एक पत्रकार को निष्पक्ष, उदार होना चाहिए

प्रश्न- पहले की अपेक्षा पत्रकारिता कैसे बदली है, और यह बदलाव कैसे हुआ, इस बदलाव को आप किस रूप में देखते हैं?

उत्तर- पहले की पत्रकारिता और आज की पत्रकारिता को देखकर निराशा पैदा होती है. हमारे यहां पहले पत्रकारिता एक मिशन था. मैं पत्रकारिता में यह सोचकर आया था कि यह सबसे ईमानदारी का पेशा है. मेरे पिता चाहते थे कि मैं इंजीनियर या पुलिस अधिकारी बनू मगर जब मैंने पत्रकारिता को चुना तो वह मृत्युपर्यंन्त नाराज रहे. पहले पत्रकारिता में श्रम अधिक करना पड़ता था चूंकि उस समय न तो इंटरनेट था और न अन्य सुविधाएं. आज पत्रकारिता एक पेशा बन गई है, इस क्षेत्र में आने वाली नई जेनरेशन भी यही सोचती है कि कैसे पैसा बनाया जाए। हांलाकि इकोनामिक प्रेशर बहुत है. इंमरजेंसी के समय तक ऐसा था कि ज्यादातर पत्रकार बिना पैसे के लेखन करते थे मगर आज हमें ऐसे जर्नलिस्ट ढूंढ़ने पड़ते हैं जो पैसे के लिए न लिखते हों. नेहरू के समय में अखबारों में विदेशी पूंजी निवेश पर रोक लगा दी गई थी.

प्रश्न- आपके समय में समाचारपत्रों का प्रबंधन कैसा था? उसका हस्तक्षेप किस रूप में था, आप उसके प्रभाव को कैसे देखते हैं?

उत्तर- उन दिनों विदेशी ऐजेंसीयां जैसे रायटर, एजेंसी फ्रांस प्रेस कोई खबर देना चाहती थी तो वह किसी इंडियन एजेंसी के ही माध्यम से दे सकती थी. मगर अब विदेशी निवेश के बढ़ने से पेड न्यूज और प्रायोजित खबरों का चलन बढ़ा है. उन दिनों हम उन खबरों पर ज्यादा जोर देते थे जो आम आदमी से संबंधित थी. उन दिनों छोटे-छोटे शहरों की खबरें खासकर जो अन्य भारतीय भाषाओं में होती थी उन्हें भी महत्व देते थे. हिन्दुस्तान समाचार में उन दिनों चौदह भारतीय भाषाओं की खबरें छपती थी. अब भारतीय भाषाओं का चलन खत्म हो गया है और अंग्रेजी से अनुवादित खबरों का चलन बढ़ा है. एजेंसी की हिंदी सेवा भाषा और वार्ता अंग्रेजी एजेंसियों पर निर्भर है. इडिपेन्डेंट खबरें नहीं है. दूसरा पार्लियामेंट की खबरें पहले 30 से 35 प्रतिशत के करीब छपती थी मगर आज वह 1 प्रतिशत रह गई हैं जो छपती भी हैं वह नेगेटिव होती हैं जैसे हंगामें और मारपीट से संबंधित.

प्रश्न- अख़बारों से आम आदमी कैसे गायब हुआ है? आज किस प्रकार की खबरों का प्रचलन बढ़ा है जो आप के समय में नहीं था?

उत्तर- अब अखबारों में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से कारपोरेट जगत और पार्टी पालिटिक्स के पक्ष में खबरें ज्यादा दिखती है. कन्सट्रक्टिव खबरें कम और नेगेटिव खबरें ज्यादा रहती है. अब खेल और व्यावसायिक खबरें ज्यादा है किसानों की फसले खराब हुई उसका उनके जीवन पर क्या प्रभाव पड़ा इस तरह की खबरें गायब हैं. हमारी खबरें महानगरों तक सिमट गई हैं. शादी, रोमांस की खबरें ही दिखती है.

प्रश्न- समाचारपत्रों और टेलीविजन के समाचारों में अंग्रेजी भाषा के वर्चस्व को किस रूप में आप देखते हैं?

उत्तर- भाषा का स्तर अखबारों में इस कदर गिर गया है कि अर्थ का अनर्थ हो जाता है उर्दू के शब्द आप गलत इस्तेमाल करते हैं. अनुवाद एक कठिन प्रक्रिया है जिसमें हर शब्द का एक खास मतलब होता है. मगर इस ओर ध्यान नहीं दिया जाता. उन्ही शब्दों का प्रयोग किया जाना चाहिए जो उचित हो. पहले भाषा का एक मानक होता था मगर अब वह नहीं रहा. आम बोलचाल के नाम पर अंग्रेजी के शब्दों का धड्डले से प्रयोग बढ़ा है.  

प्रश्न- समाचारपत्रों में पहले जो छपता था उसे शाश्वत सत्य माना जाता था, आज उसकी विश्वसनियता खतरे में क्यों है?

उत्तर- आम लोग प्रिंट मीडिया में विश्वास करते हैं वह चैनल पर यकीन नहीं करते. सिर्फ शहरी वर्ग ही यह समझ पाता है कि कौन सी खबर गलत है. हमारे समय में खबरों में गंभीरता होती थी उसकी पूरी छानबीन होती थी. इन दिनों खबरों की विश्वसनीयता खत्म हुई है. सनसनी फैलाने वाली खबरें परोसी जाती है. आम आदमी अखबारों खबरों को सौ प्रतिशत सच मानता है मगर आजकल खबरें सौ प्रतिशत सही नहीं होती है. आम आदमी के विश्वास को देखते हुए हमें यह कोशिश करनी चाहिए कि खबरें शत प्रतिशत सही हो.

प्रश्न- आज अखबारों का चरित्र कैसे बदला हैं, इसके पीछे क्या कारण हैं?

उत्तर- इन दिनों अखबारों की विश्वसनीयता घटी है. हिंदी की अपेक्षा अंग्रेजी के समाचारपत्रों में बेहतर भाषा होती है. आम बोलचाल की भाषा के शब्दों का प्रयोग तो ठीक है मगर अन्धाधुन अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग सही नहीं है. भाषा का कोई मानक नहीं है. हिंदी भाषी लोग हिंदी का अखबार पढ़ना पसंद नहीं करते. आप किसी बांग्ला, तमिल या अन्य किसी व्यक्ती के घर चले जाएं उनके यहां आपको उनकी भाषा का अखबार जरूर मिलेगा मगर हिंदी वाले हिंदी का अखबार नहीं पढ़ते. एफडीआई के आने से हमने उन लोगों की भाषा में बात करना शुरू कर दिया जिनका पैसा लगा था. अब अखबारों में गंभीरता नहीं है कागज अच्छा हो गया. अखबार रंगीन हो गया मगर कंटेंट की दृष्टि से उसका स्तर गिरा हैं. एक पत्रकार को निष्पक्ष, उदार होना चाहिए किसी एक पक्ष के साथ सांठ-गाठ नहीं रखनी चाहिए.

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