आत्माएं चकित हैं

कवि और व्यक्ति सदाशिव श्रोत्रिय की ख़ास बात है कि उन्होंने अंगरेजी भाषा और साहित्य पढ़ते-पढ़ाते हिंदी में बेहद आत्मीय और विचारक भाव के साथ कविता रची है| दूसरी बात यह  कि वे एक कस्बाई स्थान पर रहकर कविता कर्म में संलग्न  रहे | कभी उन्होंने यह नहीं सोचा कि कविता के प्रचार—प्रसार के लिए किसी महानगर में जाकर बसा जाय ,जहां आगे जाने के लिए कई तरह की साहित्येतर संपर्क-सीढियां सहज सुलभ हो जाती हैं | कुछ भी हो कविता को अपने जीवन का एक ध्येय और सार्थक कर्म मानते हुए वे कविता लिखते रहे |उनको अपने साहित्यानुरागी पिता से साहित्य का संस्कार हासिल हुआ, जिसे उन्होंने बड़ी शिद्दत से संजोकर रखा ही नहीं, विकसित भी किया| वे अपनी आयु के पिचहत्तरवें पड़ाव पर आज भी राजस्थान के मेवाड़ अंचल के एक सांस्कृतिक कस्बे  नाथद्वारा की एक गली  में रहकर अपने इस संस्कार की रक्षा ही नहीं कर रहे हैं वरन इसका निरंतर पल्लवन भी कर रहे हैं| वे प्रकाशन के मामले में अत्यंत संकोची रहे क्योंकि अपनी अवस्था के पिचहत्तरवें साल तक आते आते कुल जमा उनकी कविताओं के दो संग्रह आ पाए  हैं | पहला संग्रह “ प्रथमा “ नाम से १९८६ में आया था, दूसरा “बावन कवितायेँ “ शीर्षक से अभी पिछले साल २०१५ में आया| इस संग्रह में उनकी एक कविता है---बचते हुए | यह कविता उनके और उनकी कविता के स्वभाव और उनकी दिशा को बतलाने में सहायक का काम करती है| कविता में बहुत दिनों तक कुछ बातों को बचाने की बातें चली थी| किसी ने प्रेम को बचाने की कही तो किसी ने गुस्से को लेकिन शायद ही किसी ने खुद कुछ चीजों से बचने की बात कही हो| सदाशिव जी कुछ बातों से खुद को बचाने का एक चिट्ठा बनाते  हैं | जैसे वे कहते हैं कि प्रतिदिन यात्रा करते लोगों को स्वयं को चोरों, डाकुओं, गुंडों के साथ अफसरों और मुलाज़िमों से  बचाना पड़ता है| यहाँ उनके मन की गहरी पीड़ा ही व्यक्त नहीं हुई है वरन वह चिंता भी है जो एक विवेकशील व्यक्ति को अपनी रोजमर्रा की जिन्दगी में होती रहती है | सोचने को मजबूर होना पड़ता है कि ये कैसा समाज है जिसमें हर विवेकशील प्राणी को कई तरह के सम्बन्धों से बचने या स्वयं को सावधानीपूर्वक बचाने की जरूरत रहती है | हर रोज जैसे एक सामान्य  व्यक्ति स्वयं को कई तरह से आने वाली मौतों से बचाता है| हालात यहाँ तक हैं कि आपको अपनी सोचने-समझने की आज़ादी के लिए मारा जा सकता है| यही वजह है कि लोग अपना आज़ाद ख़याल व्यक्त करने से डरते हैं | इसके बावजूद कवि  हताश नहीं, प्रकृति से सीखने समझने का दृष्टांत वह  “ विजयिनी“ जैसी  कविता लिखकर देता है| इस प्रक्रिया में जीवन के छोटे छोटे दृश्य, संवाद, मिलन, प्रभाव उनकी कविता में सहज अंकित होते चले  जाते हैं |

इस संग्रह की पहली कविता है ----निर्वासित आत्माएं | कविता अपने समय की एक गंभीर चिंता से पाठक को जोडती है |आत्माओं का जबर्दस्त निर्वासन आज की व्यवस्था में हुआ है| जहां दुनिया की सारी ताकत खरीददार के हाथों में आ चुकी है |जिसके हाथों में पूंजी है वह कुछ भी खरीद सकता है न्याय, सौन्दर्य, प्रतिष्ठा, सम्मान सब कुछ | कवि कहता है ----

सीताफल के सारे पेड़ ठेके पर उठ गए हैं

दुर्लभ से दुर्लभ जगहों पर भी

भारी जेब वालों को उपलब्ध हैं

जलपान गृह  और सुविधाएं |

कवि कई जगह प्रतीकों के माध्यम से श्रोत्रिय जी बात करते हैं जैसे एक स्थान पर वे चिड़िया को लाकर उससे जीवन की खुशी और उदासीनता दोनों का बीजगणित एक साथ बतलाते हैं |हमारे जीवन में खुशी और शान्ति एक चिड़िया की तरह हैं |इस चिड़िया का अपना बीजगणित है |एक कविता में वे बतलाते हैं कि मकान जिसमें हम रहते हैं, समय से हमारा रिश्ता तय करता है | इस तरह वे अपने अनुभवों के माध्यम से हुए अहसासों से  कविता करते हैं |वे सामाजिक---आर्थिक रिश्तों में कविता को ज्यादा नहीं फैलाते इस वजह से उनकी कविता का दायरा उनके अपने व्यक्तिगत भावावेश और निजी विचार---प्रक्रिया तक सीमित रहता है | कविता उनके लिए अहसास की तरह है , कोई बहुत सजग प्रयास नहीं |यद्यपि अहसासों में भी व्यक्ति विवेक और उसकी चेतना की कम भूमिका नहीं होती | एक कविता में वे अपने द्वारा रोजमर्रा की जिन्दगी में किये जाने वाले छोटे छोटे विश्वासघात को दर्ज करते हैं| वे मानों बतलाना चाहते हैं कि हम एक विश्वास भरी  जिन्दगी नहीं जी पा रहे हैं | इस तरह से वे कविता में आज की व्यवस्था से उत्पन्न होने वाले तनावों को दर्ज करते चलते हैं| यह वास्तविकता भी है कि इस समय सबसे अधिक जोखिम विश्वास जैसे सम्बन्ध---भाव पर है | रोशनी कविता में वे मयदानव की आयातित जादुई रोशनी की तरफ इशारा करते हैं| इस संग्रह में उनकी एक कविता है ---मंसूबा | यहाँ धरती उनका आदर्श है जहां वे कहना चाहते हैं कि हम यानी जन  स्वयं भूमि में तब्दील हो जाय, तभी इंसानियत फलवती हो सकती है | वे इस सृष्टि में प्रकृति जैसे जीवन के पक्षधर बनकर जीने की सलाह देते हैं जैसे सेमल का पेड़ और उसका पूरा जीवन चक्र |कुछ ऐसा ही हो मनुष्य का जीवन | इस तरह की भाव एवं विचार प्रक्रिया में सदाशिव जी की कविता आकार ग्रहण करती है| एक गहरी निजबद्धता उनके यहाँ कविता में है |उनके व्यक्ति से समाज का जितना सरोकार है उतनी ही उनकी आशा---आकांक्षाएं उनकी कविता का विषय बनंती हैं |एक कविता में उन्होंने बहुत सही कहा है कि ------

जो सबके मन की जानेंगे

जो सबको अपना मानेंगे

वही बचायेंगे इस जग को

हरी जमी को नीले नभ को |

इन कविताओं में कई तरह की स्मृतियाँ हैं और कवि द्वारा बिताए गए दिनों की स्वाभाविक यादें हैं| ये यादें ही जैसे आज की दिक्कतों का विकल्प हैं | सदाशिव जी की कविताएं न कोई लम्बी प्रस्तावना बनाती हैं, न ही उनके यहाँ भावों का आतंरिक विस्तार होता है| वे अपने मन पर अंकित प्रभावों को  छोटी छोटी कविताओं में रख देते हैं | जैसे उनकी एक छोटी सी कविता है –व्यक्तिगत| इस कविता की खासियत यह है कि इसके अनेक ध्वन्यर्थ हैं जो कविता को पढने के बाद पाठक को बहुत कुछ सोचने को मजबूर कर सकते हैं | समय और व्यवस्था का इस हद तक निजीकरण कर देने के प्रयास चल रहे हैं कि सामजिकता—सामूहिकता पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं |हालात यहाँ तक आ पहुचे है कि अब हरेक को अपनी नदी और अपना झरना चाहिए -------

हर एक को

अब चाहिए

अपना स्वयं का एक झरना  ,

एक जंगल,

एक अपनी नदी,

हर एक को अब चाहिए एक पालतू चीता ,

स्वयं का धर्मगुरु कोई ,

अनूठी किस्म का

अपना गुलाब |

ऐसी आकांक्षाओं के समय में जो भी नयी बस्ती बसती  है, उसकी परिणति होती है नवनिर्मित सडकों पर रुकी पडी नालियों से गंदे पानी का बहना | नयी बस्तियां शीर्षक से लिखी एक कविता इस समय की गंदगी को जैसे  जाहिर करती है | यह किसी भी तरह से कोई निर्मल समय नहीं |इस वजह से बार बार कवि अतीत की तरफ लौटता है और धोरों में बहते पानी की याद करता है | कवि की भाषा में यद्यपि बहुत विविधता नहीं है लेकिन बीच बीच में जब कोई स्थानीय शब्द आ जाता है तो कविता का रंग रूप ही नहीं उसके अर्थ में भी कुछ अलग तरह का वजन आ जाता है | स्थानीयता का और गाढा रंग होता तो इस कविता का अपना रंग और गाढा होता | बहरहाल अपने इस समय के सम्बन्धों के प्रति कवि का गहरा असंतोष इन कविताओं में उजागर हुआ है |ये आज की जरूरी कविताओं की कोटि में आती हैं |

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बावन कवितायेँ - सदाशिव श्रोत्रिय

सादाशिव प्रकाशन, नाथद्वारा

मूल्य - 200

सपर्क: जीवन सिंह (jeevanmanvi19@gmail.com)

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