21वीं सदी के हिंदी उपन्यासों में शिल्पगत बदलाव

पिछले कुछ वर्षों से हिंदी साहित्य में पाठकों द्वारा ऐसी पुस्तकें अधिक पसंद की गई हैं जिनकी विधा का निर्णय सरलता से नहीं किया जा सकता है। हम यह मानते हैं कि समय की आवश्यकता के अनुसार विधाएँ बनती और लुप्त होती रहती है और यथार्थवादी उपन्यासों में प्रारम्भ से ही कमोबेश प्रयोग होते रहे हैं। इक्कीसवीं सदी के प्रारंभ में लिखे गए उपन्यासों में शिल्पगत बदलाव हमें देखने को मिल रहे हैं।

कथावस्तु के तरीके में बदलाव उपन्यास की रचना-प्रक्रिया का मुख्य तत्त्व उसका ‘वस्तु शिल्प’ है। उपन्यास में ‘वस्तु’ का तात्पर्य उपन्यास की विषयवस्तु से है, जो कहानी के रूप में वर्णित होती है। उपन्यास में वर्णित घटनाओं का वह संग्रह है, जिस पर उपन्यास का ढाँचा खड़ा होता है। हम कह सकते हैं कि शरीर में हड्डियों का जो स्थान है, वहीं उपन्यास में वस्तु शिल्प का है। काशीनाथ सिंह का उपन्यास ‘काशी का अस्सी’ पाँच भागों में विभाजित, जिसके पांचों भाग अलग-अलग समय पर अलग-अलग पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए। लेखक ने भी कभी नहीं सोचा होगा कि ये पाँचों भाग मिलकर एक मुकम्मल किताब बनने जा रही है। या उपन्यास। प्रख्यात समालोचक नामवर सिंह युवा समीक्षक पल्लव को दिए साक्षात्कार में कहते है कि ‘‘उपन्यास की कोई बंधी बंधाई परिभाषा है नहीं। उपन्यास डॉन क्विगजोट जैसा बड़ा ढीला-ढाला हो सकता है और छोटा भी हो सकता है। इसकी संरचना के कई रूप हो सकते हैं और आकार से या अध्यायों से, एक सधे-बंधे, इकहरे कथानक से उपन्यास, उपन्यास नहीं बनता है बल्कि टुकडे-टुकड़े दास्तान में दास्तान तो है। एक सूत्र तो है। इसलिए उपन्यास के रूप विधान की दृष्टि से एक नये ढंग का उपन्यास है। जो क्लासिकल ढाँचा होता है उस संरचना से अलग हैं....... अंतर्वस्तु का रूप विधान का निर्धारण करती है, रूप विधान का बना बनाया साँचा लेकर कोई उपन्यास लिखे, वह उपन्यास की खाना पूर्ति होगी। इस दृष्टि से काशी कथा-कोलाज को जुटाकर एक साथ एक परिघटना के आधार पर इसे उपन्यास कहा हैं तो इसमें कोई आपत्तिजनक बात नहीं दिखाई पड़ती है। कहा जा सकता है कि उपन्यास की अनेक संरचनाओं में से एक यह है।’’1 इस उपन्यास में पाँच कहानियाँ हैं या पांच खंड हैं। ये उपन्यास के रूप में नहीं लिखे गए थे। लेकिन वो एक मुकम्मल उपन्यास बनकर हमारे सामने है क्योंकि पाँचों कहानियों का केन्द्र ‘अस्सी’ ही है। वह उपन्यास का नायक है। पहली  कहानी ‘देख तमाशा लकड़ी का’ में चरित्र वास्तविक है। देश में उपभोक्ता संस्कृति के साथ आ रहे परिवर्तन को देश के हर चौराहे के साथ काशी का अस्सी ने करीब से देखा, इस परिवर्तन को जीया लेकिन सब कुछ नहीं बदला क्योंकि सब कुछ बदल जाए तो जीवन के कोई मायने ही नहीं और आम आदमी जीवन के अर्थ व मायने को अच्छी तरह समझता है। अपने शहर को, अपने समय को देखने वाले लोग हैं, यह किसी एक आलोचनात्मक विवेक के साथ अपने वाले आमजन इस चौराहे पर तबसे खड़े हैं, जबसे यह देश खड़ा है, इनकी आँखें सजग प्रहरी की तरह समय और संस्कृति की रक्षा में खड़ी दिखती है, यहाँ जीवन के विस्तार की कहानी को लिखा, पढ़ा व आलोकित किया जाता है। इस तमाशे में केवल तमाशबीन ही नहीं है बल्कि तमाशे के खिलाफ वे सारे लोग भी हैं जिनके होने से देश बनता है। वह है आम आदमी,  इसकी बदौलत  कोई भी  देश बनता है, इसीलिए यहाँ पूरे देश की समस्याएँ अपने आकार प्रकार के साथ खड़ी होती दिखाई देती हैं। इन सबका रस पीते-पीते अनंत संघर्षों के बीच जीती, हँसती, खेलती जनता है, जो हर हादसे से वास्तविक और काल्पनिक के बीच अपने जीने के लिए रस निकाल लेती है, इसी के प्रतीक है तन्नीगुरु, गयासिंह आदि। काशी का अस्सी केवल चौराहा नहीं बल्कि एक ऐसा जीवन केन्द्र है जहाँ से पूरे देश की रंगत को पकड़ा जा सकता है। उपन्यास के दूसरे भाग या दूसरे अध्याय ‘संतों घर में झगरा भारी’ में उपन्यासकार ने जीवन को आगे बढ़ाने और पीछे धकेलने वाली शक्तियाँ एक साथ सक्रिय रहती हैं। इन्हीं के बीच आदमी फंसा रहता है। ऐसे में जीवन को हंसते हुए जीते जाना भी जीवन की सार्थकता है। इन्हीं आगे-पीछे के पंजों/जबड़ों के बीच खिलखिलाती जनता को इसमेंं देखा जा सकता है। जनता का दर्द इतना बड़ा है कि उसे इस रूपक से बेहतर किसी और तरीके से नहीं समझाया जा सकता। जनता अपनी जीवन शक्ति के सहारे हर विपर्यय के बीच न केवल जीती है बल्कि तनकर खड़ी हो जाती है और ये नये परिवर्तन व नये जीवन की ओर संकेत करती है। जनता की इसी करिश्माई चरित्र को लेखक औघड़ संस्कृति कहता है। कैसी भी स्थिति हो औघड़ मगन ही रहता है। अपनी पहचान को कायम रखता है, ठीक वैसे ही हिन्दुस्तान की जनता समय का इंतजार करती हुई संघर्ष करती है। जनता की दुर्दशा को रूपायित करता हुआ चरित्र का पाठ यो खुलता है, ‘‘धक्के देना और धक्के खाना, जलील करना और जलील होना, गालियाँ देना और गालियाँ पाना औघड़, संस्कृति है। अस्सी की नागरिकता के मौलिक अधिकार और कर्तव्य। इसके जनक संत कबीर रहे हैं और संस्थापक औघड कानीराम।’’2 इसी अस्सी पर पप्पू की दुकान है जो हर परिवर्तन की दृष्टा है। राजनीतिक परिवर्तन से लेकर भौतिक और सांस्कृतिक परिवर्तन के सूत्र संकेत पप्पू की दूकान से उठते हैं, उठते रहेंगे। आम आदमी के जीवन की बहस का केन्द्र है- भाई पप्पू की दूकान। इसे केवल चाय-पानी का केंद्र नहीं समझना चाहिए बल्कि व्यवस्था परिवर्तन से लेकर संस्कृति और जीवन परिवर्तन के केंद्र के रूप में देखा जाना चाहिए। यह परिवर्तन केवल बाहरी दुनिया का नहीं है बल्कि यहाँ से मनुष्य के भीतर उसके चरित्र में आये परिवर्तन को भी लक्षित किया जा सकता है, तभी तो व्यवस्था बदलती है। संस्कृति के अनंत प्रवाह के साथ आये सारे बदलाव को पप्पू की दूकान एक दृष्टा की भाँति अपने भीतर जब्ज करती है और जीवन की गहमागहमी का केंद्र भी बनती है। इस गहमागहमी को लक्षित करते हुए काशीनाथ सिंह लिखते है- ‘‘कोलाहल और ठहाके अंदर भी, बाहर भी, बहस और नोंक-झोंक अंदर भी बाहर भी। सरकार गिर रही हैं, बन रही है अन्दर भी, बाहर भी, हार रहा है, जीत रहा है- अंदर भी, बाहर भी।3 अंदर और बाहर के इस एकात्म यथार्थ को आम आदमी के तमाम खदबदाते सवालों में देखा जा सकता है। समय की कथा को पप्पू की दूकान से इस तरह कहा जाता है कि वह पप्पू की दूकान न होकर पूरा देश बन जाता है। यह कथा स्थानीयता से निकलकर चिर-वजनीन व सार्वकालिक बन जाती है। यही कहानी के सच का वास्तविक प्रकटीकरण है। कथा के भीतर और बाहर समय अपने दहाड़ते पंजों के साथ खड़ा है। तीसरे अध्याय ‘संतों-असन्तों और घोंघा बसन्तों की अस्सी’ में सबके लिए अपना-अपना संसार है। सन्तों और असन्तों के साथ अपनी ही खोल में दुबके लोगों के बीच जिन्दगी और दुनिया चलती है। असंत लोग इस दुनिया को जितना कठिन बनाते हैं उन्हीं के बीच खड़ा संत मुस्कुराता रहता है। यहाँ संत का मुस्कुराना दुनिया के खड़े होने का प्रतीक है। सारी राजनीति जहाँ हमारी दुनिया को दिन-प्रतिदिन कठिन और सिद्धान्तहीन बनाती जा रही है वहीं संत की भी राजनीति होती है जो इस दुनिया को बनाने का संघर्ष करती है। आज किस कदर राजनीति गिर गई है कि नेता को भीड़ जुटानी पड़ती है जबकि एक जमाना था कि नेता के पीछे-पीछे भीड़ चलती थी। इसी जमाने की कहानी काशी के अस्सी में चलती रहती है। संसार के बनने-बिगड़ने की कथा है। मनुष्य के जन्म के साथ ही उसका चौराहा उसकी कहानियों का दृष्टा रहा है। यह चौराहा कभी अस्सी बनता है तो कभी किसी देश का चौराहा, यहाँ से आम आदमी की धड़कने जन्म लेती हैं, और उसी में देश की किस्मत छुपी हुई है। दरअसल मानवीय संस्कृति के विरूपित होते जाने का लक्षण है। केवल बनारस नहीं मर रहा है, नाम नहीं मर रहा है, नाम के साथ हमारी आस्था, हमारी संस्कृति, हमारे जीवन पर चोट हो रही है, इस चोट से आहत आम आदमी के दर्द का यह बयान है। चौथे अध्याय ‘पांडे कौन कुमति तोहे लागि’- जैसे-जैसे चौराहे की कथा आगे बढ़ती है। वैसे-वैसे अपनी जद में समय व संस्कृति को घेरते हुए अपने रूप से विरूप बना रही है। काशी के पंडित धीरे-धीरे बदल रहे हैं। ज्ञान का गठजोड़ बाजार के साथ इस कदर उलझ गया है कि सबके सब बाजार और जाल में उलझ गए हैं। क्या करें बिचारा आम आदमी, कैसे बचाएँ अपने आपको? बाजार की लपलपाती जीभ से अपने को बचाने का जतन करते हुए एक न एक दिन पूरा समय, पूरा समाज, बाजार की गिरफ्त में आ जाता है। आचार्य धर्मनाथ शास्त्री शिवजी के सपने में आने की कथा गढ़ते नजर आते हैं। पाँचवे अध्याय ‘कौन ठगवा नगरिया लूटल हो’ यह शीर्षक मात्र शीर्षक नहीं है और न ही समय का चौंकाने वाला कथन बल्कि आम आदमी की टीस से निकला हाहाकार है। आज बाजार न केवल हमारे गाँव, घर और शहर को लूट रहा है बल्कि पूरे देश पर बाजार की शक्तियाँ हावी हैं। इस बाजार की गिरफ्त में आम आदमी छटपटा रहा है। कथावस्तु के माध्यम से लेखक बहुत सारे सवाल उठाता है। लेखक के साथ चौराहा भी सवाल दर सवाल उठाता है। केवल मस्ती के भरोसे अपने समय, अपने देश, अपने नगर का विकास नहीं किया जा सकता बल्कि इसके ऊपर उठकर कर्म उद्योग से विकास किया जा सकता है। राष्ट्र को आगे बढ़ाया जा सकता है। काशीनाथ जी का कथावस्तु के तरीके में बदलाव कर उसका उपयोग ही इस रचना को एक उपलब्धि के रूप में पहचान दिलाता है और यहाँ हम उपन्यासों की कथावस्तु में हो रहे शिल्पगत बदलाव की पहचान कर सकते हैं। इसी को स्पष्ट करने के लिए पुष्पपाल सिंह लिखते हैं- ‘‘तथ्य और सत्य को जस का तस धर दिया है, अपनी पूरी संलग्नता और चिन्ता के साथ’’4

मनीषा कुलश्रेष्ठ का उपन्यास ‘शिगाफ’ भी नवीन कथ्य एवम् शिल्प के साथ प्रस्तुत किया गया है। यह भी एक तरह से कई छोटी-छोटी कहानियों का कोलाज है। स्पेन में अमिता के जीवन में पहले प्यार की तरह इयान बांड का आना है। उपन्यास में तीन और कहानियाँ हैं, ये है नसीम, यास्मीन और जुलेखा की कहानियाँ। दिल्ली की सेल्स गर्ल नसीम की यह बात पाठक को अन्दर तक झकझोर देती है कि ‘‘हाल’’ तो यह है कि कमाऊ आदमी कश्मीर में आजकल सात औरतों पर एक आता है।’’5 और इसी कारण नसीम कश्मीर से दिल्ली आ जाती है। जहाँ वह अपने लिए पति व बेटे के लिए बाप ढूँढते हुए एक अधेड़ शादी शुदा आदमी की दूसरी पत्नी बन जाती है। पत्नी बनती जरूर है लेकिन हैसियत में यह सेल्सगर्ल ही ज्यादा है। यास्मीन, बहुसांस्कृतिक विरासत को प्यार करने वाले, प्रयोगवादी, अमनपसंद टीचर रहमान की बेटी है। संस्कार में वह पूर्णतया पिता की ही अनुकृति है। वसीम से प्रेम करने और उसके बीज को धारण करने के बावजूद वह वसीम की पोलिटिक्स को एकदम नकार देती है। यास्मीन की व्यथा और उसकी मौत तो अलगाववादी नेता वसीम की सोच को ही बदल देती है। इस उपन्यास में यास्मीन दरअसल अमिता के व्यक्तित्व का, उसके चरित्र का ही एक पहलू है, जिसे हम अमिता की रचनात्मक अभिव्यक्ति कह सकते है। तीसरी कहानी जुलेखा की प्रेमकथा है- यास्मीन के प्रेम में वसीम को बदलने का सामर्थ्य है तो जुलेखा प्रेम में सब कुछ यहाँ तक खुद को भी भुला बैठने का प्रतीक। वह आसिफ के प्रेम में जेहाद और वफा के लिए सदियों की नींद में गुम हो जाने की ख्वाहिश रखती है और पहली फिदायिन का रूतबा हासिल करती है। अपनों के सुकुन के लिए खुद को खत्म कर डालती है क्यांकि माँ को जुलेखा का किसी पाकिस्तानी से निकाह मंजूर नहीं।

यह उपन्यास भी सच और गल्प का अद्भुत संगम माना जा सकता है क्योंकि उपन्यास में दी गई तारीखें वास्तविक घटनाओं के घटे होने की तारीखे भी हैं। ब्लॉग, डायरी, बहस, आत्मालाप तथा वर्णनां-विवरणों से निर्मित इस उपन्यास में रोचकता आ गई है। ‘शिगाफ’ की शुरुआत कश्मीर से भगाए हिन्दुओं के घर से बेघर कर दिए जाने के दर्द से होती है। पर यास्मीन, जुलेखा, नसीम, सुल्तान और जमान की कथाओं के माध्यम से पूरे के पूरे कश्मीरी अवाम के विस्थापन की पीड़ा को अभिव्यक्त करता है। इस उपन्यास की वर्णन-पद्धति, भाषा-शैली सभी के शिल्प में बदलाव हमें दिखाई देता है। इस उपन्यास की भाषा पर संजीव लिखते हैं- ‘‘मनीषा की काव्यात्मक-बिम्बात्मक भाषा इतनी नफीस है कि दाद देने का जी चाहता है।6 राजू शर्मा का उपन्यास ‘हलफनामे’ भी अपने कथाविधान के आधार पर शिल्प में बदलाव की पहचान कराता है। उपन्यासों में केवल शिल्प के स्तर पर ही नहीं उनकी कथाभूमि में भी पर्याप्त परिवर्तन आए हैं। उपन्यास की मूल कथा के बीच अवान्तर कथाओं के आवागमन से कथाओं की भंगिमा भी बदती रहती हैं। कथा कभी सांकेतिक हो जाती है, कभी वर्णानात्मक तो कभी अन्तर्पाठीयता करने लगती है। प्रभात रंजन लिखते हैं- ‘‘उपन्यास में भले मकईराम और उसके पिता स्वमीराम की कथा ऊपरी तौर पर प्रतीत होती है, पर वास्तव में यह उपन्यास कोई उनके जीवन संघर्ष की महागाथा नहीं है। इस उपन्यास में लेखक ने महानगरीय विकास की दौड़ में- मॉल और मल्टीप्लेक्स संस्कृति के दौर में समाज के अंधेरे कोने को देखने-परखने का प्रयास किया है। ‘हलफनामे’ वास्तव मेंं अपने समय का ऐसा साक्ष्य है जिसका रूप विधान भी अलग प्रकार का है।’’7

भाषा-शैली एवम् संवाद शिल्प में बदलाव उपन्यासों की संवाद योजना से भी इनके बदलते हुए शिल्प की पहचान हम कर सकते हैं। काशीनाथ सिंह के उपन्यास काशी का अस्सी के फ्लेप पर लिखा है कि, ‘‘उपन्यास की भाषा उनकी जान है- भदेसपन और व्यंग्य विनोद में सराबोर। काशी का अस्सी के पहले अध्याय ‘देख तमाशा लकड़ी का’ में पप्पू की दुकान की घटना का चित्रण, ‘‘जहाँ कलाकारों, चित्रकारों, पत्रकारों, नेताओं और नागरिकों की दैनिक (अर्थात दिन की) की छावनी है। अक्टूबर के दिन 1 सुबह के नौ बज रहे थे।

दुकान ग्राहकों से भरी हुई थी कुछ लोग खाली होने के इंतजार में गिलास लिये खड़े थे। शोर-शराबा काफी था, मगर बातें एक मुद्दे पर नही टिकी थी।- कभी मंडल, कभी खरमंडल (मंदिर-मस्जिद), कभी बंडल-शटल की तरह आ-जा रहे थे। कुछ लोग सुबह का अखबार देख रहे थे, कुछ पढ़ रहे थे, कुछ चाट रहे थे! बीच-बीच में बच्चे की बेंच से हरिद्वार या रायसाहब इस दुकान में खड़े किसी पत्रकार को आवाज देते जो रात की ड्यूटी से लौटा था।

तन्नी गुरु अस्सी के युनिफार्म में दड़बे के एक छोर पर बैठे थे और दूसरे छोर पर अपने चेले के साथ कोई तानसेन रियाज कर रहा था। रियाज क्या, किसी राग का धीमें सुरों में आलाप ले रहा था और चेला अपने झबरे वालों वाले सिर से ठेका दे रहा था।
‘‘तन्नी गुरु। जरा बोलना तो, यह कौन राग है?’’
गुरु को आवाज देकर वह चालु हुआ- आऽऽऽ, तूम तन न न न तूम! आऽऽऽ...........
‘‘दैनिक जागरण’ से लौटे तुलसीदास रात में ‘टेलीप्रिंटर’ पर आई किसी ‘न्यूज’ का खुलासा कर रहे थे- चूल्हे की बगल में बैठे पत्थर की बेंच से!
‘‘गुरु सुन नहीं रहे हो, ध्यान दो! देखो बिलम्बित में- आऽऽऽ......’’ ‘‘कमंडल मंडल पर भारी पड़ रहा है।’’ ‘आज’ के संवाददाता बद्री बोले। उनके समर्थन में कहीं से आवाज आई- ‘‘आरक्षण का सारा मामला 8.5 करोड़ लोगों में से सिर्फ चालीस हजार लोगों की नौकरी का है।’’ ‘‘अरे चुप रहो, तुम क्या बात करोगे? रात-भर रीवां कोठी में जुआ खेलते रहे और यहाँ बहस करने चले हो?’’
रायसाहब बोले- ‘‘जुआ न होता तो गीता न आई होती!’’
इसी बीच बद्री के जोड़ीदार ‘भारत का कला भवन’ में काम करने वाले राजेन्द्र ने प्रवेश किया- ‘‘बद्री, तुम पहले झुनझुनवाला-पुनपुनवाला के अखबार में नौकरी करना बंद करो, फिर बोलो।’’
‘‘देखों! मेरे मालिक के बारे में कुछ न बोलो!’’
‘‘देख बदिरिया, हम-तुम दीवाली को रात-भर रीवाँ कोठी में जुआ खेलते रहे, उस बीच दो बार बिजली गई और साले, दूसरे दिन अखबार में निकलवा दिया कि बनारस की दीवाली अबकी अँधरें में मनी। यही नैतिकता है तुम्हारी? राय साहब बोलते-बोलते खड़े हो गए।8

इस पूरे प्रसंग से यह पता चलता है कि लेखक ने आम बोलचाल की भाषा को ही उपन्यास में जगह दी है। उस पर अनावश्यक लीपा-पोती का प्रयास नहीं किया है। संवाद भी छोटे व यथार्थ के बिल्कुल नजदीक हैं। पात्र आपस में जैसे बात कर रहे हैं उसे ही उकेरा गया है। यहाँ हमें शिल्प में बदलाव नजर आता है। दूसरा ऐसा ही बदलाव हमें मनीषा कुलश्रेष्ठ के ‘शिगाफ’ में मिलता है। जहाँ मनीषा के उपन्यास की नायिका ‘अमिता’ अपने भाई ‘अश्वत्थ’ से ऑनलाइन बात करती है-
‘‘6 जनवरी, 2005
अश्वत्थ से बात करने के लिए इस बार मुझे बहुत दिन ऑनलाइन इन्तजार करना पड़ा।
‘‘तू कश्मीर कब हो आया?’’
‘‘पिछले महीने जम्मू तक गया था। मन नहीं माना, खतरे उठाकर आगे चला ही गया।’’
‘‘सुना,
 हालात सुधरे हैं।’’
‘‘हाँ, थोडे-थोडे़। बाहर से। भीतर वही सब है।’’
‘‘मैं जाना चाहती हूँ।’’
‘‘जा न। इन्तजाम है।’’
‘‘हाँ, पापा बता रहे थे कि राज जीजा है न, उनका छोटा भाई शांतनु आर्मी में जो था........ ओ आजकल वहाँ पोस्टेड है।’’
‘‘फिर तूने देख लिया कश्मीर।’’
‘‘क्यों?’’
‘‘फिर तू जो लिखेगी वो फौजी नजरिए से लिखेगी।’’
‘‘फिर........?’’
‘‘तू पहले इंडिया आ जा...... श्रीनगर में मेरा एक दोस्त है। वह एक न्यूज चैनल का रिपोर्टर है। जब जाना हो, बताना।
‘‘कौन?’’
‘‘वजीर.......।’’
‘‘मुसलमान है।’’
‘‘............तो? अपना कश्मीरी यार है, बचपन में मेरे स्कूल में था। दिल्ली में वो मुझे एक टेलीफिल्म की शूटिंग में मिला था।’’
‘‘तुझे उस पर यकीन है?’’
‘‘जितना तुझे मुझ पर। मैं उसी के घर ठहरा था।’’
‘‘ये बता, तू वहाँ क्या करने गया था?’’
‘‘उसने बुलाया था। जम्मू में उसकी कश्मीरी सेब पर बनी डॉक्यूमेंटरी फिल्म का प्रीमियर था। उसने मुझे जो ई-मेल किया था उसमें लिखा कि मैं चाहता हूँ तू खुद आकर आँखों से देखे कि तुम्हें जड़ों से उखाड़कर हम कितना जमा सके हैं।’’
‘‘अजीब पागल है।9

‘शिगाफ’ में ऑनलाइन संवाद जो प्रस्तुत किया गया है, यह संवाद प्रस्तुतीकरण का तरीका नया है। पहले उपन्यासों में ऐसा नही होता था। तकनीक के विस्तार के साथ-साथ उपन्यासों मे ंपात्रों के माध्यम से कहने की तकनीक में जो अंतर आया है, उसे हम ‘शिगाफ’ में देख सकते है। इस आधार पर हम कह सकते हैं कि उपन्यासों में शिल्पगत बदलाव हो रहे है और ये बदलाव कथ्य के स्तर पर भी है। शिल्प के स्तर पर भी हैं।

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संदर्भ 
1.    नामवर सिंह : कथा कोलाज है काशी का अस्सी, बनास-2, (उदयपुर), 2009, पृ.101
2.    काशीनाथ सिंहः काशी का अस्सी, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पेपरबैक संस्करण 2008, पृ. 38
3.    वही, पृ. 52
4.    पुष्पपाल सिंह : हिंदी गद्य इधर की उपलब्धियाँ, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2004, पृ.27
5.    शिगाफ, पृ. 76
6.    संजीव : नई पीढ़ी के पाँच उपन्यास, अन्यथा-16, (लुधियाना), जून 2011, पृ. 42
7.    प्रभात रंजन : यथार्थ का नया औपन्यासिक पाठ, तद्भव-15 लखनऊ, जनवरी, 2007, पृ. 210
8.    काशी का अस्सी, पृ. 20-21
9.    शिगाफ, पृ. 58-59

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डॉ. ललित श्रीमाली,  एम.ए. (हिंदी, राजस्थानी, शिक्षा) पीएच.डी. (हिंदी), 

व्याख्याता(हिंदी शिक्षण), लोकमान्य तिलक शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय(सी.टी.ई.) जनार्दन राय नागर राजस्थान विद्यापीठ (डीम्ड) विश्वविद्यालय, उदयपुर (राज.)

प्रकाशन ः  भूमण्डलीकरण और हिंदी उपन्यास (2014), विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कथा समीक्षा सम्बन्धी लेख प्रकाशित, 

अनुभव ः विगत 16 वर्षों से अध्यापन

संपर्क: lalitshrimali2014@gmail.com

 

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