स्मिता सिन्हा की पांच कवितायेँ

(1)
अब इसका निर्णय
कौन लेगा 
कि तुम सही हो 
या गलत 
इस विभ्रम   की स्थिति में 
जब तुम ही प्रेक्षक हो 
इस कालचक्र के 
जहाँ वक़्त जकड़ा हुआ है 
तुम्हारे ही तर्कों में 
उस एक वक़्त में जब 
तुम्हारा ही एक तर्क 
तुम्हें सही साबित करता है 
और दूसरा गलत 
जब तुम स्तब्ध होते हो 
होते हो आशंकित 
विवर्तों में घिरे 
और 
इस निर्लिप्त 
संवादहीनता की स्थिति में 
जब तर्कों की लड़ाई जारी है 
एक संयमित स्पष्ट मौन ही 
तुमसे अपेक्षित है 
क्योंकि इसके आगे भी 
हर परिणाम में तुम ही होगे 
जीत में भी तुम 
हार में भी तुम..........
 
(2)
दरअसल ये सिर्फ तुम्हारी सोच थी 
कि ये लड़ाई उनके बीच की है 
और तुम हो निर्णायक भूमिका में 
देखा तुमने 
कैसे खड़े थे वे आमने सामने 
अपने अपने परिकल्पित सच को लेकर 
तमाम संदर्भित विमर्शो के साथ 
ऐसा सच 
जिसके तलुवों से लहू रिस रहा था 
और जो लगातार बना रहे थे 
सदियों तक अमिट रहने वाले 
सैकड़ों रक्तरंजित पदचिन्ह 
तुम्हारी नज़रों के सामने
 टूट टूटकर बिखरता रहा सच 
और तुम बस खामोश देखते रह गये 
 
आज जब वक़्त बेचैन है 
और बेबस भी 
तुम यूँ नेपथ्य में नहीं रह सकते 
क्योंकि शुरू से अंत तक 
सिर्फ़ तुम ही अभिमंचित रहे हो 
इस कथानक में............
 
(3)
कुछ  नहीं   बदलता 
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उस रोज़ देखा मैंने 
तुम्हें खुद को धोते ,
पोंछते ,चमकाते 
करीने से सजाते हुए 
कितने व्यस्त थे तुम 
खुद को बचाने में 
जबकि तुम्हें बचाना था 
अपने वक़्त कि 
कई कई नस्लों को 
कुछ नहीं बदलता 
गर तुम रहने देते 
अपनी कमीज़ पर 
काले गहराते खून के धब्बे 
और सहेजते बाकी बचे
खून को बहने से 
लेकिन कलफ लगी 
झक्क सफ़ेद कमीज़ पहनना 
ज़रूरी लगा तुम्हें 
कुछ नहीं बदलता 
गर तुम रुकते थोड़ी देर 
और सिखाते उन कदमों को 
चलने कि तमीज 
लेकिन जूतों का नाप लेना 
ज्यादा ज़रूरी था तुम्हारे लिये 
 
तुम्हें पता है 
जब तुम कर रहे थे 
अपनी अपनी शक्लों की लीपापोती 
ठीक उसी वक़्त 
गहरे तक खरोंची जा रही थी 
कहीँ इंसानियत 
हैवानियत उफान पर था 
देखो तो जरा 
खून में लिपटे
उन ठंडी पड़ी गोश्त के टुकड़े
तुम्हारे नाखूनों में तो 
फँसे नहीं पड़े हैं 
जाओ धो डालो इन्हें भी 
समय रहते ही 
बेहद ताजे व जिंदा सबूत हैं 
ये तुम्हारे खिलाफ़ 
बोल उठेंगे कभी भी.................
 
(4)
उस दिन कितने विश्वास से 
पूछा था तुमने 
"माँ ,तुम सबसे ज्यादा मज़बूत हो न !
तुम तो कभी नहीं रो सकती ।"
और 
मैं बस मुस्कुरा कर रह गई 
तुम्हें पता है 
उस दिन 
उसी वक़्त 
मैंने छुपाई थीं 
कुछ बूँदें 
जो आँखों की कोर से 
छलक पड़े थे 
हो तो ये भी सकता था 
कि मैं रोती तुम्हारे सामने 
फूटफूटकर 
समझाती तुम्हें कि 
रोने का मतलब 
कमज़ोर होना नहीं 
पर मैं चुप रही 
तुम्हारा विश्वास बचाना 
ज़रूरी लगा था मुझे 
उस दिन.............
 
(5)
हस्तक्षेप 
------
ज़रुरी होता है चलते चलते 
रुककर ठहरकर 
अपने आस पास देखना 
क्योंकि अक्सर ही छूट जाते हैं 
हम जैसे लोग इस भीड़ में अकेले 
रह जाते हैं शेष 
कुछ साझे रास्तों पर 
कुछ साझे क़दमों में !

हाँ ज़रुरी होता है 
सच और सपनों के
बीच के फ़र्क को जानना 
पहचानना परछाईयों को 
अंधेरों में गुम होने से पहले 
क्योंकि अक्सर ही 
मुखौटों के पीछे पाये जाते हैं 
स्वांग भरते कुछ किरदार 
हमारे करीब के दृश्यों में ,
रंगो में ,रौशनी में !

और हाँ 
यह भी ज़रुरी होता है कि 
हम हों बेहद शांत, सुव्यवस्थित 
उस विरुद्ध प्रश्नकाल में भी 
और धीरे धीरे निगलते जायें 
उन सभी शब्दों को 
जो चाहते हों चीखना
हमें नये सिरे से परखना 
क्योंकि आज नहीं तो कल 
यही शब्द उठेंगे हमारे खिलाफ 
और करेंगे हस्तक्षेप हमारे होने पर भी........

 
________________________
स्मिता सिन्हा, स्वतंत्र पत्रकार , फिलहाल रचनात्मक लेखन में सक्रिय 
शिक्षा : एम ए (एकनॉमिक्स ),पटना, पत्रकारिता (भारतीय जनसंचार संस्थान ), बी एड (कुरुक्षेत्र विश्विद्यालय )
विभिन्न मीडिया हाउस के साथ 15 से ज्यादा वर्षों का कार्यानुभव ,
एम बी ए फेकल्टी के तौर पर विश्वविद्यालय स्तर पर कार्यानुभव ,
प्रकाशित काव्य संग्रह : हिन्दी युग्म द्वारा प्रकाशित "सौ क़दम "
'कथादेश 'आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित 
संपर्क: smita _anup @yahoo.com

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