क्या कविता का अंत हो रहा है?

कविता पर पिछले दिनों हुई बहसों में दबी-छिपी रह गयी कुछ टिप्पणियों में यह टिप्पणी भी शामिल रही है कि कविताएं आजकल पढ़ता ही कौन है। यह ऐसी टिप्पणी नहीं है जिसे आप चलताऊ कहकर नकार दें। यह कविता के भविष्य से जुड़ी हुई टिप्पणी है। और इसे हिंदी के किसी वरिष्ठ कवि का बयान नहीं बचा सकता है कि यूरोप में भले ही कविता की मृत्यु की घोषणा कर दी गयी है, लेकिन भारत में कविता आज भी बहुत प्रभावी विधा है। मेरे पास इन बयानों पर खुश होने का कोई ठोस कारण नहीं मौजूद है। मेरा निजी अनुभव यही है कि कविता आज के दौर में सबसे बुरे वक्त से गुजर रही है। इसके बहुत सारे कारण हो सकते हैं। हो सकता है कि हिंदी कविता कहने से इसमें अलग ही तरह की स्थितियां जुड़ जाएं। मैं अपने पड़ोसी के पड़ोसी की अलमारियां झांकता हूं और पाता हूं कि वहां कोई कविता की किताब नहीं रखी है। इसी तरह आप भी अपने पड़ोसियों के यहां देख सकते हैं। तो क्या कविता लोगों को बहुत प्रभावित नहीं कर पा रही है? ऐसा है। अगर आपने गौर किया हो तो एक वक्त था कि ऐसी लोगों की तादाद ज्यादा थी जब लोग एक दूसरे को नैतिक सीख, सादगी से भरे जीवन, दया, परोपकार और मनुष्यता के वृहत्तर संदर्भों के लिए भी बात-बात में कबीर का उद्धरण दे देते थे। रहीम, रसखान,सूर, तुलसीदास, मीराबाई बहुत सारी बातों के दौरान मौजूद रहते थे। लोग बात-बात पर न सिर्फ दोहा, चौपाई बल्कि कहानियां भी सुनाने लग जाते थे। वह पंचतंत्र से लेकर शेखचिल्ली तक की कहानियां हो सकती थीं। लोग बहुत ठसक से कहते मिलते थे कि इस पर एक मिसाल यह है। इधर के बरसों में हमारी बात-चीत में यह सब कम होता गया है। नयी पीढ़ी के लोगों से इनका अपरिचय बढ़ा है। और हिंदी की समकालीन कविता का कोई बड़ा से बड़ा कवि तो लंबे समय से मौजूद ही नहीं है। वह छापेखाने , लाइब्रेरी और अपने क्लबों के भीतर सीमित है। बावजूद उसे जनकवि कहलवाने की इच्छा से भला कौन रोक सकता है। दिन भर कविता की संस्कृति का निर्माण करने वाला कवि शायद ही जनपदों, कस्बों, गांवों की ओर कभी रुख करता हो। समकालीन कविता को विश्वविद्यालयों के चंद परिसर, कुछ गिने-चुने शहरों, वातानुकूलित ऑडिटोरियम, सरकारी कला केन्द्र और अभिजात्य नहीं बचा सकते हैं। बल्कि मेरा एक मित्र इसे और मजेदार तरीके से कहता है कि अगर ऐसे किसी विषय को सदा के लिए खत्म करना हो तो उसे भारतीय विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम का हिस्सा बना देना चाहिए, उसका अंत सुनिश्चित है।

वाशिंग्टन पोस्ट में अमेरिका में कविता के अस्तित्व को लेकर बहुत रोचक लेख प्रकाशित हुआ। इस लेख की शुरूआत यूं होती है- क्या कविता का अंत हो रहा है? यह अंत की ओर कैसे है? कविता को किसने मारा? क्या इसकी किसी को परवाह भी है? क्या कविता का अंत हो चुका है? क्या कविता का अंत हो चुका है? क्या कविता का अंत हो चुका है?

अमेरिका में इसे लेकर सर्वे ऑफ पब्लिक पार्टीसिपेसन इन द ऑर्टस (SPPA) ने आंकड़ा जुटाया। इससे पता चला कि 1992 में 17 प्रतिशत अमेरिकन ने कम से कम साल में एक बार कोई न कोई कविता पढ़ी है। लेकिन 20 साल बाद यह प्रतिशत घटकर 6.7 पर आ गया। और कविता की लोकप्रियता में यह गिरावट कला की किसी भी दूसरी विधा से कहीं ज्यादा है। जैज़, नृत्य और अन्य विधाएं बेहतर स्थिति में हैं। कविता लोकप्रियता में गिरावट के मामले में सिर्फ ओपेरा को टक्कर दे पा रही है। इससे इंकार नहीं कि कला आंकड़ों का खेल नहीं है। पर यह भी सही है कि लोग कविताएं नहीं पढ़ना चाहते। अपने यहां इंटरनेट पर इसके लिए बहुत तरह के प्रयास हैं लेकिन यह बहुत स्पष्ट नहीं है कि इसने कविता के नए पाठक कितने तैयार किए। क्या इससे कविता की किताबों की खरीद पर भी कोई फर्क पड़ा। पर लगता नहीं है इससे कविता की सिकुड़ती दुनिया पर वास्तव में कोई फर्क पड़ा है। न उसे पुरस्कार बचा पा रहे हैं, न इंटरनेट पर मुफ्त में उपलब्ध किताबें। टेलीविजन की भूमिका बहुत पहले संदिग्ध हो चुकी है और इस पर ज्यादातर पीढ़ियों पुरानी रिकार्डिंग चलती रहती हैं। शायद ही किसी नए कवि का पाठ और उस पर बात-चीत होती हो। यह पूरा स्पेस बहुत ही अलोकतांत्रिक, पवित्र किस्म का है और इस पर सिर्फ महापुरुषों का पाठ होता है। साहित्यिक पत्रिकाएं अपनी किसी तरह की भूमिका जरूर निभा रही हैं और वे कई बार अधिक लोकतांत्रिक भी लगती हैं। उसमें अलग-अलग आवाजें भी हैं लेकिन वे खुद सीमित संसाधनों पर निर्भर हैं। मुझे नहीं पता कि क्या-क्या किया जाना चाहिए। लेकिन तकनीक एक जरिया हो सकता है। और अभी इसे बहुत गंभीरता से इस्तेमाल नहीं किया गया है। हम इसे बहुत सारे लोग के योगदान के जरिए किसी स्वतंत्र परियोजना की तरह चला सकते हैं। इंटरनेट का माध्यम ऐसा है कि यहां किसी की हेकड़ी नहीं चलती लेकिन यह अभी सुविचारित तरीके से इस्तेमाल नहीं किया गया। इंटरनेट पर टेक्स्ट तो फिर भी मौजूद है लेकिन इंटरनेट पर बहुत सारे कवियों के न आडियो-वीडियो हैं, न साक्षात्कार हैं। अक्सर पाता हूं कि कुछ छोटे-छोटे आयोजनों की तस्वीरें वगैरह लोग लगाते हैं लेकिन कभी उनके वीडियो, आडियो वगैरह शेयर नहीं किए जाते। यह एक तरह से इस माध्यम पर हमारी मौजूदगी के बाद भी इसकी विशिष्टताओं के प्रति उपेक्षा है। जबकि हम अब टेक्स्ट से अधिक समय अब आडियो विजुअल माध्यमों से जुड़ रहे हैं। कविता, कहानियों और दूसरी तमाम विधाओं में सक्रिय लोगों को इसे बेहतर तरीके से इस्तेमाल करना चाहिए। फौरी तौर पर इसे पत्रिकाओं की लंबी, ऊब भरी, बोगस कविता समीक्षाओं, आलोचना, पुरस्कार, सीमित परिसर, पारंपरिक आयोजनों पर निर्भरता से मुक्त कर इसे नयी जरूरतों के हिसाब से नए माध्यमों में ढालने की जरूरत है।

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