स्त्री संघर्ष और मुक्ति की दास्ताँ

‘कब्र भी कैद औ जंजीरे भी’ युवा कहानीकार अल्पना मिश्र का यह कहानी संग्रह विविधता से भरपूर और रोचक है। यह मानव जीवन के विभिन्न पहलुओं को उजागर करता है। समाज में मौजूद विसंगतियों पर तीखा प्रहार करती हुई इनकी कहांनियां हमें हकीकत से रूबरू कराती है। हमारा देश आज भले ही विकास का डंका पीट रहा हो मगर आज भी देश में आम जनता व आधी आबादी की स्थिति सोचनीय है। जातिवाद, अशिक्षा, गरीबी, भुखमरी, यौन उत्पीडन, भ्रष्टाचार, घूसखोरी, लचर न्याय और कानून व्यवस्था आज भी वैसी ही है। आमजन आज भी त्रस्त है। पित्रसतात्मक इस समाज में आज भी महिला को कमतर आंका जाता है उन्हें बराबरी का दर्जा अब तक नहीं मिला है। इसके लिए वे संघर्षरत है और अब अन्याय व अत्याचार के खिलाफ आवाज उठा रहीं है। परंपराओं को तोड रहीं है। वे भी पुरूषों की तरह खुली हवा में सांस लेना चाहती है।

गैरहाजिरी में हाजिर यह कहानी एक नौकरी पेशा स्त्री की कहानी है जिसकी अभी नयी-नयी नियुक्ति हुई है मगर अपने रहने के लिए जब वह कमरा तलाशने जाती है तो उसे खासी मश्किलों का सामना करना पड़ता है। एक स्त्रिी वह भी अकेली, हर कोई उसे अपने अनुसार ढालना चाहता है। जाने-अनजाने अपनी इच्छाएं थोपना चाहता है। सारे नियम व कानून या यूं कहें कि समाज ने उसके लिए परंपरा के नाम की बेडियां बनाई हैं जिन्हें वह बरसों से ढोती आ रही है। आत्मनिर्भर होने के बाद भी स्त्री असुरक्षाबोध से मुक्त नहीं हो पायी है। आखिर यह कैसा समाज है, वे कौन सी परिस्थितियां हैं जिनके कारण व्यक्ति इतना मजबूर हो गया है।

‘गुमशुदा’ यह कहानी शहरीजीवन की त्रासदी व विडंबना को जाहिर करती है और एक बछडें की मृत्यु पर समाप्त होती है। जिसके मरणोपरान्त लोग तरह-तरह के कर्मकाण्ड करते है मगर जब वह जीवित होता है तो उसकी ओर कोई ध्यान नहीं देता। एक महिला जो शहर में अभी नई-नई आयी है उसके हृदय में बछडे़ के प्रति संवेदना है मगर शहर की हवा व माहौल ऐसा है कि वह चाहकर भी उस निरीह पशु की मदद नहीं कर पाती। आखिर उसे अपने स्टेट्स का भी ख्याल रखना है। यही स्थिति आज मनुष्य की भी है जब उसे मदद की आवश्यकता होती है तो कोई आगे नहीं आता मगर मरणोपरान्त कर्मकाण्ड में सभी शामिल होते है। वास्तव में आधुनिक स्मार्ट और अलग कहलाने वाला शहरी जीवन पाखंड व प्रपंचों से भरा पड़ा है उसमें मात्र दिखावा है, घुटन है। सामाजिकता का अभाव है।

‘रहगुजर की पोटली’ एक आधुनिक, शिक्षित व आत्मनिर्भर महिला की कहानी है जो सहृदय भी है हांलाकि शहरी लोगों खासकर युवाओं के प्रति यह धारणा होती है कि वे अपने तक सीमित रहते है उनमें संवेदना नहीं होती, नैतिकता का अभाव होता मगर इस कहानी में विरोधाभास है आधुनिक और स्मार्ट दिखने वाली लड़की एक अजनबी व वृद्ध महिला की मदद करती है। कभी-कभी अजनबी भी अपनों से ज्यादा काम आते है। मगर आज एक-दूसरे के प्रति लोगों में अविश्वास व असुरक्षा की भावना घर गई है यह भी आज के समय की विडंबना ही है कि किसी की मदद लेने में भी व्यक्ति संकोच करता है।   

‘महबूब जमाना और जमाने में वे’ यह कहानी कानून व न्याय व्यवस्था पर सवाल उठाती है। पुलिस वाले अपनी ताकत का नाजायज लाभ उठाकर निर्दोष व्यक्तियों को जेल में डाल देेते हैं कभी हत्या तो कभी आंतकवाद के नाम पर। इस कहानी में यह दिखाया गया है कि ताकतवर लोग कमजोर का शोषण करते हैं। अल्पसंख्यकों के साथ ऐसा आय दिन हो रहा है।

‘उनकी व्यस्ता’ यह कहानी शैलजा नाम की एक ऐसी लड़की की कहानी है जो किसी भी दृष्टि में पुरूषोें मुकाबले कम नहीं है। मगर परिवार वाले उसका विवाह जल्दी ही तय कर देते हैं यह सोचकर कि शादी के बाद उसकी आदतों में बदलाव आ जाएगा। वह एडजस्ट करना सीख जाएगी। मगर शैलजा अपनी साथ होने वाले अन्याय के खिलाफ आवाज उठाती है और जब कोई उसका साथ नहीं देता तो ससुराल से भाग जाती है।

‘मेरे हमदम मेरे दोस्त’ यह कहानी सुबोधिनी नाम की एक स्त्री के संघर्ष की कहानी है जो शादी के बाद पति के अत्याचार से तंग आकर तलाक ले लेती है। मगर उसकी मुश्किले तब भी खत्म नहीं होती पति उसे फिर भी परेशान करता है वहीं दूसरी ओर नौकरी करते हुए भी उसे आॅफिस में सेक्चुएल हैरासमेन्ट का शिकार होना पड़ता है। महिलाएं घर हो या बाहर कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं, वे यौन हिंसा व घरेलू हिंसा का शिकार होती रहती है।

‘ऐ अहिल्या’ यह कहानी दो सहेलियों के इर्द-गीर्द घूमती है। एक उन्मुक्त और  बिंदास रहने वाली और दूसरी परंपरागत तरीके से जीवन जीती है मगर उसके भीतर भी कहीं न कहीं वैसी ही उत्कंठा है जैसे बिंदास रहने वाली रूपा में। हांलाकि सहेली के उन्मुक्त आचरण के कारण समाज में उसकी किरकिरी है। मगर वह इस बात की परवाह नहीं करती। परिवार के लाख मना करने के बावजूद वह अपनी दोस्ती निभाती है। दोनों ही स्त्रिीयां अपने स्तर पर संघर्ष कर रहीं हैं। यह कहानी संग्रह स्त्री मन को केंद्र में रख कर लिखी गई है। इस संग्रह की ज्यादातर कहानियां स्त्री संधर्ष को बयां करती है। जो समाज व्यवस्था के बाहर और भीतर की कथा को कहती है। भाषा सीधी, सहज और सरल  है।  
कहानी संग्रह: ‘‘क़ब्र भी कैद औ’ जंजीरें भी’’
लेखिका: अल्पना मिश्र
मूल्य: 200
पृष्ठ: 119
प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन, प्रा. लि., 1-बी, नेताजी सुभाष मार्ग, नई दिल्ली-110002

 

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