हिंदी कहानियों में हिंग्लिश

जनसंचार एवं यातायात के माध्‍यमों के विकास ने पूरे विश्‍व को एक गाँव की तरह करीब ला दिया है। आज मनुष्‍य किसी गाँव या देश की सीमा में आबद्ध नहीं है. कोई भी कहीं भी जा सकता है, रह सकता है और यह सब बहुत ही सहजता एवं सरलता से संभव हो रहा है. गाँव का युवा गाँव से सीधा शहरों में, शहर से नगर-महानगर में और फिर अन्यत्र देश-महादेश की यत्रा पर पढाई के लिए या नौकरी-चाकरी के लिए निकलता है और कई बार बाहर ही अपना आशियाना भी बसा लेता है. इस क्रम में जब वह लेखन शुरू करता है तो उनकी भाषा एक सी न रहकर जीवन व्यवहार में आई भाषाओं के सन्योग से मिश्रित हो जाती है. गाँव में जिन देसज शब्दों का प्रयोग होता है उनमें इंग्लिश के शब्दों के मिल जाने से एक अभिनव भाषा बन जाती है, हिंग्लिश. गाँव में बहुत से अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग किया जाता है जैसे- पोस्ट ऑफिस, बसस्टाप, स्टेशन, स्कूल, टीचर, लोकल, पेस्ट, टुथब्रश, मेडिकल आदि शब्दों का प्रयोग गाँव वाले खूब करते हैं. कुछ अंग्रेजी शब्दों को गाँव वाले नहीं समझते हैं जैसे- इंटेलेक्चुअल, पर गाँव की कहानी लिखने में उसका प्रयोग हो रहा है. उदारीकरण के बाद एक खास तरह का समाज विकसित हुआ है जिसे हम मध्य-वर्ग के नाम से जानते हैं. खास कर हिंदी कहानियों में हिंग्लिश का प्रयोग जो कहानीकार कर रहे हैं वह एक खास पाठक वर्ग को ध्यान में रख कर रहे हैं. जिन हिंदी कहानियों में हिंग्लिश का प्रयोग हो रहा है वह आम पाठक के लिए नहीं होतीं हैं.

कथाकार डॉ. अब्दुल बिस्मिल्लाह कहते हैं कि “हम जो कुछ भी लिखते हैं वह पाठक के लिए लिखते हैं पाठक का मतलब अपढ से लेकर विद्वान तक.” इस प्रकार आज जो कुछ लिखा जा रहा  है वह पाठक को ध्यान में रख कर लिखा जा रहा  है क्या? आज हिंदी कहानियों में हिंग्लिश के प्रयोग के पीछे मूल कारण पाठक नहीं, व्यक्ति का भाषिक व्यवहार और आचरण है. यही वजह है कि आज हिंदी कहानियों में वह महानगरीय जीवन की कथा अधिक देखने को मिलती है, तो बनावटीपन भी कम नहीं.

जानी मानी साहित्यिक पत्रिका “बया” के अक्टूबर-दिसंबर २०१३ अंक में प्रकाशित कहानी “बर्फ़” जो दूसरे देश की भाव-भूमि पर घटित प्रेम कहानी है उसमें हिंग्लिश शब्दों का बहुत सटिक प्रयोग किया गया है, जैसे- वह प्रोफेसनल फोटोग्राफर है जो बड़ी विज्ञापन एजेंसियों, मीडिया घरानों और मोशन पिक्चर कंपनियों के लिए कांट्रेक्ट पर काम करता है और शहर यह उसका अपना शहर है. इस प्रकार इस कहानी में बहुत सारे हिंग्लिश के शब्द हैं, जो अनायास ही आते इन शब्दों का बाकायदा प्रयोग जीवन में भी होता है. दूसरी कहानी है, “चूड़े वाली भाभी” यह कहानी दहेज हत्या पर लिखी गई है. इसमें भी हिंग्लिश शब्दों का प्रयोग किया गया है जैसे- एप्लीकेशन, अपार्टमेंट, हालीडे होमवर्क, अनप्रेक्टिकल, सनग्लासेज, आदि बहुत सारे शब्दों का प्रयोग देखने को मिलता है. इन दोनों कहानियों के रचनाकारों की पारिवारिक पृष्ठभूमि गाँव से हैं पर यह आज कस्बाई व शहरी मध्यवर्ग से संबंध रखने वाले हैं. साथ ही इन दोनों कहानियों का विषय जो लिया गया है वह शहरी परिवेश का है. इनकी भाषा मिश्रित भाषा है.

इस तरह हम पाते हैं कि भाषायी घाल मेल का मूल कारण भाषायी सम्पर्क है. विभिन्न भाषायी समाज के लोग एक साथ रहते रहते एक दूसरे से लगातार भाषाई व्यवहार करते-करते एक दूसरे की भाषा समझने लगते हैं. यही करण है कि एक भाषा के शब्द दूसरी भाषा से घुल मिल जाते हैं . लेकिन जब दो अलग-अलग भाषा के लोगों में संवाद होता है तो यह भाषा तीसरे व्यक्ति के लिए अंजान होती है, ठीक उसी प्रकार कहानियों में भी देखने को मिल रहा है. हिंग्लिश शब्दों के प्रयोग बढ़ाने से साहित्य उस समाज से कट रहा है जिसके लिए कभी कहानियां लिखी जाती थी. यही कारण है कि आज शहरी मध्यवर्ग के इर्दगिर्द ये कहानियां घूमती रहती हैं. ये कहानियां उस समाज के सरोकार से कट रही हैं जिस समाज की बातें होनी चाहिए, वह हासिए पर चला गया है. यही कारण है कि सेक्स और रोमांस कि कहानियाँ या स्त्री यौन उत्पीडन की कहानियां अधिक पढ़ने को मिल रही हैं. कहानियों में हिंग्लिश का प्रयोग बढ़ाने से समाज का एक बड़ा हिस्सा साहित्य से कट रहा है. आज पाठक तो है पर कंटेंट में गंभीरता की  कमी है और यह कमी अब शाजिशन भी बढती जा रही है. हिन्दी को हिंग्लिश बनाने की कोशिश अब मल्टिनेशनल कम्पनियाँ और बाज़ार की तरफ से हो रही है और यह कहीं न कहीं जन से भाषा को काटने और उसे छिन्नमूल करने की कोशिश है.

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सुभाष कुमार गौतम, शोध-छात्र

हिंदी विभाग, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली

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