सीमा संगसार की पांच कवितायेँ

कविता 1: नमकीन आँसू 
आँसू होते हैं नमकीन
क्योंकि दुख नहीं होते कभी
गुड़ जैसे मीठे !
 
एक औरत का दुख
मथनी से मथा होता है
जो अपनी सारी जिम्मेदारियाँ 
निभाते हुए
अपने लिए बनाती हैं 
थोड़ी सी जगह
मक्खन की तरह
ऊपर उठने के लिए ---
 
जीवन की रस्सा कशी से
उपजे अपनी सारी कड़वाहट को
वह मट्ठे में बहा देती हैं 
 
दूध से घी बनने तक के सफर में
औरतों को जलाना पड़ता है अपने आपको
 
बहती नदियों की तरह
स्त्रियाँ गर रूक जाए तो
रूक जाएगी समूची सदी
इतिहास भी कालकलवित हो जाएगा
 
सारे नदियों का संताप 
गर समुंदर में घुल जाए 
तो क्यों न हो समुंदर का पानी खारा 
 
कविता 2: मासूम जनवरी
नववर्ष का पहला महीना
नया साल , नया दिन 
नए लोग और इस नई दुनिया में
तुम्हारा पहला कदम
 
मेरे बच्चे 
तुम मेरी पहली कविता हो
जिसके सृजन हेतु
पहले प्यार के मानिंद
कविता का जन्म हुआ हो 
 
जब पीड़ाएँ दुख के साथ
सम्भोग करती हैं 
वहाँ रति सुख नहीं 
आत्मप्रवंचना अधिक होता है
 
अमूर्तन शब्द 
इतनी पीड़ाएँ देती हैं 
जितनी की कोई भूख से तड़पता बच्चा
चीखने में पूर्णतः असमर्थ हो ---
 
ईसा के सलीब पर 
टांगे जाने पर 
रक्त की दो पतली धारा बही
और / चेहरे पर निस्तब्धता थी
मेरे बच्चे 
मरियम ने फिर से ईसा को जन्म दिया
तू भी ईसा की तरह शांत है
जब तुमने इस दुनिया को झांका
तब जबकि सभी रोते चीखते हैं 
तुम जीसस की तरह मौन थे ---
 
इंतजार शब्द धूमिल पड़ते गए
मेरे शब्दकोष से
जब तुम " माँ " बोलने में
असमर्थ रहे
कई वर्षों तक
 
मेरी आंखें पथरा गई
मेरे कान बहरे हो गए
तुम्हारे शब्द सुनने तक
 
मैं चीखती रही
पाषाण मूर्तियों के आगे
और/ तुम सुनते रहे
चुपचाप मेरा रूदन
माँ  शब्द की प्रतिध्वनि
टकराती रही 
मंदिर के घंटो से----
 
कविता 3
तुमने मुझे चमत्कृत किया
अपनी असामान्य हरकतों से
लोग कहते हैं कि तू 
विशेष बच्चा है
हाँ मेरे लिए तो तुम
एक नायाब तोहफा ही ठहरे
जिसने मुझे कभी 
समझदार बनने ही न दिया
तुम बच्चे बने रहते हो 
सोलहवें वर्ष मे भी 
और / मैं भी तुम्हारे साथ
बच्ची बन जाती हूँ 
इस उम्र में भी ---
 
बस्तों की दुनिया से इतर
तुम समझते हो ईशवी और अंकों की बातें 
अचंभित होते हैं लोग
तुम्हारी विलक्षणता से
और / तुम हँस रहे होते हो मुझे देखकर
 
कविता 4
मैं अब समझने लगी हूँ 
तुम्हारी इस रहस्यमय हँसी में
छिपे उसके मायने को
यह दुनिया जो पागल है
सामान्य को असामान्य बना देते हैं 
जबकि ये लोग खुद अराजक हैं 
तुम हँसते हो उनकी मंद बुद्धि पर
और / मैं भी शामिल हो जाती हूँ 
तुम्हारी इस शैतानी पर
मेरे बच्चे
सांप सीढ़ी के इस खेल में
सीढ़ी चढना ही नहीं होता 
सांप के डंसने का भी डर होता है
मैं डरती हूँ तुम्हारे लिए
और/ फिर तुम 
एक मासूम सी हंसी बिखेर देते हो 
मेरे कंधों पर हाथ रखकर
देते हो दिलासा 
मैं जीत जाउंगा जंग
एक दिन माँ 
 
कविता 5
उम्मीदों के ललछौंहे सपनों में
मैं अक्सर देखती हूँ 
तुम्हें उंची छलांगे लगाते हुए
बाजों से पंजा लड़ाते हुए
अपनी दुनिया में
दखलंदाजी देते हुए
दाखिल हो जाते हो 
धड़ाम से
 
मेरे बच्चे
जैसे माँ शब्द सुना मैने
देर से ही सही 
ठीक वैसे ही 
मुझे यकीन है
कि तुम जीत जाओगे
यह रेस भी 
मैं दौड़ रही हूँ 
तुम्हारे साथ - साथ
हर कदम पर 
ताल से ताल मिलाकर 

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