पुस्तक समीक्षा : गुरुजी की खेती-बारी

विश्वनाथ त्रिपाठी हिन्दी के सुप्रसिद्ध आलोचक ही नहीं गद्यकार भी है। ‘ व्योमकेष दरवेष’ और ‘नंगातलाई का गाँव’ जैसी पठनीय और ज्ञानवर्धक गद्य पुस्तकों के बाद त्रिपाठीजी की नई गद्य पुस्तक ‘गुरुजी की खेती-बारी’ भी उसी श्रृंखला की अगली कड़ी प्रतीत होती है। यह पुस्तक अपने विषय के लिये नवीन कही जा सकती है, क्योंकि आम तौर पर विद्यार्थी अपने गुरुजनों, अध्यापकों या उस्तादों के बारे में लिखते रहे हैं, शायद पहली बार ऐसा हुआ है कि एक शिक्षक ने अपने छात्रों और शिष्यों के बारे में इतने विस्तृत और भरपूर ढंग से लिखा है। करीब 16-17 अध्यायों में बँटी इस पुस्तक में लेखक ने अपने अध्यापकीय जीवन के आरंभिक दौर में मिले छात्रों के विवरण से प्रारंभ कर दिल्ली विष्वविद्यालय तक के छात्रों के बारे में विस्तार से चर्चा की हैं। 
 
पुस्तक का आरंभ उन्होंने गुरु-वंदना से ही किया है, जिस में अपने आदि-गुरु पंडित रच्छा राम का जिक्र किया, जिन्होंने उन्हें अक्षर-ज्ञान से परिचित करवाया था। लेखक का पहला शिष्य उस का अपना छोटा भाई था, जिस पर अतिरिक्त रौब डालने के कारण स्वयं पिटने की नौबत आ गयी थी। इस रौब के कारण वो पहला शिष्य हाथ से निकल गया लेकिन शायद लेखक को अप्रत्यक्ष रुप से इस बात के लिये सचेत कर गया कि बिना वजह के रौब-दाब से कोई फायदा नहीं होता बल्कि शिष्य पास आने से भी कतराने लगता है। इसलिये विद्यार्थियों में यदि लोकप्रिय होना हैं तो उन से दोस्ती करनी चाहिये ना कि अपनी विद्वत्ता घोटनी चाहिये। अनजाने में मिली इस सीख का अवचेतन पर ऐसा असर हुआ कि अपने लंबे अध्यापकीय जीवन में त्रिपाठी जी अपने छात्रों के मित्रनुमा शिक्षक बन कर अधिक रहे जो उनके गाँव-द्वार और शादी-ब्याह में भी हिस्सा लेते रहे।
 
अध्यापन जीवन में अनेक तरह के विद्यार्थियों से उन का पाला पड़ा, जिन में शरारती, नटखट के साथ समझदार, योग्य और पढ़ाकू किस्म के विभिन्न छात्र शामिल रहे। कक्षा में दादागिरी दिखाने वाले छात्रों ने उन की सादगी और शराफत के कारण उन्हें तंग करने से गुरेज़ किया तो वहीं कई अत्यन्त योग्य छात्रों की विद्वत्ता का प्रभाव स्वयं कबूल करने में उन्होंने झिझक नहीं दिखायी। किरोड़ीमल कालेज में पढ़ने वाले अनेक छात्रों ने बाद के समय में विभिन्न क्षेत्रों में बहुत नाम और शोहरत कमायी, जिस पर उन्हें गर्व है। 
 
यह पुस्तक सिर्फ़ उनके अपने छात्रों और शिष्यों से ही संबंधित नहीं हैं, लगे हाथ इसमें उनके सहकर्मियों, सहयोगियों, प्रधानाचार्यों और दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दी विभागाध्यक्षों की भी खुले मन से चर्चा की गयी हैं। इस के साथ ही शिक्षा के प्रचार-प्रसार के कारण आते बदलावों, लड़कियों और दलित छात्रों की बढ़ती संख्या, उनकी सोच, दिल्ली की जीवन-शैली, हिन्दी पढ़ने वाले विद्यार्थियों के संकोच, संयम और मानसिकता का विवरण भी किया गया हैं, जिसके फलस्वरुप यह पुस्तक सिर्फ़ उनके अपने विद्यार्थियों तक सीमित ना रह कर दिल्ली विश्वविद्यालय के ल्रंबे सफ़र की साक्षी भी बन गयी हैं। रोचक अंदाज़ में  लिखे संक्षेप विवरण अत्यन्त प्रभावित करते हैं। जो गुरु अपने शिष्य के चरण-स्पर्श कर, उनकी विद्वत्ता और अपनी वादाखिलाफ़ी को स्वीकार करने की हिम्मत रखता है, ऐसा शिक्षक आज की गलाकाट और अंहवादी संस्कृति के दौर में किसी प्रेरणा से कम नहीं हो सकता। गुरुजी की खेती-बारी की फसल बहुत धुआंदार और लहलहाती प्रतीत होती हैं। 
 
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गुरुजी की खेती-बारी / विश्वनाथ त्रिपाठी
राजकमल प्रकाषन, पृश्ठ:120, मूल्यः125/-
 

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