नन्दना की छ कवितायेँ

#1#

ज्वार-भाटा
चढ़ती हुई चाँदनी के साथ
चिर-विरह को अभिशप्त
समुद्र के हृदय की 
तरल वेदनायें
उबलने लगतीं है,
 
चाँद का गुरुत्व
बढ़ा देती है
मिलन की आतुरता
और किसी
विक्षिप्त प्रेमी की भाँति
व्यग्र हो छटपटातीं हैं लहरें,
दहकते लपटों सी उछलतीं हैं
टीस भरी लालसायें
प्रेयसी के चेहरे को चुमने,
 
उसे अपने आलिंगन में 
डुबो लेने की चाह लिये
कल्पनाओं का ऊँचा आलाप भरके
सामर्थ्य की पराकाष्ठा तक
ऊपर ऊठती हिलोरें
यथार्थ के तलछट पे
पटका खा गिरतीं हैं,
 
निरंतर इसी क्रम में
चल रहे अनंत संघर्ष से
युँ तो अनभिज्ञ नहीं है चाँद,
साथ ही ज्ञात है उसे
अपने परिमंडल से भटकने का 
परिणाम भी,
लीक से हटना
प्रलय का निमित्त हो सकता है ,
 
इसी भय से विवश
भावनाओं पे निष्ठूर नियंत्रण
कर रखा होगा शायद,
 
किंतु शांत और निर्लिप्त
लगने वाले चाँद को
जब समुद्र की लवणयुक्त नयनों में
अपना भीगा थरथराता सा
प्रतिबिंब दिखता होगा
कुछ ज्वार तो उसके 
अंतस में भी 
अवश्य ही उठता होगा
 
          #2#
 
मैंने अपनी ओढ़नी
उड़ा दी
ऊपर आकाश 
लहराने लगा, 
 
बिंदी टाँक दी
सिंदूरी धूप खिल गई, 
 
सपनों को मुक्त कर दिया
नयनों से
तारे झिलमिला उठे,
 
नित नयी निहारिकायें रची
अनलिखी कविताओं के
अबोले शब्दों से,
 
आओ! संभावनाओं का नया ब्रम्हांड 
प्रतिक्षारत है...
सिर्फ तुम्हारे लिए...
 
  #3#
 
तम के विपक्ष में
 
निसंदेह अंतरिक्ष में
अंधेरा ही प्रतीत होता है
हर समय,
किंतु सत्य तो यह है कि
अनादि काल से 
अनवरत चल रहा है
प्रकाश का अनंत आवागमन 
एक अंतहीन अज्ञात 
गंतव्य की ओर,
 
बस वहाँ फैला अक्षुण्ण निर्वात
परावर्तित नहीं होने देती
अगणित असंख्य किरणों की 
एक भी तार
हमारी दृष्टि तक,
और हम स्वीकार लेते हैं
अंधकार की सत्ता को,
 
ठीक हमारे शासकों के
हृदय की भाव-शुन्यता
पर्याप्त रोशनी के बावज़ुद
गहन कर रही है तिमिर को
हमारे समक्ष,
 
इस निर्वात में उपस्थित नहीं
जब तक
करुणा, संवेदना, मनस्ताप,
भावोद्गार जैसे कुछ पदार्थ,
तो क्यूँ न साथी 
तम के विपक्ष में
कोई उपग्रह स्थापित करें हम
इस शुन्य में,
जो भले ही स्वयं दैदिप्यमान न हो
फिर भी चन्द्रमा की तरह
कुछ उजालों को मोड़ सके 
हमारी दृष्टि तक,
कण-कण में वितरित कर सके चाँदनी
कब तक सुर्योदय की
अपुरणीय प्रतिक्षा में भ्रमित 
हाथ पर हाथ धरे 
बैठे रहेंगे हम...
 
    #4#
 
मैं सुंदर हूँ
तो क्या हुआ
गोरी नहीं काली हूँ
कद पाँच फीट से कुछ कम ही सही
 
तुम्हारी भाषा में
मेरी कमर,कमर नहीं कमरा है
दाँत चमचमाते नहीं
थोड़े टेढ़े-मेढ़े हैं
होंट मोटे
नथुने फैले से हैं
घना काली लहराती जुल्फे भी नहीं
गालों पे डिंपल की जगह
पिंपल्स हैं
नज़रे हिरणी सी न सही
नज़रिया फिर भी सुंदर है
 
और मैं भी सुंदर हूँ
मेरा मन सुंदर है
और आत्मा भी
मैं नहीं मानती
तुम्हारे बनाई सुंदरता की सीमायें
मैं असीम सुंदर हूँ
 
अगर कुछ बदसुरत तो
वो तुम्हारी नियत है
तुम कितना भी कुरूप कह लो मुझे
मज़ाक उड़ा लो मेरा
भद्दी फब्तियाँ कस लो
जानती हूँ, मौका पाते ही
बाज़ नहीं आओगे तुम
मेरी छातियों पे हाथ फेरने से
कमर पे चिकोटी काटने से
गर्दन पे दाँत गड़ाने से
 
और मेरे विरोध करने पे
जला दोगे एसिड से
मेरा चेहरा
ठूँस दोगे मेरी योनी में
कीलें, काँच के टुकड़े
या धिपा हुआ सरिया...
                  
#5#
 
तानाशाही के दौर में 
सच कहना सबसे बड़ा अपराध है 
सत्ता की आलोचना देशद्रोह,
और चाटुकारिता राष्ट्रभक्ती 
ऐसे में जो कलम बिक नहीं पायी 
बेहद मुमकिन है कि
उसे तोड़ने की पुरजोर कोशिश होगी...
 
हमें बस ऐसे कलम को 
थामे रखना होगा 
पैनी करनी होगी 
विचारों की निब
भरती रहनी पड़ेगी
रक्तयुक्त स्याही...
 
मिटाने को हिटलर, जार, मुसोलिनी के नाम 
लाल करने होगें इतिहास के पन्ने
ताकि लिख सके हम 
मानवता की नई इबारत...
 
#6#
 
फरवरी
 
आकाश का निरभ्र नीलापन
मिट्टी की हरी-हरी सुगंध
माघ की पीली हवा
फागुन की गुलाबी धूप
ख़ुद में घोले हुए
ये रुमानी फरवरी
जब उतरती हैं तुम्हारी आँखो में
तुम्हारी आँखे भांग मिला
दूधिया गिलास हो जाती है...
 
बहकने लगती हैं अनुभुतियाँ
मन झुमता है जैसे
बसंती हवा में पगलाता
मंजरों से लदबद
जर्दालु के बगीचे
और कोयल की कूक
बन जाती है 
मेरे तुम्हारे समागम 
से फुटी सिसकारी...
 
प्रेम में रुमान जब
होता है चरम पर
तभी दस्तक दे देता है
ये निगोड़ा मार्च 
बच्चों के एग्जाम्स
फाइनेंशियल इयर की एंडिग
सालभर का बजट
और रोमांस का बंटाधार...
 
साल का सबसे ख़ूबसुरत 
ये प्रेम का महीना
बस अट्ठाइस का क्यों है.....  

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