लेखक भूमण्डलीकरण को विषय बनाकर कथा-लेखन नहीं करता : आलोचक- विचारक प्रो. नवलकिशोर

(भूमंडलीकरण और समकालीन उपन्यास विषय पर वरिष्ठ आलोचक- विचारक प्रो. नवलकिशोर के साथ डॉ. ललित श्रीमाली का संवाद)

भूमंडलीकरण से क्या अभिप्राय है? और आप इसका प्रारम्भ कब से मानते है?
भूमंडलीकरण का सही शाब्दिक अर्थ लिया जाए और इसे मनुष्य की घूमन्तू प्रवृत्ति से जोड़ा जाए तो इसकी शुरुआत सभ्यता के प्रारम्भिक चरण से ही मानी जा सकती है। लेकिन आज यह शब्द (पद) विशेष राजनीतिक-आर्थिक संदर्भ में प्रयुक्त होता है और हमारे यहाँ इसका प्रयोग उदारीकरण की नई आर्थिक नीतियों के साथ ही होने लगा है। इसकी शुरुआत पिछली सदी के अंतिम चरण से मानी जा सकती है। भूमंडलीकरण का मतलब है मुक्त व्यापार अर्थात विकसित देशों से विकासशील और पिछड़े देशों में वस्तुओं का खुला आयात। भूमंडलीकरण के साथ जिस बाजारवाद की शुरुआत होती है उसका मतलब होता है- उपभोक्ता संस्कृति का प्रसार और इसके लिए विकासशील देशों और पिछड़े देशों में ऐसा अर्थतंत्र विकसित होता है जिससे बाजार में पूँजीवादी देशों की वस्तुएँ निर्बाध रूप से आने लगती हैं। इसे हमारे यहाँ एफ.डी.आई. के अनुमति विवाद से समझा जा सकता है।

भूमंडलीकरण और आर्थिक साम्राज्यवाद में क्या संबंध है?
भूमंडलीकरण का संबंध नव-उदारवाद की आर्थिक नीतियों से है और इन नीतियों का सीधा संबंध आर्थिक साम्राज्यवाद से है। आजादी के बाद एक समय था जब स्वदेशीयता और आत्मनिर्भरता पर जोर दिया जाता था। अब नई आर्थिक नीतियों में उसका आग्रह समाप्त हो गया है और हमारे देश की मंडियाँ पूँजीवादी देशों की वस्तुओं के लिए खुल गई हैं। आज संसार में राजनीतिक दृष्टि से लगभग सारे मुल्क आजाद हैं और उनकी अपनी सरकारें हैं। भौगोलिक उपनिवेशवाद का अन्त हो गया है, उसकी जगह एक नये उपनिवेशवाद ने ले ली है। विश्व की आर्थिक शक्तियाँ, जैसे कि विश्व बैंक आदि, जिन शर्तों पर कर्ज मुहैया कराते हैं उनके कारण गरीब देश न केवल कर्ज के लिए बल्कि जरूरी वस्तुओं तक के लिए और विशेषतः नई तकनीकों के लिए धनी देशों पर निर्भर होते जाते हैं, उनकी शर्तों को मानने को मजबूर होते हैं, उनका पैसा विकसित देशों की समृद्धि में योगदान करता है। खुद उन देशों में गरीबी के उन्मूलन के लिए जो प्रयास होते हैं वे दिखाने के ज्यादा और वास्तविक कम होते हैं, वहाँ गरीबी और बढ़ती जाती है इसीलिए इसे आर्थिक साम्राज्यवाद या नव-उपनिवेशवाद कहा गया है। इस उपनिवेशवाद का यह प्रभाव हुआ है कि इन तथाकथित नव-स्वाधीन देशों की जनता को वह खुशहाली कतई नसीब नहीं हुई जिसका आजादी के संघर्ष के दौरान उन्होंने सपना देखा था।

इसे अमेरिकी साम्राज्यवाद का विस्तार माना जाता है। क्या यह सही है?
विश्व की अर्थव्यवस्था पर क्योंकि अमेरिकी वर्चस्व स्थापित है इसलिए उसे ही सबसे बड़ा आर्थिक साम्राज्यवादी देश कहा जा सकता है। उसकी पूँजीवादी व्यवस्था के लक्ष्यों का हित साधन बहुराष्ट्रीय निगम करते हैं। मौके-बेमौके अमेरिकी सरकार उनकी मदद के लिए मौजूद रहती है। इराकी युद्ध का सीधा संबंध वहाँ की तेल सम्पदा पर अमेरिकी कब्जे से था, जिसके लिए इराकी जनता को बहुत भारी कीमत चुकानी पड़ी लाखों इराकी एक तरह से पूँजीवादी उपनिवेशवादी नरसंहार के ही शिकार हुए हैं।

क्या भूमंडलीकरण के कारण उपभोक्तावाद को बढ़ावा मिल रहा है?
भूमंडलीकरण के कारण उपभोक्तावाद को निश्चय ही बढ़ावा मिल रहा है। पूँजीवाद में उपभोक्ता वस्तुओं का अनियंत्रित उत्पादन होता है। उसके लिए बाजार का विस्तार होता है। बाजार के लिए भोगवृत्ति को प्रोत्साहित किया जाता है। भोगवृत्ति का प्रसार अपसंस्कृति के प्रसार से जुड़ा हुआ है। लोग अब बाजार में केवल जरूरी चीजों की खरीद के लिए नहीं जाते, वे उन चीजों के लिए जाते हैं जो चमकीली हैं और सुख का माया संसार रचती हैं। आज के उपभोक्ता के दिमाग में यह बैठा दिया गया है कि वस्तुओं को काम में लो और फेंको (यूज़ एंड थ्रो)- यही भौतिक सुख का एकमात्र आधार है। आप किसी मॉल में जाते हैं तो एक ऐन्द्रजालिक संसार में प्रवेश करते हैं। वहाँ एक-से-एक चमकीली वस्तु आपको आकर्षित करती है। अगर आप की जेब भरी है तो आप उसे खरीदते हैं। हो सकता है कि वह खरीदी चीज फिर चंद दिनों बाद ही आपके लिए उपयोगी न रहे। महिला-पत्रिकाओं में हम पढ़ते ही हैं कि धनी महिलाओं के लिए शॉपिंग एक क्रेज़ बन गया है।

रोटी, कपड़ा और मकान जैसी भौतिक जरूरतों की चिन्ता से मनुष्य की मुक्ति ज़रूरी है। लेकिन इसके आगे अनियंत्रित सुखवाद ने जिस गैर बराबरी की व्यवस्था को जन्म दिया है उसमें हम देखते हैं कि एक आदमी अपने आवास के लिए पाँच-सौ करोड़ का नया जादुई महल बनाता है और दूसरा आदमी श्रम करके भी नरक में रहने को मजबूर होता है। एक आदमी पंचसितारा होटल में अपने लंच-डिनर पर एक बार में हजारों रुपये खर्च करता है और दूसरे आदमी को एक वक्त के पेट भरने के लिए भी जी तोड़ स्वघाती मेहनत-मजदूरी करनी पड़ती है और तब भी उसे और उसके बाल-बच्चों को ऐसा भोजन तो कभी मिलता ही नहीं जिसे संतुलित आहार कहा जा सके। जहाँ हम टी.वी. सीरियलों में नित नई-नई डिजाइनदार वेशभूषाओं से सज्जित औरतों को देखते हैं वहीं गरीब बस्तियों में ऐसी बिचारियों की भारी तादाद है जिनकी ऐसे हालत यशपाल की कहानी ‘टाट का पर्दा’ की याद दिला देती है। नई आर्थिक नीति और उपभोक्तावाद का अनिवार्य परिणाम है- धनी और निर्धन के बीच अन्तर का लगातार बढ़ते जाना। विकसित देशों में जहाँ एक समय समझा जाता था कि उन्होंने कंगाली को हमेशा के लिए विदा कर दिया है और आम आदमी को भी बुनियादी जरूरतें मुहैया करा दी गई हैं वहाँ हमें हाल ही की मंदी के बाद कंगाली के लौटने के समाचार पढ़ने को मिलने लगे हैं। अमेरिका में तो इस पूँजीवादी पद्धति के खिलाफ ‘ओकुपाई बॉल स्ट्रीट’ नाम का आन्दोलन भी काफी दिनों चला था। हमारे यहाँ भी हमने देखा ही है कि हजारों किसानो ने आत्महत्या की है।

संचार क्रांति से भूमण्डलीकरण की प्रक्रिया पर क्या प्रभाव पड़ा है?
संचार क्रांति का सकारात्मक पहलू लिया जाए तो यह मानव संस्कृति के लिए बहुत ही उपकारक है। नये-से-नये ज्ञान और नई-से-नई तकनीकी क्रांति से हम तत्काल अवगत हो जाते हैं। संचार क्रांति का अगर मनुष्य कल्याण के लिए नियोजित उपयोग किया जाए तो दुनिया की जो शक्ल होगी वह आज की डरावनी काली तस्वीर की बजाय एक हरी और उजियाली तस्वीर होगी। लेकिन संचार के साधनों पर भी वर्चस्व पूँजीवादी देशों का विशेषतः अमेरिका का है और उनका उपयोग मनुष्य कल्याण के लिए कम और उनके आर्थिक हितों के लिए ज्यादा होता है। बहरहाल ज्ञान और तकनीक स्वयं में सत्ताएँ हैं। वे स्वयं में मुक्ति के माध्यम हैं और दुनिया भर की पीड़ित जनता उनका उपयोग धीरे-धीरे अपनी मुक्ति के लिए करने के उपाय सीख रही है और करने लगी है। इस बात को हम मिश्र में ‘तहरीर चौक’ से शुरु हुई मध्यपूर्वी ‘वसंत क्रांति’ से समझ सकते हैं। हमारे यहाँ ‘अन्ना आन्दोलन’ और ‘निर्भया प्रसंग’ में स्वतः आहूत जन प्रवाह को हमने देखा ही है।

इस संचार क्रांति के उपकरण अभी पूंजीवादी निगमों के पास है और उन पर उनकी सरकारों के प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष नियंत्रण से इन्कार नहीं किया जा सकता। समाचार है कि अमेरिकी गुप्तचर एजेन्सी के पास बहुत सारे देशों के लोगों से संबंधित मेटा डाटा मौजूद हैं। इस डाटा का प्रयोग लोगों के विरुद्ध ही नहीं अन्य देशों के विरुद्ध किया गया है और कभी भी किया जा सकता है। कोई भी फासीवादी सरकार इन संचार-उपकरणों से अपने नागरिकों की निजता और स्वतंत्रता का अपहरण कर सकती है लेकिन इस खतरे के बावजूद मनुष्य की प्रकृति में है कि वह इस तरह के नियन्त्रणों को लगातार चुनौती देता रहता है। इसके उदाहरण के रूप में हम विकिलीक्स के जूलियन असांजे के विलक्षण साहस को सामने रख सकते हैं जो आज भी अपनी सरकार से बचने के लिए इक्वाडोर के दूतावास में शरणार्थी बना हुआ है। अभी हाल का उदाहरण सी.आई.ए. के पूर्व कर्मचारी एडवर्ड स्नोडन का है। इन संचार उपकरणों से आशा की जानी चाहिए कि मनुष्य मुक्ति की दिशा में ही लगातार आगे बढ़ेगा।

भूमंडलीकरण का साहित्य पर क्या प्रभाव पड़ा है?
भूमंडलीकरण का प्रभाव विश्व समाज पर दूर तक पड़ा है। इसलिए साहित्य का उससे प्रभावित होना स्वाभाविक है। साहित्य-विशेषतः कथा साहित्य एक स्तर पर अपने समय का साक्षी भी होता है समयचक्र में इंसानी हालातों और ज़ज्बातों को वह दर्ज करता है। साहित्य पर उसके प्रभाव को हम किस तरह देखते हैं यह देखने वालों के नज़रिये पर बहुत कुछ निर्भर करता है। जैसे बाजार की माँग को पूरा करने वाले उपन्यास हैं जिन्हें हम लुगदी साहित्य की श्रेणी में रखते हैं, खूब बिकते हैं, हिंदी-आलोचना में एक ऐसा सम्प्रदाय भी इधर प्रकट हुआ है जो ऐसे बाजारू उपन्यासों को लोकप्रियता के नाम पर मान देना चाहता है और उनके जरिये हमारे समय के आदमी की लिप्साओं, इच्छाओं और जरूरतों का अध्ययन करने की वकालत करता है। इसका प्रभाव यह हुआ है कि जिन उपन्यासों को हम साहित्य की कसौटी पर कसते हैं और तब उनका महत्त्व-निर्धारण करते हैं तो उस महत्त्व-निर्धारण में उनकी बिक्री की संख्या भी एक घटक बनता जा रहा है। आज हर चीज बाजार की माँग पर निर्धारित होती जा रही है, लगता है कि थोड़े दिनों में किसी कथाकृति का अन्तिम महत्त्व भी उसके बाजार मूल्य से ही निर्धारित होगा। अभी तो हिंदी के किसी बहु विक्रेय उपन्यास का नाम लेना आसान नहीं होगा लेकिन हम अंग्रेजी के कथाकार चेतन भगत के उपन्यासों के उदाहरण से इसे समझ सकते हैं। जब बाजार साहित्य को प्रभावित करने लगता है तो लेखक की रचनात्मकता पर भी उसका प्रभाव पड़ता है। हिंदी अभी खुशकिस्मत है कि साहित्यिक दृष्टि से ‘पल्प लिटरेचर’ या तथाकथित ‘पॉपुलर लिटरेचर’ को उतनी अहमियत नहीं मिली है। हमारी अग्रपंक्ति का जो कथा लेखन है वह वास्तव में बाजारवाद के प्रतिरोध का ही साहित्य है।

भूमंडलीकरण की नीतियों ने चूँकि आम आदमी को विपन्न बनाया है और हमारी भाषा का अच्छा साहित्य आम आदमी का पक्षधर साहित्य है, इसलिए केवल कथा-साहित्य को ही नहीं बल्कि समग्र साहित्य को एक तरह से पूँजीवाद के प्रतिरोध का और अपसंस्कृति के प्रतिवाद का साहित्य कहा जा सकता है। पूँजीवाद समर्थक कितना ही कहें कि समाजवाद का अन्त हो गया है, हमारे साहित्य में हम उसे एक जीवन्त चिन्ताधारा के रूप में देखते हैं। मार्क्सवाद के नाम पर न किसी खास राजनीतिक दल की पक्षधरता आज हिंदी लेखकों में है और न पुरानी संकीर्ण वर्गवादी कट्टरता और न भविष्य का कोई संभव यूटोपिया। अधिकांश युवा-लेखकों में आम आदमी के प्रति गहरी सहानुभूति है क्योंकि वे भी ज्यादातर साधारण जनता के बीच से ही आते हैं। जिनमें राजनीतिक पक्षधरताएँ स्पष्ट दिखाई भी देती हैं उनमें भी खुलापन है और वे कट्टर मतवादी रूझान नहीं रखते। मार्क्सवाद के साथ वे अपने को गाँधी से भी नए सिरे से जोड़ते हैं। 

हिंदी की परंपरा भक्तिकाल से ही साम्प्रदायिकता से मुक्त रही है। हिंदी का राष्ट्रवादी लेखन साम्प्रदायिकता-विरोधी रहा और प्रगतिवादी-जनवादी लेखन तो अपनी अन्तः प्रकृति से ही गैर-साम्प्रदायिक रहा है। इसका मतलब यह नहीं है कि हिंदी लेखन में धार्मिक राष्ट्रवाद और साम्प्रदायिक सोच के स्वर नहीं हैं लेकिन कभी इतने प्रबल नहीं रहे कि हिंदी-लेखन की अग्र पंक्ति में जगह बना सकें। आज उसका खतरा जरूर है। भूमंडलीकरण की एक विडम्बना यह है कि एक तरफ नव विकासवादी विचारधारा है और दूसरी तरफ धार्मिक कट्टरतावादी विचारधारा एक बिन्दु पर जाकर ये दोनों एक दूसरे को बल देती हैं। इसका सबसे बड़ा कारण है- पूँजीवादी आर्थिक विचारधारा की मूल्यहीनता और चूंकि मनुष्य केवल एक सुखी पशु की तरह नहीं जी सकता, सिर्फ अपने लिए ही नहीं जी सकता दूसरे इंसानों के साथ प्रेम और भाईचारे की दुनिया में भी रहना चाहता है, एक बेहतर समाज बनाना चाहता है; इसीलिए उसे एक उच्चतर जीवन-दृष्टि की अपेक्षा भी होती है। उत्तर-पूंजीवाद ने मनुष्य से समतावादी जीवन-दृष्टियाँ छीन ली हैं और इसलिए जो शून्य उपजा है उसे धार्मिक अन्धवाद भर रहा है इस कारण आज दुनिया भर में बर्बरता का एक ऐसा संकट पैदा हो गया है जो प्रतिदिन आतंकवादी हमलों में बेकसूरों की जान ले रहा है। इसका गहरा विश्लेषण करेंगे तो पाएँगे कि इसका भी बहुत कुछ कारण पूँजीवादी नव-उपनिवेशवाद में ही है।

हिंदी उपन्यास पर भूमंडलीकरण के प्रभाव को आप किस तरह देखते हैं?
हिंदी-उपन्यास पर भूमंडलीकरण के प्रभाव को अलग से देखना असंगत है। समग्र साहित्य पर जो प्रभाव है उसी के अन्तर्गत उपन्यास भी आता है। उपन्यास में अपने समय का यथार्थ प्रत्यक्षतः अधिक प्रतिफलित होता है इसलिए हम हिंदी-उपन्यास और भूमंडलीकरण की अलग से चर्चा ज़रुर कर सकते हैं। इस प्रभाव को हम सीधे कारण-कार्य पद्धति से खोजना चाहें तो ऐसी खोज गलत होगी। लेखक भूमंडलीकरण को विषय बनाकर कथा-लेखन नहीं करता वह उसके कारण मानवीय स्थितियों में जो विक्षोभ उत्पन्न हुआ है और जीता जागता मनुष्य जो त्रास झेल रहा है उसी को लेकर रचना करता है। अपनी रचना में सीधे न वह आर्थिक कारणों को गिनाता है और न ही राजनीतिक कारणों को। ये कारण हैं तो भी इन्हें पृष्ठभूमि में रखते हुए वह जीते-जागते इंसानों की जीवन कथाएँ ही सुनाता है। ऐसे में हम भूमण्डलीकरण को इतना तूल नहीं दें कि मनुष्य और उसके परिवेश की अन्तर्निबद्ध कथा से हमारा ध्यान हट जाए।

भूमंडलीकरण के कारण एक नई किस्म का यथार्थ पनपा है। वह हिंदी उपन्यासों की विषयवस्तु में किस प्रकार आ रहा है?
भूमंडलीकरण के कारण मनुष्य का जिस निर्मम पूँजवादी यथार्थ से पाला पड़ा है वह विकास के नाम पर उसके वर्तमान और भविष्य के विनाश का यथार्थ है। यहाँ ओजोन-आवरण में छिद्र होना, ग्लेशियरों का पिघलना, मौसमों में बदलाव, वनों का उजड़ना, प्रजातियों का लोप होना, धुआँ भरे शहरों में सीमेन्टी टावरों का फैलाव और दलदली-जमीनों पर झुग्गी-झोपड़ियों की नीम अँधेरी दुनियाओं का बसाव इस सबके बाबत केवल संकेत ही किया जा सकता है। क्योंकि यथार्थ का प्रत्यक्ष चित्रण कथा साहित्य में अधिक होता है इसलिए उपन्यासों और कहानियों में इसे हम अधिक पढ़ रहे हैं। हिंदी में अभी तक कोई ऐसा उपन्यास जरुर नहीं आया है जिसे वैसी प्रमुखता दी जा सके जैसी हम समय-सापेक्ष यथार्थ चित्रण के लिए ‘रेणु’ के मैला आँचल को देते हैं जिसका संबंध ग्रामीण और आँचलिक जीवन से था। आज हिंदी में इधर ऐसी कहानियांँ खूब आई हैं जिनमें बड़ी-बड़ी कंपनियों में काम करने वाले युवाओं की ऐसी जिन्दगियों को हम पहचानते हैं जहाँ पैसा तो खूब है किन्तु एक ऐसी भागती-दौड़ती आपाधापी है जो उन्हें चैन नहीं लेने देती और युवक-युवतियों के बीच जहाँ नए और बराबरी के रिश्ते कायम हुए हैं लेकिन साथ ही संबंधों में एक अनित्यता भी आई है।

भूमंडलीकरण कहिए या नव-आर्थिक उदारवाद बहुराष्ट्रीय निगमों का और देशी बड़ी कम्पनियों का गठजोड़ हो रहा है और देश के प्राकृतिक संसाधनों को उनके हवाले किया जा रहा है। इस प्रक्रिया में सदियों से पहाड़ों और जंगलों में बसे आदिवासियों का विस्थापन हो रहा है। यह कहने की जरुरत नहीं है कि इसी कारण नक्सलवाद का उभार भी हुआ है। आदिवासी विस्थापन के दर्द को लेकर कुछ अच्छे उपन्यास और कहानियां तो लिखी गई हैं, लेकिन अभी तक हिंदी में कोई ऐसी रचना नहीं आई जिसे हम महाश्वेता देवी के उपन्यासों के समकक्ष रख सकें।

हिंदी में कॉरपोरेट दुनिया को लेकर भी इधर काफी कुछ लिखा गया है। इस संबंध में अलका सरावगी के उपन्यास ‘एक ब्रेक के बाद’ का जिक्र किया जा सकता है। इसका अप्रत्यक्ष प्रभाव जिस तरह से दूर-दराज के शहरों और गांवों तक फैला है इसके उदाहरण के लिए काशीनाथ सिंह के रेहन पर रग्घू का नाम लिया जा सकता है। कॉरपोरेट जीवन से संबंधित कहानियाँ भी खूब लिखी गई हैं। लेकिन अधिकतर हिंदी लेखक साधारण मध्यवर्ग से आते हैं और उन्हें कॉरपोरेट दुनिया का अभी तक जो अनुभव उपलब्ध हुआ है वह छोटे-बडे पैकेज की नौकरियों का ही हैं, इसलिए उसके बारे में जो रचनाएँ मिलती हैं वे सरसरी तौर पर ही हमें उस दुनिया से परिचित कराती हैं।

भूमंडलीकरण के दौर में भारतीयों का एक नए ढंग का देशान्तरण शुरु हुआ है। पहले बड़ी तादाद में भारतीय कमाने-खाने के लिए या बेहतरी की चाह में स्वेच्छा से पश्चिमी देशों में जाते रहे थे, लेकिन इधर तकनीकी योग्यता प्राप्त भारतीयों के लिए विशेष अवसर उपलब्ध हुए हैं और वे विदेशों में जाकर काफी समृद्ध जीवन जीने लगे हैं। अब तो चीन और दूसरे एशियाई देशों में भी देशी और विदेशी कंपनियाँ भारतीय युवकों को भेज रही हैं। अब तक जो प्रवासी साहित्य था, उसमें विदेशी संस्कृति के बीच तनाव में जीते चरित्र ज्यादा सामने आते थे। लेकिन अब जाने वाले युवा वैश्विक भौतिकवादी सभ्यता के प्रति ज्यादा अनुकूलता में हैं। वहाँ बसे नये लोगों की जिन्दगी को लेकर अंग्रेजी में लिखने वाले भारतीय लेखकों को अपूर्व प्रसिद्धि प्राप्त हुई है और दौलत भी। विदेश में बसे हिंदी-भाषियों के बीच से भी ऐसे लेखक आने लगे हैं जो वहाँ की जिन्दगी के बारे में बहुत सहज भाव से लिख रहे हैं।

अपने देश का सच बहुत नंगा है। विकास के भारी भरकम आँकड़ों के बावजूद लाखों लोग जिन्दगी के मामूली-से-मामूली सुखों से मरहूम हैं। इसलिए यहाँ लिखे जाने वाले उपन्यास ही हमें अपने देश के यथार्थ का सच्चा साक्षात्कार करा सकते हैं। प्रवासी भारतीय लेखक, वे चाहे अंग्रेजी के हो चाहे हिंदी के, जिस यथार्थ को सामने रखते हैं, वे ज्यादातर भरे पेट और अतिसुख से ऊबे हुए लोगों का यथार्थ होता है। ऐसा नहीं है कि जीवन में उल्लास न हो लेकिन उस उल्लास से कहीं बड़े और घने विषाद से साक्षात्कार कराने वाला हमारा साहित्य ही वास्तव में हमारा प्रतिनिधि साहित्य है। वह भूमंडलीकरण या नये आर्थिक उदारवाद का विरोध सिर्फ विरोध के लिए नहीं करता, वह ऐसा हमारे बीच की लाखों जिन्दगियों की उदासियों से व्यथित होकर करता है।

भूमंडलीकरण ने भारतीय समाज की संरचना को प्रभावित किया है। यह उपन्यासों में हमें किस रूप में देखने को मिल रहा है?
भूमंडलीकरण से उपभोगवादी संस्कृति का जिस पैमाने पर समाज में दखल बढ़ा है उसका गहरा असर सामाजिक जिन्दगी और इंसानी रिश्तों पर पड़ा है। इसे साहित्य में स्पष्ट परिलक्षित किया जा सकता है। हमारे उपन्यासों और कहानियों में बुजुर्गों की ऐसी स्थिति का चित्रण अधिक हो रहा है जिनके बच्चे विदेश या देश में कहीं दूर ऐशोआराम की जिन्दगी जी रहे हैं और माँ-बाप की भावनात्मक अपेक्षाओं को वे केवल और केवल पैसे से पूरा करना चाहते हैं। पीछे छूट गए माँ-बाप या तो बहुत अकेले हो गए हैं या अक्सर वृद्धाश्रमों के भरोसे छोड़ दिए जाते हैं। इसी तरह युवक-युवतियों के संबंधों में प्रेम की प्रदीप्त ऊष्मा की जगह दैहिक तात्कालिकता ने ले ली है। इस नकारात्मक पक्ष पर ही ध्यान केंद्रित नहीं करें तो हम देखते हैं कि आज की युवा स्त्री एक स्वतंत्र इकाई के रूप में हमारे सामने आती है और अब उसमें परम्परागत भारतीय नारी की छवि को देखना गलत होगा। आज की हिंदी-कहानियों में हमें दोनों तरह की युवा स्त्रियाँ मिलती हैं। एक तरफ हम जिन्दगी की सड़क पर भटकती हुई औरत को देखते हैं तो दूसरी तरफ अपनी अस्मिता को तलाशती तेजस्वी लड़की को। ऐसी तेजस्वी लड़कियों की छवि नई लेखिकाओं की रचनाओं में ज्यादा मिलती है। देहवादी विमर्श ने जहाँ देह की स्वतंत्रता को औरत की आजादी का प्रतिमान माना वहाँ उसने उसे बाजार की वस्तु भी बना दिया है। आज के महिला लेखन में भी हम विभक्त मानसिकता को लक्षित कर सकते हैं। यह अवश्य है कि जिन भी महत्वपूर्ण रचनाओं का हम उल्लेख कर सकते हैं वे वस्तुतः स्त्री के इस बाजारीकरण के प्रति प्रतिवाद के स्वर को ही बुलन्द करती हैं।

भूमंडलीकरण के प्रभाव से समाज में अस्मिता संघर्ष और बढ़ा है। उपन्यासों में आप इसे किस रूप में देखते हैं?
भूमण्डलीकरण से प्रेरित उत्तर आधुनिकतावाद ने अस्मितावादी विचारों और आंदोलनों को जोर-शोर से बढ़ाया हैं। अस्मितावाद का धनात्मक पक्ष यह है कि इसने उपेक्षित लोगों और संस्कृतियों को आवाज दी है। लेकिन स्वयं पूँजीवादी देशों में इस तरह के आंदोलनों के चलते कोई बड़ा संकट पैदा नहीं हुआ जबकि विकासशील और पिछड़े देशों में ये राष्ट्रीय व सामाजिक एकता के विघटन के निमित्त बन रहे हैं। राजनीतिक दृष्टि से अस्मितावाद ने वर्ग-संघर्ष की विचारधारा को अपदस्थ कर दिया है। एक समय दुनिया भर के मजदूरों का नारा था- ‘जीतेंगे हम एक दिन’ उपराष्ट्रीयताओं, जातीयताओं और भिन्न-भिन्न वर्गों के पृथक्-पृथक् अधिकारों के आन्दोलन उत्पीड़ित मनुष्य को एक इकाई के रूप में नहीं देखते और इसलिए आमजन द्वारा संगठित प्रतिरोध नहीं किया जा सकता। इस रूप में ये अस्मितावादी पूँजीवाद के विरुद्ध कोई चुनौती खड़ी नहीं करते। हमारे यहाँ के राजनीतिक अस्मितावादी आंदोलनों के बारे में विस्तार से चर्चा तो यहाँ संभव नहीं है, लेकिन पूर्वोत्तर के उल्फा जैसे उग्रवादी संगठनों का जिक्र किया जा सकता है। ये अपनी मुक्ति की कल्पना भारत में रहते हुए नहीं भारत से अलग होते हुए ही करते हैं। इसके लिए जिम्मेदार हमारा प्रभुवर्ग भी है।

अस्मितावाद गैर राजनीतिक स्तर पर हमारे साहित्य में स्त्री-विमर्श, दलित-विमर्श और आदिवासी-विमर्श के रूप में  प्रतिफलित हुआ है। इसका सकारात्मक पक्ष यह रहा है कि पहली बार साहित्य में उपेक्षित वर्गों की व्यथा, आशा-आकांक्षा और प्रतिरोध को स्वर मिला। आज हिंदी में हम स्त्री-लेखन, दलित-लेखन और आदिवासी-लेखन के बारे में अलग से बात कर सकते हैं और कह सकते हैं कि इसने हमारे साहित्य को नई दिशा और नए आयाम दिए हैं। लेकिन एकांतिक आग्रहों के कारण मनुष्य के उत्पीड़न को देखने की एक समग्र दृष्टि खंडित हुई है और शायद इसीलिए न समाज में और न साहित्य में आज जन-आन्दोलनों से हमारा साक्षात्कार होता है। ऐसा नहीं है कि छुटपुट जन-आन्दोलन नहीं चल रहे हैं, लेकिन वे जैसे हमारे राजनैतिक संसार में हाशिए पर हैं, वैसे ही हमारे साहित्य में भी, अफ़सोस इस बात का है कि साहित्यकार के सामने मानव मुक्ति का जो एक महत् स्वप्न था वह आज विस्मृत हो गया लगता है। इसी का स्वागत उत्तर आधुनिकतावादी ‘महाख्यान का अन्त’ के रूप में करते हैं। यह अंतवादी विचारधारा पूँजीवाद को विकल्पहीन व्यवस्था के रूप में प्रस्तुत करती है, लेकिन हम देखते हैं कि समानता का स्वप्न वह कितना ही धुँधला गया हो, उसका अन्त नहीं हुआ है। दुनिया के किसी-न-किसी कोने से आदमी की इसके लिए जद्दोज़हद की ख़बर हमें बराबर मिलती रहती है। खुद अमेरिका में जो ‘डब्ल्यू.टी.ओ.’ आन्दोलन हुआ वह निन्यानवें प्रतिशत जनता के एक प्रतिशत महाधनाढ्य वर्ग के प्रति आक्रोश को व्यक्त करता है। वह आन्दोलन चाहे कितना ही अल्पकालीन रहा हो उसने यह अवश्य सिद्ध कर दिया है कि पूँजीवादी दुनिया के स्वर्ग होने के आख्यान का भी अन्त हो चुका है। दक्षिणी अमेरिकी मुल्कों मेंं अमेरिकी साम्राज्यवाद के विरुद्ध जो कामयाब बगावतें हुई हैं वे मनुष्य के मुक्तिकामी संघर्ष को आगे बढ़ाने वाली हैं। वेनेजुएला के जननायक स्वर्गीय ह्यूगो शावेज ने अमेरिकी बहुनिगमों के वर्चस्व को समाप्त करते हुए जो जनकल्याण के कार्य किए, उन्हें मुक्ति संघर्षों की ताजा कड़ी के रूप में ही देखा जाना चाहिए। 

अगर हमारे साहित्यकारों का इधर जनवादी सरोकारों से बहुत ज्यादा लेना-देना नहीं हैं तो इसमें दोष लेखकों का उतना नहीं है जितना हमारी हिंदी पट्टी के पिछड़े जातिवादी समाज का है। इधर ऐसे बेशर्म प्रयास भी हुए हैं कि साहित्य में केवल ऐसे लेखकों को आगे लाया जाए जो केवल और केवल धनी होती मध्यवर्गीय जिन्दगी की कहानी कहते हैं। ऐसी कहानी कहना अपने में कोई गलत नहीं है क्योंकि यह भी हमारे जीवन का हिस्सा है लेकिन मात्र ऐसे लेखन को आज का प्रतिनिधि लेखन घोषित करना हमारे भूखे-नंगे समाज के साथ एक तरह की गद्दारी ही है।

भूमंडलीकरण और संचार क्रांति के पश्चात् उपन्यास के शिल्प में आप क्या बदलाव देखते हैं?
भूमंडलीकरण अर्थात् नव पूँजीवाद के कारण जो नए किस्म का यथार्थ आया है उसने समाज को अनेक स्तरों पर प्रभावित किया है। बाजारवाद या उपभोक्तावाद ने मनुष्य को लगातार संवेदनहीन बनाया है। पैसे ने हमेशा मानवीय रिश्तों पर बुरा असर डाला है लेकिन आज तो येन-केन-प्रकारेण पैसा कमाना ही समाज में चरम आदर्श बन गया है। पूँजीवाद का नया मंत्र हैं- ‘सपने बेचना’, ये सपने आदमी को एक मायावी संसार में ले जाते हैं तथा उसे छद्म सुख का भ्रम देते हैं। ऐसे उपन्यास के उदाहरण के लिए जिसमें विज्ञापन के इस कमाल को दर्शाया गया है हम अलका सरावगी के उपन्यास ‘एक ब्रेक के बाद’ का जिक्र कर सकते हैं। बाज़ार के विस्तार के साथ ही भारतीय मध्य वर्ग के युवाओं के लिए बड़ी-बड़ी कम्पनियों में नए अवसर पैदा हुए हैं। ज्यादातर ये आउटसोर्सिंग वाली कम्पनियाँ हैं जो विदेशी निगमों के लिए बहुत सस्ता श्रम मुहैया कराती हैं। इनसे नए नौकरी-पेशाओं को लेकर लिखी गई रचनाओं में ममता कालिया के ‘दौड़’ उपन्यास का उल्लेख किया जा सकता है। नए अर्थतंत्र ने जिस तरह भूमंडलीकृत देह-व्यापार और अपराध जगत को बढ़ाया है उसके उदाहरण के लिए प्रदीप सौरभ का ‘मुन्नी मोबाइल’ उल्लेखनीय है। ये उपन्यास इसलिए भी उल्लेखनीय हैं कि ये केवल यथार्थ के ऊपरी स्तर पर नहीं रचे गए हैं बल्कि इस अर्थतंत्र का मानवीय संबंधों पर जो टूटनकारी असर हुआ है उसको दिखाते हैं। इस प्रसंग में काशीनाथ सिंह के ‘रेहन पर रग्घू’ का विशेष उल्लेख आवश्यक है। यह केवल युवा वर्ग के निष्क्रमण की कहानी ही नहीं कहता उसके अलावा भी औरत-आदमी के बदलते रिश्तों की बदलती नैतिकता को सहानुभूति और संवेदना से देखता है। हम कहानियों का उदाहरण लेंगे तो बातचीत बहुत लम्बी हो जाएगी। केवल इतना ही कह सकते हैं कि कहानियों में भी यह यथार्थ खूब प्रतिफलित हुआ है। इस संबंध में नकारात्मक बात यही है कि यह साहित्य मध्यवर्ग केंद्रित रहा है और समाज का निचला तबका और बेजुबान होता जा रहा है।

आपका प्रश्न कि नए संचारतंत्र का कथा-साहित्य पर क्या प्रभाव पड़ा है? इसका एक मोटा उत्तर तो यही दिया जा सकता है कि संचार-क्रांति अभिव्यक्ति-रूपों पर गहरा असर डाल रही है। हमारे देश में कम्प्यूटर और इन्टरनेट का प्रसार पिछले दो दशकों में ही हुआ है। जब भी संचार साधनों में बदलाव आता है तो साहित्य पर उसका प्रभाव लक्षित होता ही है। फिल्म तकनीक का प्रभाव लेखन विधि पर स्पष्ट रूप से पड़ा था। रेडियो की प्रमुखता के जमाने में ध्वनि-नाटकों और एकांकियों का खूब चलन रहा था। समाचार पत्रों में रिपोर्ट लेखन के प्रभाव से साहित्य में रिपोर्ताज-लेखन अस्तिव में आया था जिसका अत्यन्त कलात्मक अभिनिवेश ‘रेणु’ के कथा-साहित्य में हमें मिलता है। दूरदर्शन के विस्तार के साथ कथा-लेखन में वर्णानात्मकता का महत्त्व कम होता गया है और दृश्यात्मकता का अधिक। हिंदी में अभी ग्राफिक लेखन अधिक नहीं मिलता है लेकिन अंग्रेजी में तो ग्राफिक कथा का अलग स्वरूप विकसित हो-सा गया है। मोबाइल के प्रचार-प्रसार के साथ ऐसे उपन्यास अस्तित्व में आए हैं जो पूरे-के-पूरे मोबाइल पर उपलब्ध हैं। रचना में तकनीक का महत्त्व है, लेकिन तकनीक अपने आप में रचना को महत्वपूर्ण नहीं बनाती। उस तकनीक का श्रेष्ठ सर्जक अपने ढंग से यदि एक अनोखा इस्तेमाल करता है तो उसकी रचना विलक्षण हो जाती है। उदाहरण के लिए अलका सरावगी का उपन्यास ‘कलिकथा वाया बाईपास’ इसीलिए महत्त्वपूर्ण हो सका क्योंकि उसमें केवल अपने समय का यथार्थ ही नहीं था बल्कि उस यथार्थ की प्रस्तुति भी मुद्रण की नई तकनीक के सहारे प्रस्तुत की गई थी। अलका सरावगी ने अपने दूसरे उपन्यास शेष कादम्बरी में फोन की एस.टी.डी पद्धति का उपयोग किया था जो आज के मोबाइली जमाने में बहुत पुरानी दिखाई देती है। मेरे देखने में पहली बार आया कि ई-मेल और ब्लॉग का बहुत अच्छा उपयोग मनीषा कुलश्रेष्ठ ने अपने उपन्यास शिगाफ़ में किया है। इन पद्धतियों का प्रभाव हम अनेक रचनाकारों की कृतियों में लक्षित कर सकते हैं। उदाहरण के लिए ‘महुआचारित’ में आख्यान पद्धति की जो मितकथनी शब्द का है, बहुत संभव है कि उस पर मोबाइल की ‘मैसेज’ पद्धति का प्रभाव भी कुछ पड़ा हो।

अन्तर्वस्तु और अभिव्यक्ति में किसे वरीयता दें इस प्रश्न में हम नहीं उलझना चाहते। बहुत बार अन्तर्वस्तु भी अपने लिए एक खास रूपाकार की अपेक्षा रखती है। जो सर्जक बड़े मानवीय सरोकारों की कथा को बड़ी प्रयोगशील अभिव्यक्ति देता है, वही एक बड़ी रचना दे सकता है।

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संपर्क: डॉ. ललित श्रीमाली,  ईमेल: lalitshrimali2014@gmail.com

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