राजेन्द्र रवि की पुस्तक ‘आदर्शवाद के आयाम’ की समीक्षा

भारतीय समाज में रिक्शा और उसको चलाने वाले को हर समय उपेक्षित नजर से देखा जाता है. हमारे समाज में उदाहरण भी दिया जाता है तो यह कि पढ़ोगे-लिखोगे नहीं तो क्या बड़े होकर रिक्शा चलाओगे? यह लोकोक्ति अपने आप में रिक्शे के प्रति हे दृष्टि का परिचायक है. राजेन्द्र रवि की यह पुस्तक ‘’आदर्शवाद के आयाम’’ परिवहन उससे जुड़े लोकतांत्रिक प्रक्रिया, रिक्शा, रिक्शे से जुड़े लोग, साइकिल, पदयात्री के साथ-साथ पर्यावरण से जुड़े मसले पर हमें चिंतन करने को विवश करती है. यह पुस्तक हमें समाज के इन मुद्दों की और ध्यान आकर्षित करती है जो अत्यंत गंभीर होने के बावजूद पीछे छूट गए है. यही नहीं लेखक ने इस पुस्तक के माध्यम से इनसे जुड़ी समस्याओं के निदान का रास्ता भी सुझाया है.

हमारे देश के अन्दर निरंतर बढ़ रही सड़क दुर्घटनाएं और उससे होने वाली जान-माल की क्षति भी बढ़ती जा रही है. साल २०१३ में एक लाख सैतिस हज़ार लोग सड़क दुर्घटना में मारे गए. दिल्ली की सड़क पर हर दिन लगभग 5 लोग मौत की भेंट चढते है. इससे यह समझना कितना आसान है कि सड़क दुर्घटना से भारत को कितना नुकसान हो रहा है. लेखक इस पुस्तक के माध्यम से सड़को के लोकतान्त्रिकरण की बात करते है. सड़क पर दिन-प्रतिदिन कारों, और अन्य मोटर वाहनों के बढ़ने के कारण साइकिल-रिक्शा, पैदलयात्री, साइकिल से चलने वाले लोगों की संख्या सिमटती जा रही है. विकास के नये मॉडल के रूप में बनने वाले फ्लाई ओवरों की बढ़ती संख्या ने इस तरह के सफ़र करने वाले लोगों को और हतोत्साहित किया है. दिल्ली जैसे शहर का आलम यह है कि फूटपाथ तक पर कारों और दुकानों ने कब्जा जमा लिया है. जिससे पैदल यात्री को भी काफी परेशानी हो रही है.

सड़क के लोकतांत्रिक स्वरूप का विकास पर्यावरण की दृष्टि से भी काफी सुरक्षित रहेगा. दिन-प्रतिदिन बढ़ते प्रदुषण का आलम यह है कि उससे बचने के लिए ओड-ईवन जैसे योजना को लागू किया जा रहा है. अगर इस पुस्तक में दिए गए तमाम सुझाव पर चर्चा किया जाए तो बहुत लाभकारी सिद्ध हो सकता है. साथ ही साथ यह पर्यावरण की दृष्टि और रोजगार की दृष्टि से भी बहुत कारगर साबित हो सकता है. विकास का ऐसा मॉडल जिसमे सबकी भागीदारी सुनिश्चित की जा सके. इस दूरदृष्टि के साथ पुस्तक में दिए गए सुझाव अत्यंत लाभदायक है.

इस पुस्तक के माध्यम से लेखक ने अपने अनुभव को भी साझा किया है. एक उदाहरण के माध्यम से बताया है कि कैसे एक रिक्शा चालाक जिसको पूरा समाज हे की दृष्टी से देखता है. लेकिन वह अपने काम का मालिक होता है. जिसमे वह अपने काम करने के समय को तय कर सकता है. जो कि अन्य काम खासकर के मजदूरी करके वह नही कर सकता है.  ऐसा गंभीर विषय जिससे हम हर रोज रूबरू होते है लेकिन इसका हमारे बीच चर्चा में न होना अत्यंत आश्चर्यजनक है. यह भी कहा जा सकता है कि आज के समय में हमारे सामाजिक मुद्दे क्या होंगे? इसका निर्धारण भी बाजार ही करने लगा है. क्योकि उसका कब्जा बड़े-बड़े मीडिया घरानों पर है.

अगर यह प्रक्रिया ऐसे ही चलती रही तो लोकतांत्रिक समाज के लिए शुभ संकेत नही है. यह पुस्तक इस खतरे की घंटी को पूरजोर तरीके से आम नागरिक, सरकार, नौकरशाह आदि तक पहुचाने का कार्य करती है. जिससे विकास के प्रति उनके नजरिए में बदलाव लाया जा सके. और देर से ही सही लोकतंत्र में भरोसा कायम किया जा सके चाहे वह सड़क पर ही क्यों न हो? अंत में इस पुस्तक के लेखक राजेन्द्र रवि को बधाई कि न उन्होंने न केवल इस गंभीर मुद्दे को उठाया बल्कि उसके वैकल्पिक उपाय भी सुझाए.

पुस्तक- आदर्शवाद के आयाम

लेखक- राजेंद्र रवि

पृष्ठ-275

मूल्य- 410

प्रकाशक- सर्व सेवा संघ प्रकाशन, राजघाट, वाराणसी- २२१००१ 

 

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