महेश एलकुंचवार के प्रसिद्ध नाटक आत्मकथा का मंचन

हम क्यों असत्य पर सत्य का रंग चढ़ाकर जीने का स्वांग रचते हैं? मैंने अपनी, उत्तरा और वासंती की कहानी को कितना झूठा बना दिया! खुद के झूठ को ढकने के लिए एक काल्पनिक सत्य को गढ़ना... या दुनिया में कोई सत्य होता ही नहीं? या जब हम सच को नहीं समझते तो क्या यह झूठ हो जाता है?”

राजाध्यक्ष का यह कथन दर्शकों के मन में एक अवसाद पैदा करता है। प्रेक्षागृह की खामोशी अचानक सन्नाटे में बदल जाती है। शायद हर कोई अपने जीवन के सच और झूठ का नाप तौल करने लगता है। बैकग्राउंड से आ रही वायलिन की शोकाकुल ध्वनि इस संवाद के प्रभाव को और भी मारक और मार्मिक बना देती है। 27 फरवरी 2017 को हैदराबाद विश्वविद्यालय के सावित्रीबाई फुले सभागार में आवर्तन थियेटर ग्रुप एवं हैदराबाद विश्वविद्यालय छात्र संघ के संयुक्त तत्वाधान में महेश एलकुंचवार का प्रसिद्ध नाटक आत्मकथा का मंचन कृष्ण सोनी के निर्देशन में किया गया। भारतीय नाट्य साहित्य के इतिहास में यह नाटक मील का पत्थर है। यह मानवीय संबंधों के अनकहे परतों की उलझन को दर्शकों के सामने प्रदर्शित करता है। नाटक में राजाध्यक्ष, प्रज्ञा, उर्मिला और वासंती के माध्यम से भारतीय मध्यवर्ग के त्रासद जीवन को दर्शकों के सामने प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। भारत के अधिकांश नटकों में व्यक्ति के सामाजिक पहलुओं के माध्यम से निजी जीवन को समझने का प्रयास किया जाता है पर यह नाटक मनुष्य के निज़ी जीवन की जटिलता के माध्यम से सृजनशील समाज की वास्तविकताओं से दर्शक को रूबरू कराता है। सम्पूर्ण नाटक एक लेखक के अंतर्मन का मंथन है जो राजाध्यक्ष, प्रज्ञा, उत्तर और वासंती के माध्यम से प्रेक्षक के निजत्व को टटोलता है। राजाध्यक्ष एक प्रसिद्ध मराठी लेखक है, प्रज्ञा एक शोध छात्र है जो राजाध्यक्ष के साहित्य पर शोध कर रही है और उनकी आत्मकथा की पाण्डुलिपि भी तैयार कर रही है। उत्तरा राजाध्यक्ष की पत्नी है और वासंती उत्तर की बहन जो उससे लगभग बीस साल छोटी है। नाटक की कथा वस्तु इन्हीं पात्रों के निजी जीवन के इर्द-गिर्द घुमती है। निर्देशक ने इन पात्रों के निजी संबंधों के सच, झूठ और पश्चाताप की अग्नि में जलते अंतर्मन के माध्यम से मंच पर मानवीय जीवन की त्रासदी का महाकाव्य रचने का प्रयास किया है। नाटक कहीं से भी बाह्य आवरण का प्रदर्शन करता नहीं दिखता बल्कि संवादों के अर्थान्वेषण के लिए भावों और भंगिमाओं के माध्यम से दर्शकों को अन्तर्मुखी यात्रा पर ले जाता है। रिश्तों की जटिलता की वास्तविकता को अभिनय की गंभीरता के माध्यम से नाटक की दुरुहता को सहजता एवं अर्थान्विती देता है। प्रत्येक संवाद प्रभावशाली और प्रवाहमयी है।

इस नाटक की सबसे बड़ी विशेषता इसका शिल्प विधान एवं रंग कल्पना है। लेखक ने मंच को तीन भागों (A, B और C) में विभाजित किया है। A राजाध्यक्ष का मेहमानखाना है, B उत्तरा का घर और C कॉमन प्लेस है जहाँ नाटक के सारे फ़्लैश बैक दृश्य को प्रदर्शित किया गया है। निर्देशक ने लेखक के इन विभाजन को अत्यंत सफलता से दर्शाने का प्रयास किया है। मंच पर A और B वाले हिस्से में 6x10 के दो फ्रेम लगा कर मेहमानखाना और घर का शक्ल दिया है तथा मध्य भाग को, जिसे लेखक ने C कहा है, में 4x6 साइज़ के 7 प्लेटफोर्म के माध्यम से एक सीढ़ीनुमा आकृति बनाया है। यह स्थान कभी लेखक का घर कभी छत और कभी बैठक घर की तरह इस्तेमाल किया गया है। प्रकाश योजना भी अत्यंत सुलझा हुआ है। नाटक में कई जगह फ़्लैश बैक सीन हैं जिसे प्रकाश योजना के माध्यम से निर्देशक ने अत्यंत सहज और बोधगम्य बनाया है। दृश्यों के अंतराल को वायलिन और पियानो के सोलो और फ्यूज़न के माध्यम से भरने का प्रयास किया गया है जो नाटक की गंभीरता और जटिलता को सहज एवं प्रभावकारी बनाता है। प्रज्ञा को छोड़कर सभी अन्य सभी पात्रों की आयु 45 से 78 के बीच है इसलिए रूप सज्जा में आयु का सही-सही प्रदर्शन हो इसका भी ख्याल रखा गया है। मूल नाटक में कुल चार पात्र हैं परंतु निर्देशक कृष्ण सोनी ने फ़्लैश बैक दृश्यों के दृश्यांकन में तीन अतिरिक्त पात्र का सृजन किया है जिसमें राजाध्यक्ष, उत्तर और वासंती के युवा आयु वाले दृश्यों को दिखाए गए हैं। राजाध्यक्ष की भूमिका में वासुदेव वी.ए. और सुन्दर राठौर, प्रज्ञा की भूमिका में श्वेता तिवारी, फ़्लैश बैक के दृश्यों में उत्तरा और उर्मिला को मंच पर गायत्री सेट्टी ने जीवंत किया और वासंती और वसुधा की भूमिका रश्मिरेखा साहू ने, वृद्ध उत्तरा और वासंती की भूमिका प्रज्ञा सिंह और विंदिता नईक ने निभाई। प्रकाश योजना अभिषेक नंदन और कुमुद रंजन मिश्र, संगीत समायोजन प्रिंसी पपेचन और नखरई देबबर्मा, रूप सज्जा केया देबनाथ, मंच प्रबंधन नंदगोपन जी. ने किया। इस नाटक की सबसे बड़ी विशेषता संवादों के माध्यम से भावों की खोज एवं अभिव्यक्ति रही। 

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सहयोगकर्ता: Nikesh