जाति का सच

साहित्य, सिनेमा और कला समाज का ही प्रतिबिम्ब है. साहित्य हो या सिनेमा समय-समय पर सामाजिक मुद्दों को किसी न किसी रूप में उठाता रहा है. उदाहरण के लिए गोविन्द निहलानी की फिल्म तमस जिसमें उन्होंने साम्प्रदायिकता और विभाजन के दंश का मार्मिक चित्रण किया हैं यह फिल्म साहित्यकार भीष्म शाहनी के उपन्यास तमस पर बनी है, जातिवाद के मुद्दे पर बनी प्रकाश झा की फिल्म दामूल अद्भुत है. जातिगत मुद्दो पर जब बहस की जाती है तो जेहन मे एक ही बात आती है कि यह सब ढकोसले है लोगो को बहलाने के. दरअसल यह तो समाज के कुछ शोषक वर्गो दवारा अपनी सुविधा के लिए बनाये गये लोगो का समूह थी जो उनके धन की खपत के लिए कार्य करने को मजबूर थे ।

प्रकाश झा की फिल्म आरक्षण ने आरक्षण से जुड़े कई पहलुओं को उजागर किया. हालांकि इस मुद्दे को लेकर समाज में आज भी द्वन्द की स्थिति है. समय चाहे कोई भी हो आदिकाल का या आधुनिक युग का इतिहास गवाह है कि राजाओ के महलों मे काम करने वाले कैसे धीरे धीरे अपने काम के कारण विशेष समूह मे बदलने लगे थे जैसे पंडित, किसान कुम्हार, नाई, धोबी, चमार और न जाने कितने ही अनगिनत समूहो में समाज ने खुद को बाँट लिया था जिसका मुख्य कारण धनोपार्जन ही रहा होगा।

आज के युग मे जब ये समूह मंहगाई की मार से खस्ताहाल जीवन जीने को मजबूर हो गए है तो सरकारी नीतियों और नौकरियों की तरफ रुख करने को मजबूर है ऐसे मे भी आरक्षण को लेकर होने वाली चर्चा भी गंभीर मुद्दा बनी हुई है समाज के ठेकेदार इस मुद्दे को आए दिन उछालते रहते है इनसे कोई ये क्यों नही पूछता कि इतने समर्थ और पूंजी के स्वामी होते हुए भी इन्हे किसी असमर्थ और निर्धन का हक मारने का अधिकार किसने दिया है और यदि ये नही तो शायद इनको ये डर सताने लगा है कि जो कभी इनके अधीन थे कहीं इनको अब उनके अधीन न होना पड़े क्योंकि जब वे बच्चे कुछ बन जाऐंगे तो उनके सामने अपने काम के लिए मनुहार करना शायद इन्हे गवारा न हो जिनके दादा-परदादा को ये कभी हुकुम सुनाया करते थे।

समस्या चाहे कोई भी हो साहित्य और सिनेमा के जरिये एक समझ विकसित होती हैं. बच्चों और युवा मन पर इसका प्रभाव सबसे ज्यादा पड़ता हैं, समाज के प्रति अपनी जवाबदेही और जिम्मेदारी से यह मुहं नहीं मोड़ सकता. यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी की साहित्य, सिनेमा और कला समाज का दर्पण है. 

(डॉ दीपमाला श्री गुरू नानक देव खालसा कॉलेज में हिंदी की सहायक प्रध्यापक हैं. इन्होने स्व. कथाकार कमलेश्वर  की कहानियों पर अपना शोध कार्य किया है.)

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