहित्य का विषय बनाते हैं। जनता के प्रवक्ता बनकर उसके शिक्षक बनने का काम करते हैं।  
 
 संदर्भ-
1.    साक्षात्कार : परिशिष्ट-5, पृ.219 नुक्कड़ नाटकः रचना और प्रस्तुति-प्रज्ञा
2.    जनता के बीचः जनता की बात, नुक्कड़ नाटक संग्रह, पृ.187, संपा. प्रज्ञा
3.    वही , पृ. 195
4.    वही, पृ. 199-200
5.    वही , पृ. 203
6.    साक्षात्कार : परिशिष्ट-5, पृ.221 नुक्कड़ नाटकः रचना और प्रस्तुति-प्रज्ञा
7.    फीनिक्स- स्वयं प्रकाश, पृ. 31
8.    वही ,पृ. 72 
9.    कला और साहित्यः माओज़े दुंग, पृ. 41
 

 

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