समीक्ष्य पुस्तक: गीतांजलि श्री की प्रतिनिधि कहानियाँ

कहने की ज़रूरत नहीं कि गीतांजलि श्री हमारे समय की एक बेहद संवेदनशील भाषा-संपन्न और सशक्त या कहें कुछ विशिष्ट अंदाज़ की कहानीकार हैं। प्रतिनिधि कहानियाँ के नाम से आया उनकी कई चर्चित कहानियों (कुल ग्यारह कहानियाँ) का प्रस्तुत संग्रह कई मायनों में महत्वपूर्ण है। इन कहानियों के अंतर्पाठ में एक खास तरह का सामाजिक-सांस्कृतिक आलोड़न है जिसे हमारे ही परिवेश और समय से उठाए गए अलग-अलग तरह के कथा-चरित्रों के माध्यम से उभारा गया है। उनकी कहानियों में पात्रों के निरपेक्ष और डिटेल्ड-चरित्र-चित्रण हमॆं ख़ास तौर पर आकर्षित करते हैं। कथा के घटनाक्रम से अधिक वहाँ पात्रों के मनोभावों पर और उनके अंदर चल रहे अंतर्द्वन्द्वों को पकड़ने की कोशिश है। इसी बिंदु पर गीतांजलि की कहानियाँ, कहानी के अपने पारंपरिक स्वरूप से भिन्न ठहरती हैं और कदाचित कुछ विशिष्ट भी। किसी कुशल गोताखोर सा अपने पात्रों के भीतर गहरे उतर उनके कई अनदेखे पहलुओं को सामने लाकर वे किसी विषय/समस्या विशेष को कई कोणों से छूना चाहती हैं, जिसकी प्रभावी रचनात्मक अभिव्यक्ति सहज ही उनकी इन कहानियों में देखने को मिलती है।

‘बेलपत्र है तो प्रेम और विद्रोह की कहानी, जहाँ दो अलग-अलग धर्मों से आए ओम और फातिमा एक-दूसरे से शादी तो कर लेते हैं मगर छोटी-छोटी बातों को लेकर न चाहते हुए भी क्रमशः उन दोनों की गृहस्थी में कुछ ऐसे अप्रिय माहौल बन जाते हैं, जिनके बीच उनके आपस का समायोजन टूटने-बिखरने लगता है। गीतांजलि ने इसी टूटन को बड़ी बारीकी से अपनी कहानी में चित्रित किया है। स्पष्टः इस कहानी के पीछे कहीं-न-कहीं यह मंतव्य भी छुपा हुआ है कि दो लोग व्यक्तिगत स्तर पर चाहे जितना सीमित और अकेले रहने की कोशिश करें, समाज की दस्तक और उनका हस्तक्षेप गाहे-ब-गाहे उनके जीवन में और उससे भी बढ़कर उनकी सोच में दाखिल हो ही जाता है। अपने मायके से बिल्कुल भिन्न एक दूसरे धार्मिक माहौल में रहते हुए और अपने ऊपर सशंकित नज़रों के अनवरत पहरे से प्रतिक्रिया-स्वरूप उत्पन्न फातिमा के अंदर की झुंझलाहट क्रमशः बढ़ती चली जाती है और उसी अनुपात में उसकी सहिष्णुता घटती चली जाती है| जो प्रेमी-जोड़ा शुरू में कभी जिन धार्मिक रीति-रिवाजों का उपहास उड़ाया करता था. क्रमशः वही रीति-रिवाज़ कैसे उनको अपने  प्रभाव में लेते चले जाते हैं, यहाँ इस सहज मानवीय दुर्बलता को उघाड़ने की एक कोशिश की गई है। यह ओम से अधिक फातिमा की कहानी है क्योंकि एक भिन्न माहौल मे अपना सबकुछ देकर भी हमेशा एक अनजानी आशंका के बीच देखी जाती फातिमा की संवेदना और कोमलता किस तरह तार-तार होती है....इसे लेखिका ने बखूबी दिखाया है। एक-दूसरे से दोनों की शिकायतें चाहकर भी कम नहीं हो पातीं और धर्म की दीवार पति-पत्नी के बीच ऊँची उठती चली जाती है। कह सकते हैं कि अंतर-धार्मिक विवाह करके जो एक बड़ा और साहसपूर्ण कदम उन दोनों ने उठाया था, दैनंदिन जीवन की छोटी-मोटी बातों से परेशान होकर वे दोनों अपनी उस जीत को हार में बदल देते हैं। यह कहानी व्यक्ति  से शुरू होकर समाज की ओर; प्रेम से  बढ़कर प्रेम के अंत की ओर, मूल्य और विश्वास से बढ़कर रुढ़ि और अंधविश्वास की ओर जाती है जहाँ  अंततः बेमानी समझौते, बिखराव और मोहभंग ही कुल हासिल हैं। स्पष्टतः  गीतांजलि अपने पात्रों के अकेले पड़ते चले जाने और उनके अकेलेपन से उत्पन्न विसंगतियों और बिखराव को वाणी देने वाली कहानीकार ठहरती हैं और इस धरातल पर वे निर्मल वर्मा के कुछ क़रीब भी दिखती हैं।

गीतांजलि श्री के कहानीकार की यह विशेषता है कि उनके कथा-पात्रों के मन की गाँठें बहुत स्वाभाविक ढंग से और क्रमवार खुलती हैं और यह खुलना अंतर्  एवं बाह्य दोनों स्तरों पर एक साथ होता है। जहाँ प्रकट या कहें सामान्य रूप में कहानी के तत्व पाने मुश्किल हैं, वहाँ वे पात्रों के अंतर्मन में प्रवेश करती हैं और उनके अंतर्द्वंदों को इस तरह उठाती हैं कि कहीं दबे-पड़े उन झंझावातों में किसी के व्यक्तित्व के आरोह-अवरोह से पाठकों का सहज साक्षात्कार हो पाता है और उन्हें कहानी से कुछ न दिखते प्लॉट में कहानी की रोचकता भी प्राप्त होती है। व्यक्ति के किसी ऐसे ही अंतर्मन के प्रसंग को लेकर वे अपनी कहानी का प्लॉट उठा लेती हैं। इस तरह घटनाक्रम से इतर मनोभाव के स्तर पर भी उनके यहाँ कहानियों का समुचित निर्वहन संभव हो पाता है। संग्रह की कहानी अनुगूँज और दरार ऐसी ही कहानियाँ हैं। ‘अनुगूँज’ में दांपत्य जीवन की निरसता से उत्पन्न बोरियत और एक दूध वाले के सुडौल देहयष्टि के प्रति एक संभ्रांत स्त्री का आकर्षण है तो वहीं ‘दरार’ में अकेले जीने को अभिशप्त एक पुरुष की कुंठाजन्य गतिविधियों को उसके मन के वीराने और घर के बिखराव में पकड़ने की कोशिश है जहाँ वह अपने घर के गैराज में रह रहे अपने बैरे की बीवी के कुछ अंतरंग कपड़ों के स्पर्श से एक सुखद रोमांच से भर उठता है। देखा जाए तो ‘दरार’ कल्पेश के बड़े और पुराने स्टाईल के बंगले की छत में आया हुआ नहीं है बल्कि इससे कहीं बड़े दरार स्वयं उसकी अपनी ज़िंदगी में जाने कब से पड़े हुए हैं। बरसात की रात में छत से पानी का टपकना तो एक प्रतीक है,  दरअसल यह रिसाव स्वयं उसके अपने जीवन मे हो रहा है। कहानी की शुरूआत में ही लेखिका इस बात का संकेत करती चलती है:- घर भी उसी की तरह जगह-जगह से चू रहा है!  मनुष्य की अतृप्त काम भावना को संकेत में प्रकट करती यह कहानी अंततः अपने प्रभाव में कारुणिक ठहरती है।

‘अनुगूँज इस ‘प्रतिनिधि संग्रह’ की पहली कहानी है। उल्लेखनीय है कि इस कहानी के नाम से उनका एक संग्रह पहले आ चुका और चर्चित हो चुका है। ‘अनुगूँज’ को पढ़ते  हुए अज्ञेय की ‘रोज़’(‘गैंग्रीन’) कहानी भी सहसा याद हो आती है। दोनों ही कहानियों की नायिका पढ़ी-लिखी स्त्री है और एक गृहिणी  के रूप में उसका काम घर मे सजना-सँवरना और दफ्तर से लौटकर आते अपने पति का इंतज़ार करना भर है। ‘रोज़’ में दैनंदिन जीवन की नायिका  की बोरिअत अनुगूँज की ‘मुनिया’ की ही तरह की है मगर दोनों जगह एक ही थीम के साथ अलग-अलग ट्रीटमेंट की गई है। हालाँकि दोनो कहानीकारों का उद्देश्य एक है और वह है आधुनिक भारत में भारतीय मध्यवर्ग के परिवारों में घरेलू स्त्रियों की स्थिति को दर्शाना...जहाँ स्त्रियाँ अभी भी बंद कमरे में या तो घुटन का शिकार हो रही हैं या फिर वे ड्राइंग-रूम की शोभा मात्र बनी हुई हैं| गीतांजलि अपनी इस कहानी में स्त्री के अंदर की फैंटेसी और उसके विचलन को सहजता और साहस के साथ बेलौस रख पाई हैं।

स्पष्टतः किसी भी कहानी का सबसे ताकतवर पक्ष उसकी भाषा होती है जिसमें युगानुरूप विचारों को नए तेवर और नई भाव-भंगिमा के साथ प्रस्तुत किया जाता है।‘रोज़’ की नायिका हर एक घंटे पर बजनेवाले घंटे की आवाज़ सुनकर एक आह भरकर रह जाती है, जिसकी ‘अनुगूँज’ पाठक के मन में लंबे समय तक घर किए रहती है। बर्तन धोते हुए तो कभी अखबार की कतरन पढ़ते हुए मानो उसकी हर क्रिया-विधि में किसी तरह न कटते दिन को किसी निमित्त काटना भर है। इस एकरस या कहें अनुर्वर दैनिक-चर्या को ही अज्ञेय ने ‘गैंग्रीन’ की संज्ञा दी जिसका शिकार व्यक्ति का कोई अंग-विशेष नहीं बल्कि स्वयं वह व्यक्ति है। गैंग्रीन कहानी का प्रभाव जितनी देर और जिस सघनता में पाठक पर रहता  है, अनुगूँज का प्रभाव उसकी तुलना में बेशक कमतर है मगर मुनिया के चरित्र में एक मामूली विचलन को दिखाकर गीतांजलि इस पूरी कहानी का प्रभाव या कहें उसका तेवर बदल देती हैं। यहाँ स्मृतियों का इस्तेमाल बखूबी किया गया है जिसमें पास में थके सोए पति को ‘ओवरलैप’ करते  मुनिया के जेहन में दूधवाले की बरसात में भीगी देहयष्टि कब्जा जमा लेती है।     

आलोचक जिन्हें गीतांजलि श्री की कहानियों में एक ‘सिग्नेचर-ट्यून’ के रूप में देखते हैं, वह है  उनकी कहानियों की भाषा, कथानक और उनके पात्रों के मनोजगत के साथ लिपटी एक खास किस्म की दार्शनिकता, अल्हड़ता और उसकी रवानगी। फिर चाहे उम्रदराज़ लोगों में पनपते और विकसित होते मृत्यु-भय का चित्रण हो या फिर पति-पत्नी के बीच टूटन या मनमुटाव का जिक्र हो या फिर भरपूर जीवन जीनेवाली एक लड़की/स्त्री का तेरहवीं मंजिल से कूदकर आत्महत्या करने के पीछे का प्रसंग और उसका रहस्य, गीतांजलि की कहानियों में  कहानी  के  पारंपरिक प्रवाह  की  कमी  दिखेगी  मगर  उसी  प्रवाह को तोड़कर वह जो एक बाधा खड़ा करती हैं, यहीं से उनकी कहानी का शिल्प तैयार होता है और क्रमशः मुखर होता चला जाता है। जीवन की जिस पेचीदगी और पात्रों के जिस परस्पर-विरोधी या कई बार असंगत, बेतरतीब दिखती विशेषताओं को वे अपनी कहानियों में चित्रित करती हैं, वहाँ इस तरह की गाँठें किसी आसान सड़क पर सरपट दौड़ने वाली हमारी निष्कर्षगामी प्रवृत्ति और उसके प्रति बने हमारे पारंपरिक आग्रहों/.दुराग्रहों को एक झटका देती हैं। जिन छोटी-छोटी विकृतियों, घटनाओं को कई कहानीकार अक्सरहाँ लिजलिजा और महत्वहीन समझ लेते हैं और जानते-समझते हुए भी जिनके बगल से कंधे उचकाकर आगे बढ़ जाते हैं, गीतांजलि उन्हीं प्रसंगों के गहरे जाकर अपने पात्रों का एक संश्लिष्ट और ईमानदार चित्र खिंचती हैं। इससे संबद्ध यह भी कि उनका कहानीकार, किसी व्यक्तित्व के एक छोर या कहें पक्ष के प्रति कोई अतिरिक्त आग्रह नहीं रखता है। इसलिए उनके ज्यादतर पात्र एकदम श्वेत या फिर एकदम श्याम नज़र नहीं आते बल्कि उनका चित्रण ‘ग्रे शेड’ में ही ज़्यादा किया गया है। अगर किसी वृद्ध के साथ उसके घर के लोग (इति कहानी) कोई सहानुभूति रखते हैं तो उसकी विगत तमाम लंपटताओं को जानते भी हैं। अगर उनकी मृत्यु होती है तो रोने-धोने के तमाम उपक्रमों के बीच लेखिका चुपके से उनके आत्मीय जनों के मनोभावों  में घुसपैठ करके यह भी देख लेती हैं कि वहाँ किसी को हमेशा के लिए खो देने के दुःख के साथ-साथ उनके जीवन के कई अप्रिय प्रसंगों की निरंतरता से मुक्त हो जाने की कोई दबी-छुपी राहत भी है। और तब हम पाते हैं कि ऐसा तो हमारे आस-पास के सभी घरों में हो रहा है। निश्चय ही, गीतांजलि ऊपर की हो-हल्ला करती ज़िंदगी के नीचे की शांत और घुन्नी चुप्पी को अपनी रचनाओं में पकड़ने की कोशिश करती हैं। अपनी कहानियों में वे अक्सरहाँ ऐसे तलघरों की बड़े इत्मिनान से खोज-खबर लेती हैं, फिर चाहे वह तलघर हमारे बहुमंजिले मनोजगत का हो या फिर हमारे घर का।

‘भीतराग और पीला सूरज कहानियों में बुढ़ापे की विभिन्न परतों और उसके एक अविभाज्य अंग मृत्युबोध को काफी संवेदनात्मक सघनता के साथ प्रस्तुत किया गया है। भीतराग दो वृद्धों गिरधारीजी और बचवा ठाकुर की कहानी  है या यह कहना ज़्यादा ठीक रहेगा कि यह दो अलग-अलग वृद्ध मानसिकता की कहानी है। शहर में रहते आए और मृत्यु के इंतज़ार में हमेशा सशंकित रहनेवाले गिरधारीजी का सामना जब अपने गाँव के पुराने मित्र बचवा ठाकुर से होता है तो वे उनकी निश्चिंतता (खासकर उनकी बेफिक्र नींद को लेकर) में उनकी मौत की आशंका करके घबरा जाते हैं। दरअसल वे बचवा ठाकुर को लेकर चिंतित नहीं हैं बल्कि यह उनके अंदर का अपना भय है। स्वयं के विपरीत ठाकुर की जीवनशैली उन्हें चौंकाती और डराती है। दो ध्रुवांतों पर खड़े इन दो वृद्धों की कहानी के बीच के मंतव्य को कहानीकार ने सफलतापूर्वक पकड़ा है। कहीं-न-कहीं यहाँ दो जीवन-शैलियों की टकराहट भी नज़र आती है। श्रम के राग से मह-मह करते बचवा ठाकुर और शहर के फ्लैटनुमा माहौल में विलासिता और आराम के जीवन के अभ्यस्त और उनके कुप्रभावों के बीच निरंतर रुग्ण होते चले जाते (शारीरिक और मानसिक दोनों ही धरातलों पर) गिरधारीजी, भीतराग में इन दो धुर छोरों के तनाव को लेखिका ठीक-ठीक उठा पाई हैं। भीतराग के बचवा ठाकुर और जापान की पृष्ठभूमि में लिखी गई कहानी मार्च, माँ और साकुरा की माँ के बीच सहज ही समानता देखी जा  सकती है क्योंकि दोनों ही पात्र जीवन को उसकी सहजता में लेते हुए आगे बढ़ते हैं और इन दोनों वृद्धों के जीवन में एक रफ्तार और खनक है, जहाँ जीवन को उसके अंतिम पड़ाव पर भी भरपूर जी लेने की  मानवीय उष्मा और जिजीविषा का बोध होता है।              

आजकल कहानी का ‘साया’ सांप्रदायिक तनाव से युक्त माहौल के बीच अपने ही घर में एक चोर की तरह घुसता है। यहाँ सांप्रदायिकता अपनी रूढ़ रिपोर्टिंग में उपस्थित नहीं है बल्कि उसकी आशंका मात्र का चित्रण किया गया है। एक भयावह स्थिति के बोध मात्र से एक मुसलमान अपने ही घर में साया बनकर आता है। और वह भी तब जब उसका हिंदू मित्र उसके घर में रह रहा है। अपने रहने की आड़ में वह अपने मुसलमान दोस्त को बचाना चाह रहा है ताकि  उसकी ओट में उसका दोस्त अपने ही घर से अपने जीवन की कुल जमा-पूँजी लेकर चला जाए। स्थिति की भयावहता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि एक व्यक्ति अपने  घर में अपना ही सामान लेने एक चोर की तरह आता है। घबराए हुए दोनों ही मित्र  है। अपने तईं यह कहानी टिप्पणी करती है कि किस तरह एक धार्मिक कट्टरता-युक्त / पूर्वाग्रह-भरे वातावरण में व्यक्ति की या तो कोई निजी पहचान या विशेषता नहीं रह जाती है  या फिर उसकी  सारी पहचान किसी धर्म-विशेष के होने और न होने तक सिमटकर रह जाती है। आज भी शहरों,कस्बों और गाँवों मे किसी अवसर-विशेष और त्योहार-विशेष पर ऐसे किसी उन्माद / दंगे की अफवाह बड़े ही रहस्मय तरीके से उड़ती है। कभी अनजान लोगों के जमावड़े को देखकर तो कभी किसी के घर में देशी बम बनाए जाने की खबरें चुपके से आस-पास की हवा पर सवार अपने आस-पास को सशंकित करती रहती हैं। कहानी के अंत में गीतांजलि का कहानीकार ठीक ही तंज़ कसता है , ....चूँकि  अफवाह उड़ी है कि घर जलेगा और वह भी और वैसे एक को जला देना दोनों को जला देना ही होगा और वैसे ऐसी अफ़वाह उड़ा देना भी दोनों को जला देना है।  मतलब यह कि यह दंगे की नहीं मगर दंगे की अफ़वाह की कहानी है जो हमारे समाज  में बढ़ती पशुता के पैरों तले दबती और कराहती हुई मनुष्यता के क़िस्से सुनाती है।                            

‘कसक संग्रह की एक महत्वपूर्ण कहानी है जहाँ एक पोलियोग्रस्त लड़की स्कूल-कॉलेज की अपनी बिंदास सहेली (अब विवाहित) की आत्महत्या की खबर से विचलित है।यह कहानी उसकी आत्महत्या के पीछे के कारणों की तलाश नहीं करती, बल्कि कभी जीवन से लबरेज़ उस लड़की/स्त्री द्वारा ऐसे किसी क़दम के उठाए जाने के उपरांत अंदर तक बेचैन उसकी सहेली के मनोजगत में जाती है जहाँ वह अपनी उस दिवंगत सहेली को जानने और न जानने को लेकर ही कई सवाल उठा  रही है। तमाम बहस-मुबाहिसों, जीवन जीने, लोगों के काम आने, नौकरी-चाकरी ,’वाद-विवाद-संवाद’ आदि के जाने उससे जुड़े कितने प्रकरणों के विवरण देते हुए ‘कसक’ की कथा-वाचिका ठीक ही कहती है, “….पता नहीं कौन थी,पता नहीं मैं किससे मिली,पता नहीं....। और वास्तव में अगर बहुत तटस्थ होकर देखें तो हम अपने आस-पास ऐसे कितने लोगों को जानते हैं या फिर नहीं जानते हैं, जिनके द्वारा ऐसे किसी आत्मघाती कदम उठाए जाने के बाद सहसा हम यकीन नहीं नहीं कर पाते। हम आश्चर्य में पड़ जाते हैं कि अरे...यह तो ऐसा नहीं था/ ऐसी नहीं थी।

कहा जा सकता है कि स्मृतियों के धागे से करीने से बुनी इस संग्रह की कहानियों में हमारे आसपास का जीवन है, उसकी हार-जीत है, तार्किकता-अतार्किकता है, आशा-निराशा है, मनुष्यों के बीच रंग और नस्ल के नाम पर फैले भेदभाव हैं और इन सबके साथ स्थायी-भाव की तरह लिपटा मृत्युबोध है। गीतांजलि अपनी कहानियों में व्यक्ति-मन के अंदर आलोड़ित होती मौन आहटों को, उसके अंदर के अवसाद और ठहराव को एक सधी हुई भाषा में अभिव्यक्ति प्रदान करती हैं। वे अपने पात्रों के साथ हमें हमारे आस-पास के उन कोनों की ओर ले चलती हैं जिन्हें हम अबतक नोटिस मे नहीं ले रहे थे। भाषा उनकी इस सृजनधर्मिता में एक बड़ी ताकत के रूप में उनके साथ खड़ी दिखती है।

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समीक्ष्य पुस्तक: प्रतिनिधि कहानियाँ

लेखिका: गीतांजलि श्री

पृष्ठ: 164, मूल्य:- रु. 125/-

प्रकाशक:- राजकमल प्रकाशन प्रा.लि.

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समीक्षक- संपर्क :

अर्पण कुमार

नदी के पार नदी और मैं सड़क हूँकाव्य संग्रह प्रकाशित और चर्चित। तीसरा काव्य-संग्रह पोले झुनझुनेनौटनल पर ई-पुस्तक के रूप में उपलब्ध। पहला उपन्यास पच्चीस वर्ग गज़ शीघ्र प्रकाश्य। आकाशवाणी दिल्ली और जयपुर से कविताओं-कहानियों का प्रसारण। महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ, कहानियाँ, लघुकथाएँ, समीक्षाएँ, गज़लें, आलेख आदि प्रकाशित। दूरदर्शन के जयपुर केंद्र से कविताओं का प्रसारण। हिंदी अकादमी, दिल्ली से पुरस्कृत। कई पुस्तकों के आवरण पर इनके लिए छायाचित्रों का प्रयोग।   

ई-मेल : arpankumarr@gmail.com

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