रघुवीर यादव, आम आदमी, अभिनेता और हिन्दी सिनेमा

ख्यात सिने अभिनेता, गायक, संगीतकार और रंगकर्मी रघुवीर यादव फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ की कहानी पर आधारित नाटक ‘मारे गए गुलफाम’ के मंचन की तैयारी हेतु इन दिनों भोपाल में हैं। कुछ समय पहले ही भोपाल में आइसेक्ट यूनिवर्सिटी के एक कार्यक्रम में उनसे मिलने और पूरा दिन उनके साथ गुजारने का मौक़ा मिला। साथ ही अलग-अलग जगहों पर होने वाले बातचीत सत्र में उनसे सवाल करने का मौक़ा भी। इस बातचीत के बहाने रघुवीर यादव को टटोलने पर जो चीज़ हाथ आई उसने भीतर तक एक अलग ही रोमांच से भर दिया। बातें हुई तो रंगमंच से लेकर सिनेमा के रूपहले पर्दे के सफर ने पैदाइश, जबलपुर, बुंदेलखंड, ज़बान, पारसी और पपेट थिएटर, खानाबदोशी, दिहाड़ी, नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा, इब्राहिम अलकाज़ी, नाटक, संगीत, मैसी साहब, सलाम बॉम्बे, शेखर कपूर आदि बातों/संदर्भों के पड़ाव तय करते हुए उनकी ज़िद, जुनून और संघर्ष के कई रास्ते छाने। दरअसल रघुवीर यादव के भीतर कुलबुलाते कलाकार ने केवल कला को अपना कर्म माना। जबलपुर, मध्य प्रदेश में पैदा हुए रघुवीर ने ज़मीन (मिट्टी) से ज़िद (जीवटता) के जो संस्कार ग्रहण किये, उसी ने उन्हें वहाँ पहुंचाया जिसके लिए आज वो जाने जाते हैं। 

रघुवीर से पहले परिचय को लेकर सिनेमा के सभी प्रेमी उनकी पहली फ़िल्म ‘मैसी साहब’ का ज़िक्र करेंगे। पर भारत की जिस बिरदारी का वो प्रतिनिधित्व करते हैं, उसने ‘मुंगेरीलाल’ के हसीन सपनों में अपनी आँख, नाक, कान, शक्ल और मन को बेचैन होते देखा था। बस यहीं से रघुवीर की जो छवि आम आदमी के दिलो-दिमाग पर बसी उसने ‘भूरा’ की भुरभुरी आवाज़ में ‘गुपच ले’ को भी अपनी आवाज़ माना और ‘मंहगाई’ का ‘डायन’ होना अपनी त्रासदी भी। रघुवीर की कद-काठी में अवाम ने अपना कद देखा और उनके चेहरे में अपना अक्स। ख्यात पटकथा लेखक जावेद अख़्तर ने नसरीन मुन्नी कबीर से हुए लंबे साक्षात्कार में एक बात का ज़िक्र किया है। यह अपने आप में सिनेमा के आम दर्शक के साथ जुड़े मनोविज्ञान को करीने से उधेड़ता है। नसरीन ने उनसे पूछा कि ‘क्या आपको लिखते समय ही ये अंदाज़ा होता था कि ये फ़िल्म चलेगी या नहीं, या एक सफ़ल फ़िल्म को लिखने का फॉर्मूला क्या है?’ इस सवाल के जवाब में जावेद ने जो कहा वो बेहद कमाल है। जावेद ने कहा कि इस सवाल का जवाब सिर्फ इतना है कि “दिल से महसूस की और लिखी गई कोई भी फ़िल्म या कहानी का दर्शक के मन तक पहुँचना और असर करना तय है। फिर चाहे वो किसी भी शहर का दर्शक हो जो मुझसे जीवन में कभी नहीं मिलेगा, कहानी से ज़रूर जुड़ेगा”।

अभिनेता के संदर्भ में अगर देखा जाये तो रघुवीर ने यही बात दोहराई जो सिनेमा और मंच के अभिनय में फर्क दर्शाते हुए उसे(अभिनेता को) दर्शक के क़रीब लाती है। मैंने उनसे सवाल किया उनके पहले अनुभव का जब ‘मैसी साहब’ के पहले दृश्य के समय उन्होंने कैमरे को सबसे पहले फेस किया था। रघुवीर ने कहा, ‘’कैमरा आपकी ईमानदारी को पकड़ लेता है। मंच पर ‘फाल्स एक्टिंग’ फिर भी एक बार चल सकती है, पर कैमरा आपकी सच्चाई को तुरंत पकड़ लेता है और किसी भी तरह की ‘ओवर एक्टिंग’ की वहाँ पर कोई गुंजाइश नहीं और ये बात मुझे पहले ही शॉट में समझ आ गई थी”। शायद यही वो रास्ता है किसी भी कला का जिसके ज़रिये वो दर्शक या पाठक तक पहुँचती है। यही ईमानदारी या सच्चाई अभिनेता को दर्शकों के दिल में वो जगह दिलाती है जिसके कारण रघुवीर जैसे अभिनेता जो भले ही आज ज़्यादा फिल्में न कर रहे हों, दर्शकों के दिल में आज भी ज़िंदा हैं। हिन्दी सिनेमा में जब ‘पैरेलल सिनेमा’ का दौर आया तो ऐसे ही कई अभिनेता जो क़द-काठी और शक़्ल-ओ-सूरत में ‘आम’ से दिखने वाले नज़र आते थे, परदे पर अपनी असाधारण अभिनय क्षमता के कारण अचानक से बहुत ‘ख़ास’ नज़र आने लगे थे। रघुवीर की इसी ख़ास अदायगी में मुझे ‘मैसी साहब’, ‘सलाम बॉम्बे’, ‘वाटर’ ‘लगान’ जैसी फ़िल्में याद आती हैं। ख़ास तौर पर ‘मैसी साहब’ और ‘सलाम बॉम्बे’, जिनमें मैसी और चिलम के चरित्र न केवल जीवंत हुए हैं बल्कि सिनेमा विधा ने अभिनेता की अहमियत को मानक दिये हैं। अभिनय के महत्त्व को नसीरुद्दीन शाह ने एक इंटरव्यू में अपने बचपन को याद कर के यूं बताया था कि उन्हें अभिनय करते हुए पहली बार मंच पर अहसास हुआ कि कोई उनकी बात को ध्यान से सुन रहा है। सोशल मीडिया और इंटरनेट के कारण आज कई पुराने चित्र, फ़िल्में मौजूद हैं जिन्हें देखकर हमें अंदाज़ा लगाना मुश्किल होता है कि ये अभिनेता किसी गली या नुक्कड़ पर खड़े लोग हैं या कोई और। उनके हाव-भाव, अंदाज़, बोलचाल और पहनावे को देख कर यक़ीन करना मुश्किल होता है कि ये किसी सिनेमा के लिए अभिनय कर रहे हैं। हिन्दी कला सिनेमा को देखकर मुझे हर बार अहसास होता है कि विश्व सिनेमा के मुक़ाबले भले ही यह धारा कमज़ोर पड़ी या इसका असर वो नहीं हुआ जितना कि होना चाहिए पर इस सिनेमा ने भारतीयों को फ़िल्में देखना ज़रूर सीखा दिया। इस धारा ने ‘सिनेमा’ को एक कला का दर्जा भारत में दिलाया और जिसमें खासकर ओम पुरी, नसीरुद्दीन शाह, पंकज कपूर, अमोल पालेकर, कुलभूषण खरबन्दा, रघुवीर यादव, अमरीश पूरी, मोहन अगाशे, दिलीप धवन, रवि बासवानी, अनंत नाग जैसे चेहरों का ज़िक्र बेहद ज़रूरी है। अगर केवल एक स्वस्थ बिन्दु पर बात करते हुए यहाँ अभिनेत्रियों को इस सूची में शामिल न करते हुए अभिनेताओं को अलग किया जाये कि अभिनय क्षमता और चेहरे-मोहरे को लेकर संशय की स्थिति अभिनेताओं में अभिनेत्रियों के मुक़ाबले ज़्यादा दिखती है तब यह बहस और भी दिलचस्प हो सकती है।

बहरहाल, रघुवीर यादव के बहाने कला का वो पन्ना भी खुलता है जिसमें अभावों के बावजूद आगे बढ़ने और ज़िद के आगे किसी भी चुनौती से निपटने का जज़्बा दिखाई देता है। जानवरों को चलाने वाला लड़का, जिसने पापड़ बेचने वालों की तीखी आवाज़ के हास्य में अपना कला बोध तलाशा और स्कूल में फेल हो जाने पर घर छोड़ कर गाँव-गाँव, शहर-शहर घूमने वाले और टेंट में सोने-करने वाले थिएटर में ढाई रुपये कमाई को पसीने से चमकाया। रघुवीर का अतीत उनकी आँखों में आज भी दिखता है, जब गज़ब की ऊर्जा से अपने काम के बारे में बात करते हुए केवल ज़िद और जुनून की बात वो करते हैं। उनके गले में देसीपन खनकता है। सिनेमा न केवल क़िस्सों को बल्कि चरित्रों को भी जीवन से ही ढूँढता है। हिन्दी सिनेमा के इन्हीं अदाकारों जिनमें असाधारण जिजीविषा वाली वो अभिनेत्रियाँ भी शामिल हैं जिनका ज़िक्र हम नहीं कर सके थे, उन सभी से मिलकर बनी फ़िल्मों को आइये इसी बहाने देखा जाये और उनके चेहरों में अपने चेहरे, आवाज़ खोजी जाएँ। गुज़रा वक़्त तो नहीं, पर शायद अपने आसपास की वो छवि हमें ज़रूर दिखाई दे जाएगी, जिसे हिन्दी सिनेमा ने हमारे लिए सहेज कर रखा है। 

(लेखक के सहमती से और 'सुबह सवेरे' अखबार से साभार. चित्र साभार: alchetron.com)

 

सासिक सोशल मीडिया

  • facebook
  • Twitter
  • LinkedIn
  • Google Plus
  • Youtube

न्यूज़लेटर के लिए रजिस्टर कीजिए

सहयोगकर्ता: Nikesh