आंदोलन की परंपरा ने दो बातों को मजबूत किया, आंदोलन की संभावना और लोकतंत्र को : रामबहादुर राय

प्रश्न- आपकी दृष्टि में जनान्दोलन से क्या तात्पर्य है?

जिस आंदोलन में समाज के हर तबके की हिस्सेदारी हो उसे जनआंदोलन कहते हैं। आंदोलन के मुद्दे क्या हैं यह बात महत्वपूर्ण है। एक मुद्दे के लिए किया गया प्रयास अभियान होता है। अगर बदलाव के लिए एक-साथ कई मुद्दों को उठाते हैं तो वह जनान्दोलन कहलाता है। इसमें भागीदारी और मुद्दे दोनों महत्वपूर्ण हैं। 

प्रश्न-  क्या भारतीय लोकतंत्र में जनान्दोलन के लिए जगह बची है?

भारतीय लोकतंत्र में जनान्दोलन की अपार संभावनाएं हैं। हमारे संविधान की खासियत यह है कि वह व्यक्ति के अधिकार को मानता है। लोग जब किसी सवाल को लेकर मन से उद्देलित होते हैं तो वही आंदोलन की रूप में सामने आता है। लोगों को सरकार से अपनी मांग मनवाने का अधिकार है। सरकार तक जनता की बात पहुंचे, वह उन्हें सुने इसके लिए आंदोलन करते है। सरकार भी इस अधिकार को मानती है। 1947 में संसदीय लोकतंत्र कायम होने के बाद जो आंदोलन की परंपरा बनी है उसने दो बातों को मजबूत किया, आंदोलन की संभावना और लोकतंत्र को।

प्रश्न- जन आंदोलन और मीडिया में क्या संबंध है?

मीडिया एक माध्यम है। आंदोलन जब खड़ा होता और चल पड़ता है तो लोग उसमें शामिल होने लगते है तब वह मीडिया के लिए न्यूज बन जाता है। सरकार और मीडिया मालिक चाहे या ना चाहे अपने अस्तित्व के लिए उन्हें आंदोलन कवर करना पड़ता है। विरोध में ही सही मीडिया आंदोलन कवर करती है। इससे आंदोलन को ताकत मिलती है। मीडिया इसकी उपेक्षा नहीं कर सकती।

प्रश्न- जेपी के संपूर्ण क्रान्ति आंदोलन में मीडिया की भूमिका कैसी रही?

जेपी आंदोलन का स्वरूप कुछ ऐसा था कि ज्यादातर अखबार आन्दोलन के समर्थन में थे। अखबारों की भूमिका सकारात्मक थी। जबकि उस दौरान सरकारी मीडिया दुश्प्रचार का साधन बनी हुई थी खासकर रेडियो और दूरदर्शन। इस दौरान हिन्दुस्तान टाईम के एडिटर वीजी वर्गीज थे जिन्होने तीन लेख लिखे और प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को चेतावनी दी। जिसके कारण उन्हें अखबार भी छोड़ना पड़ा। इस दौरान सरकार परस्त अखबार ने भी आंदोलन का समर्थन किया। 

प्रश्न- जेपी आंदोलन में वैकल्पिक मीडिया की क्या स्थति रही?

जेपी आंदोलन के दौरान प्रजानीति, एवरीमेन्स पत्रीका, देवदत्त की पत्रिका ‘प्वाइंट आॅफ व्यू’ आदि स्थानीय वैकल्पिक मीडिया ने जनमत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। रोज बुलेटिन लाखों में छपती थी और लोग उसे चाव से पढ़ते थे। आंदोलनकारी जेल में बुलेटिन लिखते थे। 

प्रश्न- अन्ना हजारे के जनलोकपाल आंदोलन के परिपेक्ष्य में मीडिया की भूमिका को किस तरह देखते है ?

अन्ना हजारे के आंदोलन को मैं आंदोलन नहीं अभियान मानता हूं। जो लोकपाल बनाने के लिए छेड़ा गया। यह अभियान मीडिया के लिए एक न्यूज या इवेंट था इसलिए इसे कवर किया गया। कुछ चैनलों को कारपोरेट घरानों ने अपने स्वार्थ के लिए इस्तेमाल किया और इस आंदोलन को सरकार के खिलाफ औजार के तौर पर उपयोग किया गया। यह व्यवस्था परिवर्तन का आंदोलन होता मगर इसका अपहरण हो गया। आंदोलन पर राजनीति छा गई। मीडिया ने यह तथ्य समझने की कोशिश भी की मगर मीडिया में भी लोग यह फर्क नहीं कर पा रहे थे कि यह अभियान है या आंदोलन।

प्रश्न- अन्ना आन्दोलन में मीडिया की भूमिका पर अनेक सवाल उठे। अपने फायदे के लिए समर्थन व विरोध करने के आरोप लगे। इस विषय में क्या कहेंगे?

इस अभियान के तीन चरण हैं। पहले चरण में आंदोलन करने वाले लोगो को भी यह आशंका सता रही थी कि कोई समर्थन मिलेगा या नहीं क्योंकि उनको लोगों के मिजाज का अंदाजा नहीं था। मीडिया भी उसी तरह देख रही थी कि क्या इनको सचमुच समर्थन मिलता है। इस दौरान आंदोलन करने वाले और मीडिया की भूमिका लोगों का मिजाज भांपने की ज्यादा थी। डर इस बात का था यह छोटे समुदाय का आंदोलन बनकर रह जाएगा। देश के बुद्धिजीवियों और बौधिक लोगों ने यह धारणा बना ली थी कि उदारीकरण के बाद उपभोक्ता संस्कृति छा गई है। नौजवानों की आंदोलन में पहले की तरह रूचि नहीं है। मगर जंतर-मंतर में हुए धरने के पहले-दुसरे दिन ही यह आशंका निर्मूल हो गई। आंदोलन देखने के लिए मध्यवर्ग के लोग भी पहुंचे थे और मीडिया के लिए यह नई बात थी इसलिए वह दिखाने पहूंचता था। भ्रष्टाचार के विरूद्ध लोगों में बहुत गुस्सा है इसका किसी को अंदाजा नहीं था। भ्रष्टाचार जिन्दगी का हिस्सा है लोगों की यह धारणा टूट गई। सरकार और पुलिस के उपेक्षापूर्ण रवैये का कारण जन समर्थन और बढ़ता गया। मीडिया में प्रतिस्पर्धा के चलते आंदोलन को अच्छी कवरेज मिली। आंदोलन के दूसरे चरण में आंदोलन का समर्थन बढ़ा, लोग आने लगे। इस दौरान दो बातें उठाई गई। समर्थक बताते थे कि यह खाए-पीए अघाए वर्ग का आंदोलन है इससे गरीबों का कोई लेना-देना नहीं। 

दूसरी तरफ यह भी कहा जा रहा था कि आंदोलन के लिए फंडिग की गई है यहां तक कि मीडिया को फंड देकर कारपोरेट घराने इस्तेमाल कर रहे हैं। मगर आंदोलन में शामिल होने वाली आम जनता को पैसे से नहीं मुद्दे से मतलब था। उन्हें उम्मीद थी कि सख्त कानून बनता है तो भ्रष्टाचार मिटाने में सहायता मिलेगी। बौधिक लोग इस बात पर बहस कर रहे थे कि कानून बन जाने से भ्रष्टाचार सचमुच मिट जाएगा। एक स्थिति ऐसी आई कि यह अभियान देशव्यापी हो गया। छोटे-छोटे गांव के लोग भी इसमें शामिल हुए। 

तीसरे फेज में आंदोलन का अपहरण हो गया। दूसरे चरण में आंदोलन को अपनी मुट्ठी में करने की जी तोड़ कोशिश हुई। इस दौरान अरविन्द केजरीवाल व अन्य लोगों को प्रसिद्धि मिली और उभरे। जहां पहुंचकर आंदोलन का तार्कीक विस्तार, उन्नयन होना चाहिए था, उसका नया रूपान्तरण होना चाहिए था यह दुर्भाग्य की बात है कि वहां इसका अपहरण हो गया। लोकपाल की मांग से जन उभार हुआ। अब उसका राजनैतिक व्यवस्था बदलने के रूप में रूपांतरण होना चाहिए था यह नेतृत्व की जिम्मेदारी थी। मगर उन्होंने अपने लोगों के साथ धोखा किया उसे सत्ता की सीढ़ी की तरह उपयोग करने लगे। इन तीनों चरणों में मीडिया की निष्पक्ष और स्वतंत्र भूमिका थी। मीडिया स्वयं में भी एक ताकत के रूप में इस दौरान स्थापित हुई।

मीडिया को भ्रम है कि वह आंदोलन उठा और गिरा सकती है। मगर इस दौरान उनकी भूमिका अच्छी थी। सत्ता के दबाव में नहीं आई।

प्रश्न- अन्ना आन्दोलन में न्यू मीडिया/सोशल मीडिया की क्या भूमिका रही?

सोशल मीडिया एक नया मध्यवर्ग पैदा कर रहा है जो जागरूक भी है। घटनाओं पर रिएक्ट भी करता है। अपना मत देता है। इस रूप में सोशल मीडिया का प्रभाव और विस्तार बढ़ रहा है। इसका एक संकट भी है अब यह अफवाहों की मीडिया बनती जा रही है। अखबार और चैनल खबर के नियमन की व्यवस्था समाज करता है। वह तय करता है कि पाठकों की नजर में इसकी कीमत क्या है। इसमें स्वनियमन की कोई व्यवस्था नहीं है। सोशल मीडिया की खबर का सच्चाई से वास्ता है या नहीं। खबर के पहले सिद्धान्त का पालन नहीं हो रहा है। यहां पर उसकी स्थिति बहुत संदेहास्पद हो गई है।

प्रश्न- सरकारी प्रभाव वाले आकाशवाणी और दूरदर्शन आन्दोलनों में कैसी भूमिका अदा करते हैं?

मीडिया आंदोलन पैदा नहीं कर सकता। वह किसी का उपकरण बनेगा या जवाबदेही और ईमानदारी से काम करेगा यह उसे स्वयं तय करना होगा। इन दिनों मीडिया पर पूंजी का प्रभाव बढ़ गया है वह जहां से भी आ रही है मीडिया को संचालित करने का काम कर रही है। जैसे प्रसार भारतीय एक स्वायत निकाय के तौर पर स्थापित हुआ था मगर आज इसे सरकार संचालित कर रही है। यह सरकार का पक्ष रखती है। सरकार कांग्रेस की हो या भाजपा की इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। लोग भी इसे सरकारी माध्यम के रूप में जानते हैं। मगर इससे एक फायदा यह हुआ कि अफवाहें उड़ाने वाले को अवसर नहीं मिला।

प्रश्न- स्वातन्न्न्योत्तर भारत के जनआन्दोलनों में मीडिया की भूमिका के निष्कर्ष स्वरूप् क्या-क्या महत्वपूर्ण बिन्दु उभरते हैं?

आठवें दसक से पहले हमारे यहां अंग्रेजी मीडिया का प्रभाव रहा है। खासकर पब्लिक ओपिनीयन बनाने में इसका बड़ा योगदान रहा। इस दौरान ज्यादातर अंग्रेजी अखबार सरकार का पक्ष रखने और उस से जुडे़ रहने का प्रयास करते थे और जो भी सत्ता में है उसकी ईमेज बनाने का प्रयास करते थे। भाषाई मीडिया छट्ठे दशक तक आजादी के उल्लास और नव निर्माण का माध्यम थी। जब लोग भुखमरी, अकाल, बेरोजगारी, महंगाई जैसी समस्या से जूझने लगे और असंतोष बढ़ा तो छटे दसक में भाषाई मीडिया ने इसके खिलाफ आवाज भी उठाई। लेकिन आठवें दशक में भाषाई मीडिया छा गई और जनमत बनाने में उसकी बड़ी भूमिका है।

जनमत बनाने और छवि बनाने में फर्क है। मीडिया जब जनमत का प्रतिनिधित्व करती है तो वह विपक्ष के मुद्दे उठाएगी। इससे विपक्ष मजबूत होता है। केवल इमरजेंसी के दौरान एक बार ऐसा हुआ था जब कुछ अपवादों को छोड़कर अंग्रेजी व भाषाई मीडिया सभी ने सरकार के सामने आत्मसमर्पण कर दिया था। उदारीकरण के बाद मीडिया की जो व्यवस्थाएं थी सब भ्रष्ट हो गई। उसकी साख पेड न्यूज के कारण गिरी है। 2002 के बाद विदेशी पूंजी का प्रवेश बडे़ पैमाने पर हुआ। आज की मीडिया कारपोरेट घरानों की हित रक्षक ज्यादा और आम आदमी के हित में है यह कहना मुश्किल है। इस समय की मीडिया में मुनाफा ऊपर और भारत में मीडिया की जो परंपरा रही है वह पृष्ठभूमि में चली गई है।

प्रश्न- जनआन्दोलनों में मीडिया की भूमिका को लेकर क्या सुझाव देना चाहेंगे ?

आज हमारे सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि मीडिया की साख लौटे कैसे? पत्रकार को अगर अपना काम करने की आजादी मिलती है तो यह साख लौट सकती है। मगर कारपोरेट संचालित मीडिया में यह नहीं हो सकता। सबसे पहले मीडिया की वस्तुस्थिति और नियमन का एक स्वरूप तय हो। जो मीडिया घराने यह मानते है स्वनियमन सबसे अच्छा है यह सिवाय धोखा देने के और कुछ नहीं है। मालिको की नहीं पत्रकारों की आजादी वापस लौटनी चाहिए। इसमें सरकार की भूमिका महत्वपूर्ण है। तीसरा प्रेस आयोग बने। दूसरे देशों जैसे अमेरिका में भी इस तरह के प्रयास हुए हैं। जिस प्रकार सालभर में इकानोमिक सर्वे होते है उसी प्रकार भारत सरकार मीडिया की वस्तुस्थिति का अध्ययन करे। यह भारत सरकार की जिम्मेदारी बनती है। नए सिरे से सोचने की जरूरत है। सोशल मीडिया और नेटवर्कींग में आम आदिमी के हितों की कैसे रक्षा हो रही है इस ओर ध्यान देने की जरूरत है।

सासिक सोशल मीडिया

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